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05.31.2008
 

समेटे सब को अपने में समुंदर की निशानी है
शरद तैलंग


समेटे सब को अपने में समुंदर की निशानी है ।
हमें ये ख़ासियत उसकी सभी के दिल में लानी है।

ये मत सोचो जो आला दिख रहे है वो सभी खुश हैं,
तुम्हारी ये कहानी है तो उनकी वो कहानी है।

न आँखों में हया जिनके न बातों में है सच्चाई,
हमें ऐसे ही कुछ लोगों से ये संसद बचानी है।

कभी शासन में आसन तो कभी राशन या भाषण में,
उलझ कर रह गया इनमें हर इक हिन्दोस्तानी है।

किसी पुस्तक से या फिर चित्र से भयभीत ना हो तुम,
हमारी आस्था कच्ची नहीं सदियों पुरानी है।

पड़ोसी मुल्क़ से तुम दोस्ती की बात करते हो,
पड़ोसी घर से भी तो दुश्मनी पहले मिटानी है।

मयस्सर भी नहीं सिर को छुपाने की जगह जिनको,
हमें उनके लिए तो सबसे पहले छत बनानी है।

हमें ना ताज की चाहत ‘शरद’ ना राज की हसरत,
हमारी चाह तो सबके लिए रोटी ओ’ पानी है।


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