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| 05.31.2008 |
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जब तलक़ आसमान बाक़ी है |
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जब तलक़ आसमान बाक़ी है,
पंछियों की जु़बान बाक़ी है । अभी लंका ही ठीक है सीता, क्योंकि इक इम्तहान बाक़ी है । द्रोपदी की कथा न भूल सका, जिसका अब भी लगान बाक़ी है । शेर पेड़ों पे चढ़ नहीं पाए, इसलिए ये मचान बाक़ी है । कैसे निर्दोष में कहूँ खु़द को, अभी तेरा बयान बाक़ी है । गाँव लूटा ‘शरद’ रकीबों ने, अब फ़कत दास्तान बाक़ी है । |
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