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| 05.31.2008 |
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आप तो बस अपना ही ग़म देखते हैं |
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आप तो बस अपना ही ग़म देखते हैं,
किसलिए फिर मुझमें हमदम देखते हैं ? याद जब आते कभी बचपन के वो दिन तब पुराने एलबम हम देखते हैं । हमने खंज़र को भी दिल से है लगाया, किस तरह निकलेगा अब दम देखते हैं । जो तकाज़े के लिए आते हैं घर में, चिलमनों की ओर हरदम देखते हैं । क्या चुनावों की हवा चलने लगी है? क़ातिलों के पास मरहम देखते हैं । महफ़िलों में जब से हम जाने लगे हैं, लोग अब उनकी तरफ कम देखते हैं । मौत पर उनकी “शरद” कोई न रोया, पर झुका आधा ये परचम देखते हैं । |
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