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05.31.2008
 

अभिशाप
शरद तैलंग


पेड़ पर लगे पत्तों को अचानक फूलों से ईर्ष्या होने लगी। उनका विचार था कि फूलों के रहते उनकी कोई अहमियत नहीं है। सब लोग फूलों की सुंदरता पर ही ध्यान देते हैं, उन्हें कोई पूछता ही नहीं ।

पत्तों का ऐसा रुख देखकर फूलों ने उन्हें समझाया - तुम सब नहीं जानते इस सुंदरता का हमें कितना बड़ा मूल्य चुकाना पड़ता है। बगीचों तथा दुकानों में सजे हुए हम अपने आपको वेश्याओं जैसा महसूस करते है। कोई भी ग्राहक चंद रुपयों के बदले जिसे चाहे, ले जा सकता है। हमें बड़े बड़े लोगों तथा नेताओं की सेवा में प्रस्तुत किया जाता है तथा जबरन उनके गले तथा बाहों में लिपटना पड़ता है। क्षण भर के लिए लोग हमें अपने घर की शोभा बनाते है और उपयोग हो जाने के बाद कुचल तथा मसल कर सड़क पर फेंक देते हैं। सुंदरता तो हमारे लिए अभिशाप है। तुम लोग अपनों के बीच मौज मस्ती से रह तो लेते हो।

फूलों की बात पत्तों की समझ में आगई।

(हंस में प्रकाशित)


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