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05.31.2008
 

आपका दिल जब समंदर बन गया
शरद तैलंग


आपका दिल जब समंदर बन गया,
सच कहूँ वो एक मंदर बन गया।

देखना इंसानियत ज़िंदा रही तो,
उसका घर हर घर के अंदर बन गया।

छीना झपटी का चला ये दौर कैसा,
आदमी तो फिर से बंदर बन गया।

इस क़दर सत्ता परस्तों ने हवा दी,
एक झोंका भी बबंडर बन गया।

प्यार जब हर धर्म से हर कौ़म से हो,
तब समझना मुल्क, सुंदर बन गया।

ख़ुद के जैसा ही करे बर्ताव सब से,
ओ ‘शरद’ तू तो सिकंदर बन गया।

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