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12.26.2008
 

आतंकवाद
शामिख़ फ़राज़


पाँच अक्षरों के एक शब्द ने
न जाने कितनी ज़िंदगियाँ बरबाद कर दीं
न जाने कितनी रूहें बदन से आज़ाद कर दीं

पाँच अक्षरों के एक शब्द ने
खून की स्याही से लिखी इबारत ख़ौफ़ की
अब तो जैसे घर घर नाचना है आदत मौत की

पाँच अक्षरों के एक शब्द ने
पाँच की जगह पे ढाई अक्षरों की बात करो
आतंकवाद की जगह शान्ति की शुरूआत करो

अब न उड़ाओ खून के छींटे बौछारें और फव्वारे
लाल हो जाएगी धरती सारी पैदा न ऐसे हालत करो


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