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11.03.2007
 
बैकुण्ठ हो गया दादा जी को
शम्भू नाथ

मरने के बाद रोना चिल्लाना, क्रिया कर्म करना ये सब तो समझ में आता है, लेकिन ये बात  समझ नहीं आयी कि हमारे दादा जी को  बैकुण्ठ हो गया। जब दादा जी मर गये तो  हमारे लोगों - परिजनों उनकी अर्थी को गंगा में विसर्जित करके क्रिया कर्म करने की योजना बनायी क्योंकि अधिक से अधिक पुराने  किस्म के रितिरिवाज पूर्वी उत्तर प्रदेश मे पाये जाते हैं। यहाँ के लोग अधिक अंधविश्वासी ही होते हैं और अपने बुजुर्गों के बताये मार्ग पर चलते हैं। जब दादा जी की  तेरहवीं थी तो नाते रिश्तेदारों का जमवाड़ा हो गया और जब सारे लोग खाना खा लिए तो औरतों ने चावल तौल करके एक बर्तन मे रखा और थोड़ी सी राख भी एक पीढ़ा पर बिछा दिया। उसके बाद लोग सोने को अपने अपने बिस्तर पर चले गये। जब रात बीत गयी तो दूसरे दिन सारी औरतों ने इकट्ठा हो करके सबसे पहले चावल तौला तो चावल थोड़ा ज्यादा, तो सब लोग कहने लगे की अब बरक्कत होगी, और अगर चावल कम होता तो कहते कि अब घाटा होगा। लेकिन चावल पहले की अपेक्षा ज्यादा था। उसके बाद राख का नम्बर आया तो राख को देख सबसे पहले औरतें ही बोली की दादा जी को बैकुण्ठ हो गया। बैकुण्ठ की बात हमारे समझ मे नहीं आयी और मैंने भी सोचा कि देखते है कि हमारे दादा जी को कैसे बैकुण्ठ हुआ। जब मैं राख के पास गया तो दादी से ही पूछना उचित समझा और दादी जी से पूछ बैठा कि दादा जी को कैसे बैकुण्ठ हुआ तो हमारी काकी कहने लगी कि अगर राख के अन्दर किसी भी चीज का निशान होता जैसे, इंसान, जानवर पशु पक्षी कुछ भी होता तो राख के अन्दर कोई न कोई निशान हाथ,  पैर, अन्य अंग बने होते है। और अगर इसमें निशान नहीं होते तो वह इंसान बैकुण्ठ को प्राप्त होता है। लेकिन मैं सोचता रहा कि आखिर मैंने अभी तक किसी का निशान नहीं देखा है, और बैकुण्ठ का मतलब स्वर्ग होता है। ये लोग कैसे पता लगाये कि दादा जी को बैकुण्ठ हो गया।

मैं सोचता रहा कि दो दिन बाद खबर आयी कि हमारे नाना जी भी गुजर गये और मैं और हमारी माता जी नाना जी के घर गये तो वहाँ पर भी लोग रो रहे थे। हमारी माता जी भी रोने लगी तो मैं भी रोने लगा आखिर रोना ही था। क्योंकि पहली बात ये कि वे हमारे नाना जी थे और माता जी के पिता जी इसलिए हम लोग रोते रहे लेकिन चुप कराने का सिलसिला जारी रहा। उसके बाद नाना जी को दफनाने का कार्य कर्म शुरु हुआ और गंगा जी के तट पर ले जाने की योजना बनने लगी। अब कंधो का कार्य प्रारम्भ  हुया पहले हमारे मामा जी कंधा लगाये उसके बाद हमारा नम्बर आया तो मै भी कंधा दिया। कहा जाता है कि तीरथ यात्रा में जो पिण्ड दान दिया जाता है, वहाँ लोग अपने पूर्वजों के साथ-साथ नाना,  परनाना बृदे नान को पिण्ड दान देते हैं। अगर मैं माँ के साथ मामा के यहाँ न गया होता या हमारे नाना जी न मरे होते तो ये बात हमें पता भी नहीं चलती,  और लोग कहते है कि लड़की का लड़का यही एक कार्य जब करता है तो नाना नानी को प्राप्त होता है, और वे स्वर्ग के भागीदार होते हैं।

फिर क्या था, मैं तेरहवीं का इंतजार कर रहा था,  कि देखता हूँ कि हमारे नाना जी क्या बने कि उनको भी स्वर्ग (बैकुण्ठ) प्राप्त हुआ। जब वह भी दिन आया तो लोग खाना खाने के बाद सोने को गये तो औरतें चावल और राख रख के सो गयीं। और हमें नींद नहीं आ रही थी। मैं यही सोचता रहा कि सुबह कब हो और हम देखें कि हमारे नाना जी क्या बने या बैकुण्ठ प्राप्त हुआ। आखिर रात बीत गयी सुबह पाँच बजे मैं उठ करके नितकर्म से निवृत हो गया तो घर के अन्दर गया तो हमारी मामी जी ने कहा चलो देखते है हमारे यहाँ बरक्कत होगी कि नहीं। जब मामी जी चावल तौला तो चावल 200 ग्राम ज्यादा था तो मन मे तसल्ली हुयी कि मामा के यहाँ भी हमारे नाना जी सदा खुशी रहो का आशीर्वाद दे दिये। उसके बाद जब राख को मामी ने देखा तो कहती है कि हमरे बुढइ तो मनुष्य बन गये यानि कि फिर से उन्हे मानव का तन मिल गया मैं भी देखने को उत्सुक था और देखा तो उस राख में कुछ निशान थे। ध्यान से देखने पर पता चलता था कि शायद इंसान के अंगुलियो के आगे के निशान हैं। अंगुलियों के आगे को शायद पोटा कहते है। तब भी मैं सोचा चलो ठीक है कि नाना जी के राख में तो निशान थे पर दादा जी के राख में क्यों नहीं थे? वे निशान जिससे हमारे घर वालों ने मान लिया कि दादा जी को बैकुण्ठ हो गया। आखिर बैकुण्ठ किसी ने देखा है?.... कहाँ है?......बैकुण्ठ.......!!



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