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11.03.2007
 
अनारा दीदी का झमेल
शम्भू नाथ

एक अकेली औरत जंगल में पेड़ की पत्तियों को बहार करके इकट्ठा करती है और खैंची में भरती है। उसके बाद सिर पर उठाने की कोशिश करती है, लेकिन उसकी खैंची इतनी गहरी और बड़ी होती है कि उठाना अकेले आदमी के लिए असम्भव है वह उन पत्तियों को घर इसलिए ले जाती है कि गाँव के लोग उसके यहाँ सुबह शाम दाना भुजाने के लिए आते हैं। चाहे दाने में खाने योग्य कोई भी अन्न हो सकता है। लोगों का दाना (चबैना) भूंजाना एक नित्य कर्म बन गया है। अगर आप भी उस गाँव मेत्र् पहुँचेंगे तो आप यही सोचेंगे कि लोग इतना सारा आनाज भुंजा के ले जाते हैं फिर तो ये लोग खाना नहीं खाते होंगे! लेकिन आप सही सोचेंगे। उस गाँव के लोग सुबह चबैना चबाने के बाद काम करने चले जाते हैं और दोपहर को जब आते हैं तो खाना खाते हैं।

मैं बात अनारा दीदी की कर रहा था जो सारे गाँव मे एक ही भरभुंजा हैं। वह एक औरत हैं जो सारे गाँव के लोगों को हर एक प्रकार के चबैने का स्वाद चखाती हैं और वह अपने लिए नहीं इतनी मेहनत करती हैं। वह तो विधवा हैं उसे 30-35 साल विधवा हुए हो गए हैं। वह जब अपनी दर्द भरी कहानी कहती हैं तो लोगों को जरूर आँसू गिर जातेहैं। लेकिन उस गाँव के लोगों के आँसू नहीं गिरते, क्योंकि उस गाँव में अधिकतर बेदर्दी लोग रहते हैं या जो शरीफ आदमी है वे डरते हैं या वे इस झमेले में नहीं पड़ना चाहते।

अनारा दीदी गयादीन की छोटी पुत्री थी। उसकी बड़ी बहन भी सीधे स्वभाव की हैं और ये लोग गाँव मे रहते थे और गरीब थे। पहले लड़कियों को पढ़ाया नहीं जाता था, जब अनारा की बड़ी बहन की शादी हुयी तो अनारा सिर्फ 7 साल की थी। दस साल की होते होते अनारा की भी शादी हो गयी, लेकिन शायद ईश्वर को यह मंजूर नहीं था। अनारा कुछ दिन के अन्दर विधवा हो गयी शायद वह अपनी ससुराल दुहलन बन के नहीं गयी थी या गयी भी थी तो एक बार ही गयी थी तब से वह अपने माँ-बाप के साथ रह उन्हीं का सहारा बन गयी। क्योंकि अनारा के कोई भाई नहीं था अनारा की जो बड़ी बहन है वह बहुत ही सीधे स्वभाव की है इसलिए वह भी अधिक दिन तक अपनी ससुराल मे नहीं रही। लेकिन अनारा का जीजा कुछ दिन तक अनारा के घर पर रहता था और आज अनारा की बड़ी बहन के दो लड़की एक लड़का है। एक लड़के और एक लड़की की शादी अनारा दीदी ने खुद अपनी कमायी से की। अनारा के जीजा का क्या लगा बस हजार दो हजार के बीच। आज अनारा जो कठिनाइयों का सामना कर रही है शायद यह दिन किसी औरत को देखने को न मिले। अनारा के बहन का लड़का शादी के बाद से अपने बाप के साथ रहता हैं और लड़की अपने ससुराल में। अब अनारा के सिर पर  कई जिम्मेदारी हैं बहन की देख-रेख करना, नाते रिश्तेदारी में शादी ब्याह में जाना। अनेक काम जो आम लोगो को भी करने पड़ते हैं और जहाँ आदमी न हो, औरत को सब कुछ करना पड़े तो क्या गुजरती होगी उस औरत पर। यहाँ तक उस गाँव में ठाकुर ज्यादा हैं। वहाँ पर वे लोग सोचते हैं गरीब लोग गरीब ही रहे। आज भी उस गाँव के अन्दर ये नजारा देखा जा सकता है। अनारा का घर जहाँ है वहाँ दिवानी चल रही है और दुकान जहाँ है वहाँ भी दिवानी चल रही है। जब उसने घर बनवाने की योजना बनायी तो घर के बगल में जो ठकुर रहते हैं मना कर दिये कि घर नहीं बनाने दूँगा। आज तक उसके ईंटें सड़ रही हैं। फिर भी उस महान औरत की कहानी सुन कर मैंने भी सोचा और देखा भी इस गाँव के अन्दर कितना अन्याय हैं आज वह किन स्थितियों का सामना कर रही! धन्य है वह औरत जो दूसरों के लिए मरने के लिए भी तैयार हैं और धन्य है उस गाँव के लोग कि उसकी दुर्दशा देख रहे हैं समझ रहे हैं फिर भी कोई उसका साथ देने को तैयार नहीं हैं। क्यों इतना झमेल झेल रही वह तो अकेली हैं। वह सोचती होगी फिर भी वह हार नहीं मान रही, सारे झमेलों को हँसती हुयी सहती है। और अपना खैंची और खरहरा ले के रोज जंगल मे पत्तियों को बटोरने चल देती हैं। अनारा दीदी के अन्दर  साहस है और वह निडर भी हैं। क्योंकि ठाकुरों से लोहा लेना सब की बस की बात नहीं। अगर वह दलित हैं तो बहुत ही मुशिकल है। उस गाँव के अन्दर कई समस्यायें हैं। जो लोग सुनते हैं अपने दांतो दले अँगुलियाँ जरूर दबाते हैं। लेकिन अनारा दीदी ने उन गाँव वालों में एक अलग पहचान बना रखी है। उसे पता है कि सत्य की हमेशा विजय होती है। वह एक दिन जरूर अपनी जमीन पर अपना घर बना लेंगी। वह कहती हैं अगर मै जमीन बेच कर कहीं और जाऊँगी तो इन लोगों के छाती पर पीपल जरूर जमा के जाऊँगी अर्थात वह जमीन किसी ऐसे इंसान को दे करके जायेगी जो उन लोगों के सामने घुटने न टेक सके। काश अनारा दीदी इसी गाँव में रहे और वह अपना सपनों का घर बना सक! मेरा भी दिल कहता है कि एक दिन जरूर हमारे गाँव से असभ्यता जरूर जायेगी ....!!



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