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12.31.2007
अनूदित साहित्य - पंजाबी कविता

नसल
लेखक : डॉ. सुखपाल सिंह
हिन्दी रूपांतर : डॉ. शकुन्तला तलवाड़


चौराहे में खड़े
बस की प्रतीक्षा करते हुए
मेरे पास से निकलती
गोरे लड़कों की टोली
मुझ पर कीचड़ फैंकती
थूकती व चिल्लाती है...
गो बैक...।

पास खड़ी
अधेड़ आयु की
गौरी स्त्री
हैरान हो
मुझ से माफ़ी माँगती है ।

मैंने कहा
ऐसा
आप ने तो नहीं किया...

उसने कहा
मैंनै तो नहीं
मेरे जैसों ने किया है
हमें क्षमा करो
अपना मन मलिन मत करना

मैं उसकी आँखों में देखता हूँ
सारी मलिनता
धुल जाती है ।


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