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09.23.2007
 
तिनका ही जब छूट गया तो
शकुन्तला श्रीवास्तव

 

मटमैली छवियाँ रहने दो, धूल भरा रहने दो दरपन,

शीशे ने यदि सच बोला तो, शायद ही सह पाये ये मन।

 

उलझे-उलझे पात नुकीले

खिड़की चौखट पे चुभते से,

काँपे रह रह दीवारों पे,

कुछ धूमिल बिखरे धब्बे से।

 

परदे की ये डोर न खींचो, उजला कर देगा नंगापन

 

टूट गया विश्वास अगर तो,

छाया भी क्या बहलाएगी,

तिनका ही जब छूट गया तो,

नाव कहाँ लेकर जाएगी।

 

झाँक जरा देखे खुद को ही, जब शीशा बन जाये ये मन।

 

धूप दिखायें क्यूँ सीलन को,

अपने से अपनी रुसवाई,

क्यूँ शीशे से बाल निकालें,

टुकड़ों में बाँटे परछाई।

 

कुछ छलना कुछ भ्रम रहने दो, कुछ तो रहने दो आश्वासन।



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