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| 09.23.2007 |
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फूल तो खिलते हैं |
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खिड़कियाँ खोल दो, अब ताज़ा हवा आने दो
जिस तरफ़ जाती है, मौसम की नज़र जाने दो।
ये गुनगुनाहटें, उभरी रसीले होंठों पर
हवा के साथ जो आती है सदा आने दो।
होंठ जुंबिश न करें, कह दें कहानी सारी
इस सलीक़े से भी कहने का हुनर आने दो।
एक सी रुत कभी, रहती ही नहीं गुलशन में
फूल तो खिलतए हैं, खिलने दो, बिखर जाने दो।
वो टूटे पत्ते का हो, या हो सूखी नदिया का
जहाँ का दर्द भी लाती है फ़ज़ा लाने दो। |
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