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09.23.2007
 
किस छाँह तले बिखरा गजरा
शकुन्तला श्रीवास्तव

 

टहनी पपीहरा बोल रहा, डार अंबुआ की कोयलिया

खिड़की खोले हठीली पवन, झाँके झुकी झुकी बदरिया

लट खुल खुल जाये बिखर बिखर

जियरा यादों में लहर लहर

थी चुनरिया अलबेली, हुई गोरी बावरिया।

ये नयन – निकुँज कुँज –मधुवन

रसभूमि मन – बना – वृन्दावन।

यमुना जलधारा उमड़ी लगन, देह मोहना की बांसुरिया।

वीराने में लौ जलती सी

बगिया में खुशबू उड़ती सी।

छंद बैरागी, गीत विरही, प्रीत बन बैठी जोगनिया।

पथ राह दिशा सब बिसरायी,

जाना था किधर, कहाँ आयीं।

किस छाँह तले, बिखरा गजरा, उलझायी कहाँ पायलिया।



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