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ISSN 2292-9754

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02.09.2015


मुक्ति

साँस की जंजीर से ही,
प्राण बन्धन में बँधे हैं।
और प्राणों से सदा ही,
मोह के रिश्ते जुड़े हैं।
पलक मुँदते साँस की
जंजीर टूटे।
मोह के ये तार भी सब,
झनझना इक साथ छूटें।।


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