मुक्ति शकुन्तला बहादुर
साँस की जंजीर से ही, प्राण बन्धन में बँधे हैं । और प्राणों से सदा ही, मोह के रिश्ते जुड़े हैं । पलक मुँदते साँस की जंजीर टूटे । मोह के ये तार भी सब, झनझना इक साथ छूटें ।।