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ISSN 2292-9754

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06.18.2016


किसी की आँख खुल गयी
किसी को नींद आ गयी

मंदिर में सत्संग हो रहा था। भक्ति में डूबी हुई गायिका का मधुर स्वर गूँज रहा था – "अंखियाँ हरि दरसन की प्यासी" – विविध स्वरों में परिवर्तित होती हुई धुन के द्वारा गायिका दरसन की प्यासी आँखों का भाव अभिव्यक्त कर रही थी और श्रोताजन उसके संगीत के माधुर्य और भक्ति की तल्लीनता में डूबे हुए से झूम से रहे थे। लगता था – जैसे राधा स्वयं आकर कृष्ण के वियोग में उनके दर्शन की लालसा से उत्कंठित होकर भाव-विभोर हो रही हों। सच तो ये है कि जिन आँखों ने एक बार प्रभु का दर्शन कर लिया उनके लिए सृष्टि में अन्य कोई आकर्षण नहीं रह जाता है।

ये आँखें हमारे मनोभावों को तत्काल प्रगट कर देती हैं। आश्चर्य, हर्ष, विषाद, ममता, श्रद्धा, क्रोध और लज्जा, पश्चाताप और अन्य भी अनेक चित्तवृत्तियों को अनायास ही अभिव्यक्त कर देती हैं। अचानक कोई दुःख आ पड़े और व्यक्ति घबरा जाए तो आँखें आँसू बहाने लगती हैं और यदि कभी अप्रत्याशित रूप से अत्यधिक ख़ुशी मिल जाए तो भी आँखों में हर्ष के आँसू छलक आते हैं। वर्षों के बिछड़े दो मित्र या सखियाँ जब अचानक मिल जाती हैं तो भी हर्षातिरेक से आँखों का भर आना स्वाभाविक ही है। सफलता या अन्य किसी भी प्रकार की प्रसन्नता आँखों में चमक ला देती है तो दुःख के क्षण आँखों में उदासी भर देते हैं। आँखों का सूनापन मन के सूनेपन का परिचायक होता है।

कभी कोई ठोकर खा जाए तो हम कहते हैं कि आँखें खोल कर चलना चाहिए। रास्ता चलते कोई टकरा जाए तो लोग तुरंत कह देते हैं कि क्या आँखें बंद हैं? कभी-कभी कोई अधिक कटु होकर कह देता है – क्या आँखों से दिखता नहीं है? अथवा आँख से अंधे हो क्या? कोई व्यक्ति यदि निर्लज्ज होकर कुकर्म करता है तो सभी कहते हैं कि इसकी आँखों का पानी मर गया है। लज्जित व्यक्ति आँखें झुकाकर क्षमा प्रार्थना करता है तो ढीठ व्यक्ति आँखें तरेरकर गरजता है। क्रोध में आँखें लाल हो जाती हैं। अधिक रोने से भी आँखें लाल हो जाती है और कभी-कभी सूजन भी हो जाती है।

एक व्यक्ति अपने मित्र डॉक्टर के पास जाकर बोला – "आँखें दिखाने आया हूँ।"

इस पर डॉक्टर ने हँसते हुए कहा, "क्यों जी मैंने क्या किया है जो मुझे आँखें दिखा रहे हो? अपने घर में आँखें दिखाया करो।"

सभी हँसने लगे क्योंकि "आँखें दिखाना" "क्रोध करना" या ऐंठने का सूचक है। माँ की आँखों से ममता छलकती है तो दुष्टों या दुराचारी जनों की आँखों से पाप झलकता है।

कोई धीर-शांत व्यक्ति अपनी आँखों से आँसू छलकने नहीं देता और उन्हें आँखों में ही पी जाता है – इस प्रकार अपनी व्यथा दूसरे पर प्रगट नहीं होने देता क्योंकि –

"रहिमन अंसुवा नयन ढरि जिय दुःख प्रगट करे।
जाही निकारौ गेह ते, कस न भेद कह दे॥"

आँखों की महिमा अपार है। नायिका की काली, कजरारी, मतवारी आँखें नायक पर मोहक प्रभाव डालती हैं। उसे अपनी ओर आकृष्ट करती हैं। किसी-किसी की आँखें बोलती-सी प्रतीत होती हैं। नींद से भरी आँखें हों तो व्यक्ति ऊँघने लगता है। उनींदी आँखें अलसाई-सी लगती हैं। आँखों का आना (दुःखने की स्थिति) तो दुःखदायी होता है। किन्तु आँखों का जाना (दृष्टि न रहना) तो उससे भी अधिक दुःखदायी होता है। सारी दुनिया अँधेरी हो जाती है। "नैन बिन सूनो सब संसार।" कभी किसी में गुणों का अभाव होने पर भी मिथ्या प्रशंसा मिल जाए तो लोग कहते हैं – "आँख के अँधे नाम नयन सुख।" यों नेत्रविहीन व्यक्ति को हम – प्रज्ञाचक्षु कहते हैं। उनकी तीव्र बुद्धि और मन की आँखें उन्हें सभी ज्ञान करा देती हैं। बिना देखे ही वे दूर से भी किसी की आवाज़ सुनकर व्यक्ति विशेष को पहचान लेते हैं। ब्रेल के जरिए वे सभी कुछ पढ़ने में समर्थ होते हैं।

हमारे यहाँ अनेक बालक-बालिकाओं के नाम भी आँख पर आधारित होते हैं। जैसे मीन के आकार की आँखों वाली मीनाक्षी देवी का प्रसिद्ध मंदिर मदुरा में है। हिरनी के समान चंचल आँखों वाली मृगाक्षी सुनयना, विशालाक्षी, शताक्षी भी नाम होते हैं। बालक का नाम कमलनयन, या मृगाक्ष भी होता है। इसी प्रकार इंद्र "सहस्राक्ष" कहे जाते हैं तो भगवान शंकर त्रिनेत्रधारी होने से त्र्यम्बक नाम से प्रसिद्ध हैं। महामृत्युञजय जाप में उनक ही स्मरण किया जाता है। संत तुलसीदास ने कहा है कि –
"गिरा अनयन, नयन बिनु वाणी" अर्थात वाणी में देखने की शक्ति नहीं है वाक्शक्ति के पास दृष्टि नहीं होती। किंतु यह भी सच है कि इशारों ही इशारों में – सांकेतिक भाषा से आँखें बहुत कुछ कह देती हैं। महाकवि सूरदास के एक पद में गोपिकाएँ कृष्ण के मधुरा चले जाने पर – उनके वियोग में निरंतर आँसू बहाती हैं। आँखें बरसाती ही रहती हैं-

"निस दिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहत पावस, ऋतु हम पर, जब से स्याम सिधारे।"

उधर दूसरी गोपी कहती है –

"घनश्याम बसे इन आंखिन में, अब कजरा कहाँ लगाऊँ?"

कृष्ण भक्त कविवर रसखान ने भी बहुत ही सुंदर शब्दों में कृष्णभक्ति में लीन गोपी का चित्रण किया है –

"रसखान विलोकत बौरि भई, दृग मूंद के ग्वारि पुकारि हंसी है।
खोलो से घूंघट, खेलूं कहां, ये हि मूरत नैनन माहि बसी है।"

मनमोहन कृष्ण की छवि आँखों में सदा सर्वदा बसी रहे- इसी से गोपी का कथन है – उसे आँखों की नींद अलभ्य हो गयी है –

"न अंखियां लागीं, जब से अंखियां से अंखियां लागीं" आँखों का जादू सचमुच सिर पर चढ़कर बोलता है।

इतिहास में भी आँखों से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ प्रसिद्ध हैं। महाभारत में गांधारी ने अपनी आँखों पर आजीवन पट्टी बाँधकर अपने पति धृतराष्ट्र के समान ही नेत्र-सुख त्याग दिया था। संजय ने अपनी दिव्य-दृष्टि से देख कर ही युद्ध का विवरण धृतराष्ट्र को सुनाया था। युद्ध-निमंत्रण के लिए आये हुए सिरहाने बैठे दुर्योधन पर कृष्ण की दृष्टि नहीं पड़ी थी – पहले उनकी आँखों ने पैरों की ओर बैठे अर्जुन को ही देखा था। गुरु द्रोण द्वारा धनुर्विद्या की परीक्षा में समस्त कौरव-पांडव शिष्यों में से एकमात्र अर्जुन ही सफल हुए थे क्योंकि अर्जुन की आँख वृक्ष पर बैठे पक्षी को ही देख रही थी – जिसपर निशाना लगाना था। द्रोपदी स्वयंवर में अर्जुन ने चक्राकार घूमती हुई मछली की आँख को अपने बाण से छेद दिया था, तभी द्रोपदी ने जयमाल पहना कर अर्जुन का पति रूप में वरण किया था।

सुदामा जब अपने गुरुभाई और बालसखा श्रीकृष्ण से मिलने जाते हैं, तो कृष्ण की आँखें सुदामा की दीन दशा को देखकर आँसुओं से भर जाती हैं – कवि नरोत्तमदास का चित्रण अत्यंत भावपूर्ण एवं मार्मिक है –

"देखि सुदामा की दीन दसा करूना करिके करूनानिधि रोए।
पानि परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जलसों पग धोए।"

श्रीराम की स्तुति करते हुए तुलसीदास उनकी आँखों को नवविकसित कमल (पंखुड़ियों) के समान "नव कंज लोचन" कहते हैं। रावण के द्वारा बलपूर्वक आकाशमार्ग से जाती हुई सीता ने अपने मार्ग की सूचनार्थ अपने आभूषण मार्ग में गिरा दिये थे। सीता को माता के समान आदर देने वाले देवर लक्ष्मण ने शालीनतावश उनकी ओर कभी भी आँख उठाकर नहीं देखा था, अतः वे केवल सीता के नूपूरों को ही पहचान सके थे। सदा चरणों में दृष्टि रहने के कारण भुजबंद, कंकण, हार आदि पर कभी आँख नहीं उठायी थी। वनगमन के समय जब ग्रामवधूटियाँ दो भव्यरूप पुरुषों के साथ एक रूपवती स्त्री को पैदल जाते देखती हैं तो जिज्ञासावश प्रश्न करती हैं- गुप्तजी के "साकेत" में बहुत मनमोहक दृश्य प्रस्तुत है-

"शुभे तुम्हारे कौन उभे ये श्रेष्ठ हैं?
गोरे देवर, श्याम उन्हीं के ज्येष्ठ हैं।"

ऐसा कहकर लज्जालु प्रकृतिवाली सुकुमारी सीता ने बंकिम दृष्टि से देख, शरमाते हुए आँखें नीची कर लीं और आँखों की भावभंगिमा से श्यामवर्णी राम के पति होने का बोध उन्हें करा दिया था। आँखों के सामने एक चित्र-सा आ जाता है। ग्रामवधूटियों की आँखें उनकी सुंदर जोड़ी को देखकर ठगी-सी रह गयीं। भगवान शंकर ने अपनी तीसरी आँख की ज्वाला से कामदेव को भस्मीभूत कर दिया था। शिव की आँखें दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपमानित सती के भस्मसात होने का दृश्य सहन नहीं कर सकी थीं- फलस्वरूप उन्होंने दक्ष के संपूर्ण यज्ञ को विध्वंस कर दिया था।

महाराजा अशोक की रानी तिष्यरक्षिता ने अप्रसन्न होकर अपने सौतेले पुत्र कुणाल की आँखें निकलवा लीं थीं। इस प्रकार महापाप की भागी बनी थी।

किसी भी प्राणी के लिए आँखों की निधि अमूल्य होती है। पलकें आँखों की सजग पहरेदार या रक्षक हैं। चोट की आशंका से तुरंत बंद हो जाती हैं। तेज प्रकाश में चकाचौंध हो जाती हैं। नियम से सूर्यदर्शन आँखों की ज्योति बढ़ाता है।

अपने कार्यकलापों में सावधानी बरतने के लिए आँखें खुली रखना परम आवश्यक है। आँख झपकते ही प्रायः कोई दुर्घटना हो जाती है। आँख चूकी तो बहुत कुछ हाथ से निकल जाता है। किसी की आँख बचाकर ही चोर चोरी करता है। कहा जाता है कि हमें हर समय अपनी आँखें खुली रखना चाहिए जिससे हाथ आया दुर्लभ अवसर हाथ से निकलने न पाये। जीवन का हर क्षण बहुमूल्य है। आँखें बंद होते देर नहीं लगती। किसी ने सच ही कहा है –

"न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ।
ज़रा-सी इतनी बात है॥
किसी की आँख खुल गयी।
किसी को नींद आ गयी॥"


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