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ISSN 2292-9754

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02.09.2015


चिड़िया और मैं

बिजली के तार पर-

बैठी थी एक नन्हीं चिड़िया अकेली।
न परिवार, न साथी, न कोई सहेली।
शान्त, चिन्तन में मग्न सी, रंगीली।
मानो बूझती हो, कोई गूढ़ पहेली॥

देर तक यों ही, वो बैठी वहाँ रही।
न उड़ी, न चहकी, बस खोयी सी रही॥

शायद....

उदास थी वो,अपने ही भाग्य पर।
क्षुब्ध सी थी, निर्मोही संसार पर॥

नन्हीं सी चिड़िया, थी बड़ी भोली।
तभी करुण स्वर में, मुझसे ये बोली--

"बच्चों को पाला मैंने, प्यार से बड़ा किया।
उड़ने का ज्ञान दे, मैंने उन्हें समर्थ किया।
अपनी चंचु से मैंने, उन्हें दाना भी चुगाया।
घोंसले में लोरी सुना, मैंने उन्हें सुलाया।

जैसे ही उनके कुछ पंख थे निकले।
अनजान दिशाओं में स्वच्छन्द वे उड़ चले।
रह गई हूँ मैं, नितान्त अकेली अब।
न जाने उनसे मैं, मिल पाऊँगी कब ?

शायद मुझे मिल भी जाएँ,वे कभी कहीं।
पर निश्चय ही वे, पहिचानेंगे मुझे नहीं।
विशाल से गगन में, मिलन आस लिये सदा।
उन्मुक्त उड़ूँगी मैं, खोजूँगी उन्हें सर्वदा॥

वन-उपवन में, पर्वतों और उपत्यका में।
उनको पुकारूँगी मैं, दिवस और निशा में।
सो नहीं पाऊँगी,जागती ही रहूँगी मैं।
बच्चों की याद में, डूबी ही रहूँगी मैं॥"

तभी मन में विचार ये आया-

सचमुच ये दुनिया है,अतिशय निराली।
किन्तु हम तो हैं यहाँ, बड़े भाग्यशाली॥
वर्षों हमारे बच्चे, रहते हैं हमारे साथ ।
वृद्धावस्था में वे,पकड़ते हैं हमारा हाथ॥
सुख-दुःख हमारा सब, जानते हैं वे।
चेहरे का भाव भी, पहचानते हैं वे॥
चिड़िया बेचारी अपने लिये, ढूँढ़ती है दाना।
किन्तु हमें प्यार से, मिले स्वादिष्ट खाना॥
बच्चों के बच्चे भी, हैं प्यार हमें करते।
गोद में बैठ कर, कहानी हैं वे सुनते॥
जीवन की संध्या भी,ख़ुशहाल हो जाए यों।
तो उदासी मन पर, कभी फिर छाए ही क्यों?

प्रभु की कृपा से हमें,बच्चों का प्यार मिला।
निर्मोही इस जग में, सुखमय संसार मिला॥
तभी तो सब योनियों में, श्रेष्ठ है ये मनुज।
ये ही कभी बने देव, और कभी यही दनुज॥


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