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ISSN 2292-9754

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11.17.2014


चलो कुछ लिखा जाये

कुछ पीले पन्ने कागज़ के –
टुकड़ों में मिले थे रद्दी में,
खोज खबर और भाग-दौड़ में –
कल किसने दिए थे…भूल गया!
सर्दी की रातें गाँवों से-
और ठेठ दुपहरी सरसों सी-
गिन-गिन कर रिश्ते लाया था –
किस काम के थे ये भूल गया.
कल किसे कहा था अपना है?
किसे कहा तू मेरा है?
कब चश्मा लगवाया था?
कब उसने नाम लिखा था हाथों पर?
कब देखी थी हलदी मेहँदी?
वो गई दीवाली की बातें---
वो दुल्हंडी की उड़ी गुलालें----
कब आँख मिचौली खेली थी?
कब होली थी मल्हारें थी??
कब उनसे मिला था आखिर में –
कब खुल के हँसा था आखिर में?
ये भीगा तकिया क्या जाने—
ये सूने कमरे क्या जानें ???
ये बंद दीवारें याद रही –
वो फाल्गुन की बातें भूल गया,
ये सफ़र रेल के याद रहे –
वो सावन की बातें भूल गया,
वो नमी बिखेरे दो आँखे –
वो यार पुराने भूल गया,
कुछ पीले पन्ने कागज़ के -
कल किसने दिए थे भूल गया।


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