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ISSN 2292-9754

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06.01.2016


तुम

तुम रात ओढ़ कर
मेरी नींद के सकोरे में
सपनों के कुछ सिक्के डाल कहाँ निकल गये?

मैं पेड पर टँगे चाँद पर पाँव जमा
उचकती हूँ
तुम्हें बादलों के पीछे ढूँढती हूँ
शायद तुम पहाड़ों पर पाँव रख दौड़ गये हो,
मैं पगलायी हवा सी
हर खोह में, हर गुफा में तुम्हें ढूँढती हूँ
तुम कहाँ हो?

तुम शायद आकाश गंगा के किनारे
निकल गये हो टहलने
तुम्हारे पाँवों के निशानों पर
जाने कौन तारों के फूल चढ़ा गया है
कि निशान भी छिप गये हैं
मैं तुम्हें ढूँढूँ तो कैसे?

दिशायें गूँज रहीं हैं,
तुम्हारी बाँसुरी की धुन काँप रही है मेरे भीतर
मैं धरती सी प्रतीक्षा में हूँ
कि अब बरसो, कि अब बरसो!

तुम नहीं आये तो
पहन कर भोर की जोगिया चादर
निकल जाऊँगी मैं भी घर से बाहर
फिर दिन की किरणों में बँध कर
ओस सी सोख ली गई तो
दोष मत देना मुझे!

जानती हूँ मेरा होना जितना कम है,
मेरा न होना उस से भी कम…
पर तुम्हारा होना मेरे लिए बहुत बड़ा है
इसी आधार पर तो मेरा होना खड़ा है
इसी स्वार्थ में भरकर
अपनी देह के भीतर,
चेतस की कुठहरिया से
आकाश गंगा तक बेचैन चक्कर लगा रही हूँ,
तुम कहाँ हो, तुम कहाँ हो??


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