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ISSN 2292-9754

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06.29.2016


मेपल तले, कविता पले
समीक्षा

इसी बहाने से -

 भारत से बाहर रह रहे हिन्दी लेखकों की रचनाओं की अधिक समीक्षा नहीं हुई है। समीक्षा रचना का परिचय पाठकों से कराती है। जहाँ पुस्तक नहीं पहुँच पाती, समीक्षा वहाँ पाठकों तक पहुँच कर उनके मन में उत्सुकता जगाती है कि वे पुस्तक पढ़ें। एक सही निष्पक्ष समीक्षा रचना के गुणों को भी पाठकों के सामने उद्घाटित करती है और लेखक को सकारात्मक तरीक़े से उसकी कमियों से परिचित करवाती हुई, दिशा दिखाती है। किसी एक विचारधारा से प्रतिबद्ध हुआ समीक्षक अपनी समीक्षा से लेखक को नकारात्मक रूप से प्रभावित होकर तोड़ भी सकता है। अत: समीक्षक में गुरु की तरह "अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहै चोट" जैसे गुण भी होने चाहिये।

"मेपल तले कविता पले" के माध्यम से मैं कनाडा के और भारत से बाहर रहने वाले लेखकों की रचनाओं से पाठकों का परिचय करवाने की चेष्टा कर रही हूँ। इस के अंतर्गत आप प्रो. हरिशंकर "आदेश’ की रचनाओं के संबंध में पढ़ चुके हैं। "आदेश" जी भारत और भारत से बाहर बहुत समय से जाने जाते रहे हैं पर अन्य अनेक लेखक ऐसे हैं जिनके बारे में शायद बहुत से लोग न भी जानते हों। उनकी रचनाओं से परिचय करवाना भी इस स्तंभ का उद्देश्य है। इन लेखकों की रचनाओं की चर्चा और समीक्षा करने से पहले मैं समीक्षा के संबंध में कुछ कहना चाहूँगी।

समीक्षा का अर्थ है, समान ईक्षा, समालोचना! गुण-दोष का विवेचन!

साहित्यिक समीक्षा साहित्य की रचना के बाद होने वाली प्रक्रिया है, मूलत: किसी भी प्रकार की समीक्षा मूल स्थिति के बाद की उत्पन्न हुई प्रतिक्रिया है। पहले रचना लिखी जाती है उसके बाद विश्लेषण की प्रवृति जागृत होती है जिसमें काव्य के स्वरूप, प्रयोजन, मूल्यांकन आदि पर विचार किया जाता है जिससे साहित्यिक समीक्षा का सूत्रपात हुआ। साहित्यिक समीक्षा के कार्य हैं- साहित्य की विचार सामग्री पर विचार करना, उसकी व्याख्या करना, उसे प्रस्तुत करने वाले भाषा-शिल्प का अध्ययन करना, साहित्य की प्रकृति और उससे सम्बद्ध समस्याओं पर विचार करना।

भारत में साहित्यिक समीक्षा का सूत्रपात भरत मुनि के "नाट्यशास्त्र" से हुआ। नाट्यशास्त्र ने समीक्षा की परंपरा शुरू करी और उसके बाद आचार्य भामह ने "काव्यालंकार", तो आचार्य दण्डी ने "काव्यादर्श" लिखा। आचार्य वामन ने "काव्यालंकार सूत्र वृति" में "रीतिरात्मा काव्यस्यं" जैसे सिद्धान्त का प्रतिप्रादन किया, तो रुद्रट के "काव्यलंकार" ने उस समय के समस्त सिद्धांतों को एकत्रित किया। इन ग्रंथों ने काव्य के गुण दोष विवेचन करने के मानदंड बनाते हुये "रस" को साहित्य की आत्मा माना। रस के अनेक अंग बताये गये और नौ रस भी बताये गये। फिर काव्य लिखने के कारण यानी काव्य हेतु पर विचार हुआ, जिसमें भामह ने शक्ति (प्रतिभा), निपुणता (व्युत्पत्ति) तथा अभ्यास को काव्य का कारण यानी काव्य हेतु बताया, फिर विवेचना हुई कि प्रतिभा क्या है, व्युत्पत्ति क्या है और अभ्यास कैसा हो? फिर चर्चा हुई कि भाषा और शिल्प कैसा हो? आनंदवर्धन ने "ध्वन्यालोक" से ध्वनि-सिद्धांत की चर्चा की, आचार्य कुन्तक ने "वक्रोक्ति काव्य जीवितम" का सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसमें कहा गया कि अच्छा काव्य अभिधा में नहीं, व्यंजना में लिखा जाता है। रीतिकाल में केशव ने "कविप्रिया", "रसिकप्रिया", चिन्तामणि ने "काव्याकल्प द्रुम", "काव्यविवेक" और "रस मंजरी", मतिराम ने "रसराग", "ललितललाम" लिखा, इसके बाद आधुनिक काल में बाबूश्याम सुन्दर दास ने "साहित्यलोचन", रामदहिन मिश्र ने "काव्यदर्पण", गोविन्द त्रिगुणायत ने "शास्त्रीय समीक्षा के सिद्धांत" और डॉ. नगेन्द्र ने "रससिद्धांत", डॉ. निर्मला जैन ने "आधुनिक हिन्दी समीक्षा" लिखी जिसमें आधुनिक मानदंड स्थापित किये गये।

यह समीक्षा केवल भारत में ही नहीं लिखी जा रही थी। पाश्चात्य साहित्यकारों ने भी साहित्य के स्वरूप पर चर्चा की। प्लेटो ने साहित्य को क्षुद्र वासनाओं का उद्दीपक मान कर उसे बहिष्कृत करने की प्रेरणा दी तो अरस्तू ने साहित्य को वासनाओं का विरेचक माना, लौंजाइनस साहित्य के औदात्य द्वारा उत्पन्न तन्मयता को काव्य का उद्देश्य बताते हैं। बेनेदेत्तो क्रोंचे ने "अभिव्यंजनावाद- एक्स्प्रेशनिज़्म" का सिद्धांत बनाया जिसमें "आर्ट फॉर द सेक ऑफ आर्ट" कहा गया यानी आर्ट को मानवीय गुणों के आधार पर न जाँचा जाए! एक लंबी सूची है ऐसे साहित्य आलोचना पर विचार करने वालों की जिन्होंने साहित्य के अनेक पक्षों पर विचार किया। इलियट, जिनकी सोच और साहित्य का प्रभाव अज्ञेय और अनेक कवियों पर पड़ा वे कहते हैं - "Poetry is not a turning loose emotion but an escape from emotion; it is not the expression of personality but an escape from personality." एज़रा पाउंड के प्रभाव को भी आधुनिक हिन्दी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं पर स्वीकार किया है। वे कहते हैं "The success of a poem lies in the degree to which its language represents its substances"

विचार शास्त्रियों के विचारों के लंबे इतिहास के आधार पर आधुनिक हिन्दी साहित्य में चार प्रकार की आलोचना शैली प्रचलित हुई हैं, एक तो आ. रामचंद्र शुक्ल द्वारा स्थापित "साहित्यिक शैली" जिसमें साहित्य में रसानुभूति की प्रस्तुति को केन्द्र में रखा है, दूसरी मार्क्सवाद के आधार पर मार्क्सवादी या प्रगतिशील समीक्षा जिसमें समाज के उपेक्षित या आम, ग़रीब आदमी के संघर्ष की प्रस्तुति को केन्द्र में रखा गया है, तीसरी शैली है, फ़्रॉयड के मनोविज्ञान के आधार पर मनोवैज्ञानिक शैली और नई मतवाद रहित, प्रभावपरक "प्रभाववादी समीक्षा शैली"। समय के साथ-साथ इन नियमों के आधार पर समीक्षा करने वाले लोगों में कट्टरता बढ़ती गई।
कट्टरतायें किसी भी क्षेत्र में हों, उद्देश्य से व्यक्ति को हटाती ही हैं। समझदार आलोचक इन सभी आलोचनाओं को समन्वित कर के चलते हैं। यह भी बात ध्यान देने की है कि साहित्य के हर रूप की समीक्षा का आधार अलग-अलग होता है। कविता की समालोचना करने के लिये जिन तत्त्वों को देखा जाता है, उपन्यास और कहानी की आलोचना करने के लिये मानदंड अलग हो जाते हैं। कविता के लिये, संवेदना, भोगा हुआ यथार्थ, जीवन और जन की भावनाओं की प्रस्तुति, बिम्ब, कुशल प्रस्तुति, सरल भाषा आदि को आलोचना के मानदंड माने जाते हैं तो कहानी की आलोचना में कथा की कसी हुई प्रस्तुति, कथा की नाटकीयता और तनाव प्रस्तुति, पात्रानुसार भाषा और शिल्प को आधार बनाया जाता है। इसी तरह उपन्यास और नाटक की आलोचना के मानदंड अलग हैं। समीक्षा के इस सारे इतिहास से एक ही बात स्पष्ट होती है कि समस्त समीक्षा नियम एक ही बात को जानने की चेष्टा करते दिखाई देते हैं कि साहित्य के केन्द्र में कौन से भाव होना चाहिये और भाषा-शिल्प कैसा हो।

भाव यद्यपि सार्वभौम कहे जाते हैं पर यह भी सत्य है कि समय और जगह का प्रभाव लेखकों पर दिखाई देता है। मारीशस में बैठा लेखक गिरमिटिया मज़दूर की स्थितियों को जिस तरह से दिखायेगा, अमरीका का लेखक उस रूप में वह संघर्ष नहीं दिखा सकता, अमरीका का लेखक जिस तरह वहाँ के भारतीयों के संघर्ष को लिखेगा, वे स्थितियाँ खाड़ी देशों के लोगों की स्थितियों से भिन्न होंगी। मूल रूप में संघर्ष चाहें एक सा दिखता हो पर उसकी अपनी स्थानीय महक और दर्द की रेखायें होती हैं जो उस परिवेश की कठोरता और उस समाज विशेष के रुख या स्वभाव से उपजी होती हैं। उस दर्द की भीतरी तह तक पहुँचने के लिये उस ज़मीन की बुनावट और इतिहास को समझना ज़रूरी हो जाता है जिसमें उस समाज की भीतरी और बाहरी विशिष्टता बिंधी रहती है। यहीं आकर रचना अपने स्थान विशेष की बनती है, और विशिष्ट हो जाती है।

अपनी ज़मीन से बाहर लिखी जाने वाली रचनाओं की समीक्षा करने वाला समीक्षक तभी न्यायपूर्ण समीक्षा कर सकेगा जब उसने अध्ययन द्वारा उस स्थान विशेष को जानने का अभ्यास किया हो, उस समाज को समझने में वह निपुण हो और कथा और पात्रों को समझने की अंतर्दृष्टि एवम प्रतिभा उसमें हो। बहुत से समीक्षक इन स्थितियों को समझे बिना ही अपनी समीक्षा लिखते हैं और रचना की आत्मा तक पहुँचने से वंचित हो जाते हैं। इस प्रकार की समीक्षा लिखने वाले लोग रचनाकार के साथ अन्याय करते हैं। कई आलोचक एक देश के एक रचनाकार की एक रचना पढ़ कर सोचते हैं कि वे भारत से बाहर रहने वाले सभी रचनाकारों की रचनाओं को जान गये हैं, ऐसे में वे उस एक रचनाकार की रचना के आधार पर भारतेतर रचनाकारों के विषय में एक चलताऊ सा वक्तव्य दे देते हैं। इस प्रकार वे शेष लेखकों की संभावनाओं पर भी कुठाराघात करते हैं। इस प्रकार के व्यवहार ने भारतेतर लेखकों को बहुत ठेस पहुँचाई है।

समीक्षा करते हुये कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिये:

१. समीक्षा सद्भावना से प्रेरित होनी चाहिये

२. समीक्षक को कवि के भावों की पूर्ण प्रस्तुति को परखना है न कि अपने विचारों और मतों से रचना का मिलान करना चाहिये ।

३. रचना के समय विशेष और रचनाकार की भूमि के विषय में पढ़ कर समीक्षक को अपने भीतर रचनाओं की समीक्षा करने की क्षमता पैदा करनी चाहिये। अगर कोई समीक्षक यह नहीं करता तो वह रचनाओं की समीक्षा ठीक से नहीं कर सकेगा।

४. किसी एक विचार से प्रतिबद्ध समीक्षा रचनाकार को सदा के लिये हतोत्साहित कर सकती है और सही समीक्षा उसे प्रोत्साहित करती है। अत: अगर समीक्षक रचनाकार की कमी भी बताये तो कुछ इस तरह से कि रचनाकार को ठोस क्रियात्मक उपाय मिल सके और उसकी रचनात्मकता सही तरह से विकसित हो सके।

५. समीक्षा की भाषा पर ध्यान देना भी आवश्यक है। समीक्षा जन सामान्य के लिये लेखक की रचना का सौन्दर्य उद्घाटन करती है ताकि वे रचना का और अधिक आनंद ले सकें अत: अगर उस की भाषा शोध-पत्र की तरह होगी तो पाठक रचना और रचनाकार से जुड़ नहीं पायेगा। समीक्षा में भी बड़ी बात को सरल भाषा में कहने का गुण होना चाहिये।

हिन्दी साहित्य को पाठकों तक पहुँचाने और पाठकों की संख्या बढ़ाने में समीक्षा बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निबाह चुकी है और आगे भी निबाह सकती है, शर्त केवल यह है कि वह निष्पक्ष हो, ईमानदार हो और पाठकों की भाषा में उनसे बात करे।

क्रमश:


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