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| 08.16.2007 |
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प्रतीक्षा डॉ. शैलजा सक्सेना |
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मन की बगिया भरी-भरी,
घर का चौबारा सूना
दस्तक की थापों से वँचित,
दरवाज़ा भी देख रहा
स्मृतियों के जँगल में
मैं,
कब से यूँ ही भटक रही
तेरे उस मधुर हास्य को,
फिर से सुन मन भरने को
बीते दिन उलझी बातों को,
अपनी अँगुली से सुलझा
कैसी बाल-सुलभ ये बातें,
फिर भी मन की ज़िद आगे |
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