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05.03.2012
 
प्रतीक्षा
डॉ. शैलजा सक्सेना

मन की बगिया भरी-भरी, घर का चौबारा सूना
साँझ ढले यह निविड़ अकेलापन हो जाता दूना ।

दस्तक की थापों से वँचित, दरवाज़ा भी देख रहा
उम्र बीतती पतझड़ जैसी
, ठूँठ सरीखे सा रहना।

स्मृतियों के जँगल में  मैं, कब से यूँ ही भटक रही
सूँघ रही हूँ हर घटना के
, पत्तों में तेरा होना।

तेरे उस मधुर हास्य को, फिर से सुन मन भरने को
चलते
-चलते  बीच राह में ठिठक अचानक ही थमना।

बीते दिन उलझी बातों को, अपनी अँगुली से सुलझा
सुख से पल जो बीते अपने
, जीने की फिर इच्छा करना।

कैसी बाल-सुलभ ये बातें, फिर भी मन की ज़िद आगे
प्रियतम तुम ही लिख भेजो
, मुझको है अब क्या करना।।


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