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| 08.16.2007 |
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मुक्तिबोध
के नाम डॉ. शैलजा सक्सेना |
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मुक्तिबोध कि प्रसिद्ध कविता “चाँद का मुँह टेढ़ा है” की अमर पंक्तियाँ हैं – “लिया बहुत-बहुत अधिक, दिया बहुत-बहुत कम इन्हीं पंक्तियों को समर्पित है यह कविता: ओ मुक्तिबोध की अमर आत्मा!, देश अभी यह मरा नहीं
है। अब भी गाज़ी, नादिरशाही, तौर-तरीके चले हुए हैं, अब भी ’मेरा-तेरा’ का चाकू, काँट-बाँट में लगा हुआ
है, अब भी धर्म, राजनीति के हाथों, कौड़ी दामों बिका हुआ
है, अब भी दिन गिन-गिन कर जीवन, जैसे-तैसे मुश्किल से
चलता, अब भी कमला बर्तन माँजे, सरला वही झींकती रहती, फिर भी कहती हूँ मुक्तिबोध ओ, देश अभी यह मरा नहीं
है, उस अतीत की गौरवगाथा, अब तक देखो भूल ना पाये, अर्थ, काम में, विश्व-कथा में, हमने भी पन्ने जोड़े
हैं, अंतरिक्ष – प्रक्षेपास्त्रों में, हमने भी नव नाम
कमाया, देह पुरानी, साँस नई पर, रुक-रुक ही चाहे चलती है, पर भारत की मान-कहानी, आगे ही आगे बढ़ती है। |
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