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| 08.16.2007 |
| महादेवी की सूक्तियाँ डॉ. शैलजा सक्सेना |
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दीपशिखा
१.
सत्य
काव्य का साध्य और सौन्दर्य साधन है। एक अपनी एकता में असीम रहता है और
दूसरा अपनी अनेकता में अनन्त। इसी से साधन के परिचय – स्निग्ध खण्डरूप से
साध्य की विस्मय – भरी अखण्ड स्थिति तक पहुँचने का क्रम आनन्द की लहर पर
लहर उठाता हुआ चलता है।
२.
अनुभूति
को ऐसी स्थिति में रखकर देखना आवश्यक हो जाता है जहाँ वह हमारी सीमा में
रहकर भी सत्य की व्यापकता में अपनी निश्चित स्थिति बनाए रहे। X
X
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X
३.
अपने विषय
पर केन्द्रित होकर उसे जीवन की अनन्त गहराई तक ले जाना अनुभूति का लक्ष्य
रहता है, इसी से हमारी व्यक्तिगत अनुभूति जितनी निकट और तीव्र होगी दूसरे
का अनुभूत सत्य हमारे समीप उतना ही असदिन्ग्ध होकर आ सकेगा।
४.
जीवन के
निश्चित बिंदुओं को जोड़ने का कार्य हमारा मस्तिष्क कर लेता है पर इस क्रम
से बनी परिधि में सजीवता के रंग भरने की क्षमता हृदय में ही सम्भव है।
काव्य या कला मानो दोनों का सन्धिपत्र है; जिसके अनुसार बुद्धिवृति झीने
वायुमण्डल के समान बिना भार डाले हुए ही जीवन पर फैली रहती है और
रागात्मिका वृति उसके धरातल पर, सत्य को अनन्त रंग-रूपों में चिर नवीन
स्थिति देती रहती है। अतः कला का सत्य जीवन की परिधि में सौंदर्य के माध्यम
द्वारा व्यक्त अखण्ड सत्य है।
५.
केवल
बाह्य रेखाओं और रंगों का सामंजस्य ही सौंदर्य कहा जाये तो प्रत्येक भूखण्ड
का मानव-समाज ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति भी अपनी रुचि में दूसरे से भिन्न
मिलेगा। X
X
X
सत्य की प्राप्ति के लिए काव्य और कलाएँ जिस सौंदर्य का सहारा लेते हैं, वह
जीवन की पूर्णतम अभिव्यक्ति पर आश्रित है, केवल बाह्य रूपरेखा पर नहीं।
प्रकृति का अनन्त वैभव प्राणिजगत् की अनेकात्मक गतिशीलता, अन्तर्जगत की
रहस्यमयी विविधता सब कुछ इनके सौंदर्यकोष के अन्तर्गत है_
६.
उपयोग की
कला और सौंदर्य की कला को लेकर बहुत से विवाद सम्भव होते रहे, परन्तु कला
के यह भेद मूलतः एक दूसरे से बहुत दूरी पर नहीं ठहरते।
७.
सत्य तो
यह है कि जब तक हमारे सूक्ष्म अन्तर्जगत का बाह्य जीवन में पग-पग पर उपयोग
होता रहेगा तब तक कला के सूक्ष्म उपयोग सम्बंधी विवाद भी विशेष महत्व नहीं
रख सकते। हमारे जीवन में सूक्ष्म और स्थूल की जैसी समन्व्यात्मक स्थिति है
वही कला को, केवल स्थूल या सूक्ष्म में निर्वासित न होने देगी।
८.
एकान्त
उपयोग की कल्पना सहज नहीं है।
९.
व्यक्ति
के संस्कार, परिस्थिति, मानसिक स्थिति आदि के अनुसार उसकी मात्रा में
न्यूनाधिक्य हो सकता है, परन्तु उसके उपयोग में इतनी विभिन्नता संभव नहीं
कि एक में हर्ष को संचारते और दूसरे में विषाद का उद्रेक।
१०.
उपदेशों
के विपरीत अर्थ लगाए जा सकते हैं, नीति के अनुवाद भ्रान्त हो सकते हैं,
सच्चे कलाकार की सौंदर्य सृष्टि का, अपरिचित रह जाना संभव है, परन्तु बदल
जाना संभव नहीं। X
X
X
इसी से
कलाकारों के मठ नहीं निर्मित हुए, महन्त नहीं प्रतिष्ठित हुए, साम्राज्य
नहीं स्थापित हुए और सम्राट नहीं
अभिषिक्त
हुए। कवि या कलाकार अपनी सामान्यताओं में ही सबका ऐसा अपना बन
गया
कि
समय-समय पर धर्म, नीति आदि को जीवन के निकट पहुँचने के लिए उससे परिचय पत्र
माँगना पड़ा।
११.
कला जीवन
की विविधता समेटती हुई आगे बढ़ती है, अतः सम्पूर्ण जीवन को गला-पिघला कर
तर्क-सूत्र में परिणत कर लेना उसका लक्ष्य नहीं हो सकता।
१२.
काव्य में
बुद्धि हृदय से अनुशासित रहकर सक्रियता पाती है, इसी से उसका दर्शन न
बौद्धिक तर्क प्रणाली है और न सूक्ष्म बिंदु तक पहुँचाने वाली विशेष विचार
पद्धति। वह तो जीवन को, चेतना अनुभूति के समस्त वैभव के साथ स्वीकार करता
है। अतः कवि का दर्शन, जीवन के प्रति उसकी आस्था का दूसरा नाम है।
१३.
कलाकार के
जीवन दर्शन में हम उसका जीवनव्यापी दृष्टिकोण मात्र पा सकते हैं।
१४.
प्रत्यक्ष
ज्ञान के ऊपर, अनुमान स्मृति आदि की प्रत्यक्ष छाया फैली रहती है।
१५.
अपनी
अपूर्णता नहीं पूर्णता में भी दृष्टि, रंगों के अभाव में रंग ग्रहण करने की
क्षमता रखती है और रूपों की उपस्थिति में भी उनकी यथार्थता बदल सकती है
X
X
X
इसीलिए वैज्ञानिक सीखकर भूलता है
और कलाकार भूलकर सीखता है।
१६.
यथार्थ के
अकेले पक्ष को पुञ्जीभूत कर इस तरह सजाना पड़ा, कि मनुष्य उसे खोजनe
के लिए जीवन को छिन्न-भिन्न करने लगा।
१७.
संसार से
आदान मात्र मनुष्य को पूर्ण संतोष नहीं देता, उसे प्रदान का भी अधिकार
चाहिए और इस अधिकार को विकसित चेतना ही
देख पाती
है।
महादेवी :
“सुहाग
के नूपुर”
– पर टिप्प्णी
“स्त्री
जब किसी साधना को अपना स्वभाव और किसी सत्य को अपनी आत्मा बना लेती है, तब
पुरुष उसके लिए न महत्त्व का विषय रह जाता है, न भय का कारण, इस सत्य को
सत्य मान लेना पुरुष के लिए कभी सम्भव नहीं हो सका।”
--५५महादेवी
“पुरुष
भी विचित्र है। वह अपने छोटे-से-छोटे सुख के लिए स्त्री को उसका प्राप्य ही
दे डालता है और ऐसी निश्चिन्तता से, मानों वह स्त्री को उसका प्राप्य ही दे
रहा है। सभी कर्त्तव्यों को वह चीनी से ढकी कुनैन के समान मीठे-मीठे रूप
में ही चाहता है। जैसे ही कटुता का आभास मिला कि उसकी पहली प्रवृत्ति सब
कुछ जहाँ-का-तहाँ पटक कर भाग खड़े होने की होती है।”—४४
महादेवी (अतीत के चलचित्र) |
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