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05.23.2017
 
माँ
डॉ. शैलजा सक्सेना

टेलिफ़ोन के इस तरफ़ मैं हूँ
मेरी दुनिया है, मेरा वर्तमान है
टेलिफ़ोन के उस तरफ़ तुम हो,
मेरा बचपन है, मेरा अतीत है।
बीच में हज़ारों मील धरती
हज़ारों फीट का आसमान
हज़ारों गैलन पानी के अनेक समुद्र।

तुम देख नहीं सकतीं
मुझे
मेरे घर को
मेरे परिवेश को,

मैं क्या पहनती हूँ
क्या खाती हूँ
कैसे रहती हूँ...

पूछती हो फ़ोन पर
हड़बड़ाई सी...
मिनट भर में
महीनों की चिंता भर देने की
कोशिश करती हो...
“कैसी है तू...?”
तुम्हारा स्वर
हो जाता है पनीला ममता से,

मैं प्रश्न को छूती हूँ उथला ही
सरसराया सा जवाब देती हूँ
“अच्छी हूँ, और तुम?”
तुम अपना आँचल समेट
छिपाती हो स्वयं को...
        “ठीक हूँ”
हम दोनों सच और झूठ के बीच
         रखते हैं पाँव फूँक-फूँक कर
पता न चल दूसरे को
         पाँव में छाले कितने हैं

सच हमेशा रहा है धारदार
धार को ढँका ही रहने दें तो अच्छा!
बिना कहे तुम सुनती हो मेरा सच
बिना कहे मैं जानती हूँ तुम्हारा मन...
ज़िंदगी बदल जाने की कहानी
तुमने भी जी थी कभी
अब मेरी बारी है
जानती हूँ!

कहो तो,
हर बात में सीख देती तुम्हारी निगाहें,
हर बात को सुधारती तुम्हारी अँगुलियाँ
रह लेती हैं कैसे मुझसे दूर....??
अनुभवी हो तुम,
नियति को स्वीकार
झुका लिया मस्तक तुमने...

पर मैं,
हर काम पर अटकती हूँ
खोजती हूँ तुम्हारी जाँचती निगाहों को,
न पाकर उन्हें खुद खो जाती हूँ
कहाँ से लाऊँ ’सही’ करवाने को तुम्हारी आवाज़
अब तक थी जो मेरे साथ।

कल तुम्हारे ’टोकने’ पर अटकती थी मैं
क्रोध से, दुःख से देखती थी तुझको
आज तुम्हारे ’टोकने’ को तरसती हूँ मैं
विवश सी, खोयी सी ढूँढती हूँ तुमको –
तसल्ली बस यही है
टेलिफ़ोन के उस पार तुम हो
मेरा बचपन है...॥
मैं जानती हूँ॥।


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