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05.23.2017
 
क्या भूली??
डॉ. शैलजा सक्सेना

खाने की मेज से
रसोई तक
,
रसोई से खाने की मेज तक
कितने ही फेरे ले चुकी वो
,
याद नहीं..
 

चलते-चलते रुकती है बीच में
भूला सा कुछ याद दिलाने की
कोशिश में स्वयं को..
 

क्या ढूँढ रही थी???
सब्जी काटने का चाकू
या
अपना कोई भूला सपना
?? 

कहाँ रख कर भूल गई???
नमक की शीशी
या
अपना अस्तित्त्व
??

क्या लाने उठी थी??
पानी का गिलास
या
अपनी बची -खुची ताकत
?? 

भूली सी खड़ी रहती है कुछ क्षण,
फिर पुकार पर किसी की
चल पड़ती है
सोचना भूल कर।
 

घूमती है उसी घेरे में,
ज़िंदगी के फेरे में..

 


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