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| 08.16.2007 |
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जेठ की दोपहर
डॉ. शैलजा सक्सेना |
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भरी दोपहरी
पलकें मुँदती धीरे-धीरे
बोली मीठी
थकी-थकी
भरी दोपहरी,
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