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05.23.2017
 
जेठ की दोपहर
डॉ. शैलजा सक्सेना

भरी दोपहरी
मन के पाँखी ने
,
पँख समेटे
चोंच गड़ाई सीने में
और बैठ गया ।

पलकें मुँदती धीरे-धीरे
दाना-पानी
कुछ क्षण को
दूर कहीं पर
छूट गया।

बोली मीठी
चिपकी तालू से
कहने-गाने से
उलसा मन
अब ऊब गया।

थकी-थकी
कैसी बेला है
पँख
- हवा के
सा
रे नाते हवा
हो गये ।

भरी दोपहरी,
पेड़ तले
,
टूटा राही
नींद में कुछ पल
डूब गया ।।

 


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