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ISSN 2292-9754

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02.06.2015


हिमपात

रात भर फेंकता रहा आकाश
रुई की पौनियाँ,
हवा का चरखा
कातता
तार तार!

सवेरे ने देखा
सफेद चादरों से ढँकी
धरती,
रो रही है बिलख कर..

सूरज की बिन्दियाँ
जाने कहाँ गिरा आईं .....

फिर एक नया दिन....

किरणें आई,
सफेद चादर
तार-तार,

आसमान
चुप,

सूरज की बिन्दिया ने
मनुहार से देखा

धरती
के सीने पर
बह निकले
प्यार के कई चहबच्चे !!


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