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05.03.2012
 
गलती
डॉ. शैलजा सक्सेना

गल्तियाँ होती रहीं
तुमसे, मुझसे,
इससे, उससे।

गल्तियों पर गल्तियाँ,
मिल - मिल कर बनते गये गल्तियों के पुलन्दे,
बिखरे हैं जो यहाँ से वहाँ तक,
अनन्त की सीमाओं के बिल्कुल निकट तक।

सब हिसाब - किताब गलत,
गणनाएँ गलत,
संबंध गलत,
भावनाएँ गलत,
यहाँ तक कि हो गई संवेदना भी गलत।

हमने कर दिया प्रकृति को गलत
भोजन गलत,
पानी गलत,
हवा भी गलत,
बूढ़ा इतिहास ढो रहा है राजाओं की गल्तियाँ,
बूढ़ा समाज ढो रहा है प्रजाओं की गल्तियाँ।

कहो तो,
परम सत्य, परम आनन्द, परम चिन्मय,
जो कुछ भी हो तुम,
कहो तो,
इन गल्तियों के बीच जीती, मैं, एक गलत संज्ञा,
क्या ठीक करूँ?
कहाँ से ठीक करूँ?

कि इस गलत - सलत,
गड़ु-मड़ु हिसाब से
कैसे उभरे,
एक सहीं संख्या,
एक सही संज्ञा,
एक सही आवाज,
एक सही भाव,
एक सही नाव,
जो पार ले जाए इस गल्तियों के समुद्र से...
किसी सही टापू पर
पुन: नई गल्तियाँ करने को .........

क्योंकि बहाना है मेरे पास,
आड़ है गल्तियाँ करने की,
कि आखिर मैं मनुष्य ही तो हूँ।


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