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ISSN 2292-9754

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02.15.2016


भारतेतर देशों में हिन्दी

इसी बहाने से -

"कविता मनुष्यता की संवेदन-लय है। वह अमानुषीकरण की प्रक्रिया में सर्जनात्मक हस्तेक्षप है। वह मनुष्य का विवेक जगाती है। जगाए रखती है। जागरूकता बढ़ाती है वह।" ये पंक्तियाँ हैं कवि-आलोचक विनय विश्वास जी की पुस्तक "आज की कविता" से!

मनुष्यता की संवेदन लय, सर्जनात्मक हस्तक्षेप और जागृत विवेक- यह किसी स्थान या काल की बपौती नहीं होता, यह व्यक्ति की निजी संपत्ति होती है, यह व्यक्ति की निजी प्रतिभा होती है, उसका अभ्यास, उसका चिंतन और मनन होता है..यह संवेदन लय, सर्जनात्मक हस्तक्षेप और जागृत विवेक देश के भीतर या विदेश की अजनबी धरती पर किसी को भी हो सकता है। जिस साहित्यकार का साहित्य इन तीन गुणों को अपना कर रचना करता है, वह सफल साहित्यकार होता है। जिस भाषा के साहित्य में यह सब है, वह साहित्य समृद्ध है, विकसित है, प्रतिष्ठित है चाहें वह भारत के बाहर लिखा जा रहा है चाहें वह देश में लिखा जा रहा है बल्कि यह हिन्दी-साहित्य के समृद्ध होने का एक अच्छा प्रमाण है कि वह बाहर रहने वाले हिन्दी भाषियों के द्वारा भी इतना अधिक रचा जा रहा है कि इस विषय पर चर्चा करने के लिये अब हमें सेमिनार करने पड़ते हैं। देश के लेखकों को उसे लेकर चिन्ता में पड़ जाना पड़ता है कि यह प्रवासी है कि अप्रवासी है..आदि..आदि.!! यह सब एक समृद्ध साहित्य की निशानी है।

भारत में हमें आजकल दलित विमर्श, नारी विमर्श और सिने प्रभाव पर लिखे जाना वाला साहित्य अधिक मात्रा में मिलता है। विदेशों में इस तरह से वर्गीकृत करके साहित्य को न ही लिखा जा रहा है और न ही इन मानदंडों पर उन्हें जाँचा जा रहा है। कह सकते हैं कि इस प्रकार के विमर्शों से दूर रह कर लिखे जाने के कारण यह समय विदेशों में लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य के "सुख का समय" है। यह साहित्य मानवीय सरोकारों की व्यापकता को ध्यान में रखते हुये भारतीय मूल्यों और स्थानीय स्थितियों की सशक्त अभिव्यक्ति की चेष्टा करता है।

विदेशों में हिन्दी की स्थिति को जानने के लिए चार स्तरों पर उसकी जाँच की जानी चाहिये:

१. भाषा का व्यावहारिक प्रयोग
२. कम्यूनिटी स्कूलों या मंदिरों/घरों में उसका अध्यापन
३. सरकार के द्वारा मान्यता प्राप्त शिक्षा संस्थानों में भाषा का प्रध्यापन।
४. साहित्य सृजन

विभिन्न देशों में हिन्दी की स्थिति जानने के लिये मैं इन चार आयामों का प्रयोग करूँगी। साथ ही मेरी चेष्टा रहेगी कि इन देशों के प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाओं से आप का परिचय विस्तार से करवाऊँ। सब से पहले मैं आपका परिचय कनाडा में रहने के कारण यहाँ की हिन्दी स्थिति और साहित्य से करवाना चाहती हूँ।

कनाडा में हिन्दी

कनाडा में सरकारी स्तर पर दो मान्यता प्राप्त भाषाओं का प्रयोग होता है; अंग्रेज़ी और फ्रेंच! इन भाषाओं की शिक्षा स्कूल और विश्वविद्यालय के स्तर पर दी जाती है और दो भाषाओं के जानकार के लिये नौकरी मिलना आसान हो जाता है। वैश्विकीकरण के दौर में हर देश आजकल उन भाषाओं को सिखाने पर ज़ोर दे रहा है जहाँ उनका व्यापार अधिक होता है। अमरीका तथा यूरोप की तरह कनाडा भी भारत की बहुल जनसंख्या में अपना बाज़ार ढूँढता है और साथ ही सस्ते श्रम का लाभ उठा कर बहुत से भारतीयों को प्रतिवर्ष कनाडा आने का वीसा देता है। प्रवासी भारतीय अपने साथ अपनी भाषा और संस्कृति को जीवित रखने की तीव्र इच्छा भी लाते हैं और इसके लिये प्रयास करते हुये हिन्दी और अन्य भारतीय भाषायें अपने बच्चों को सिखाने की चेष्टा करते हैं। बहुत से लोग यह प्रश्न करते हैं कि जब भारत में हिन्दी की स्थिति इतनी सुदृढ़ नहीं जितनी कि एक राष्ट्र्भाषा की होनी चाहिये तब विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की क्या आवशयकता है और फिर दुनिया का कामकाज तो अंग्रेज़ी भाषा में चल ही रहा है! यह प्रश्न एक अमरीकावासी भारतीय से पूछने पर उत्तर मिला "मेरे अपने विचार से अमरीका के प्रवासी भारतीयों को हिन्दी की जितनी ज़रूरत है उतनी "भारतवासी" भारतीयों को भी नहीं। क्यों कि अगर यहाँ अमरीका के भारतीय हिन्दी भूल जायेंगे तो ’रामचरितमानस’ भूल जायेगा, प्रार्थनाएँ भूल जायेगा, आरती भूल जायेगा, ताजमहल भूल जायेगा, वह संस्कृति भूल जायेगा जो हज़ारों वर्षों से दुनिया का पथ प्रदर्शन करती रही है। प्रवासी भारतीयों के लिये हिन्दी इस संस्कृति का एकमात्र संचारवाहक है अत: हिन्दी ज़रूरी है यहाँ"।

इस उत्तर से हर प्रवासी सहमत होगा कि अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा को जाने बिना आप अपनी संस्कृति से नहीं जुड़ सकते। अपनी संस्कृति से जुड़ने की भावनात्मक आवश्यकता विदेश में और भी अधिक बढ़ जाती है।

कनाडा में लगभग १६०० भाषायें बोलने वाले लोग रहते हैं। भारतीय भाषाएँ बोलने वाले लोगों के बीच पंजाबी भाषी लोगों की बहुलता है अत: पंजाबी भाषा के रेडियो चैनल, टी.वी चैनल, समाचार-पत्र आदि बहुतायत में दिखाई देते हैं। कुछ स्कूलों में पंजाबी भाषा की शिक्षा भी दी जाती है। इनकी तुलना में हिन्दी बोलने और सीखने वालों की संख्या कुछ कम है। आंकड़ों के अनुसार २००६ में पंजाबी बोलने वालों की संख्या १.२% (३६७,५०५) थी जो २०११ में १.३% (४३०,७०५) हो गई जब कि हिन्दी बोलने वालों की संख्या २००६ में ०.३% (७८२४०) थी और २०११ में भी इनकी संख्या ०.३% (९०, ५४५) ही रही। पर हिन्दीभाषी लोगों के आँकड़े कम होने का एक कारण यह भी है कि प्रांतीय भाषायें बोलने वाले लोग पूछे जाने पर अपनी मातृ भाषा को ही प्रथम स्थान देते हैं चाहे वे हिन्दी बोल और समझ सकते हों। ये लोग हिन्दी की फ़िल्में देखते हैं, हिन्दी गाने सुनते हैं, अपने विज्ञापन भी हिन्दी में देते है और मिलने पर हिन्दी बोलते भी हैं। दूसरी पीढ़ी के साथ भी यही स्थिति है। ये बच्चे हिन्दी सही तरह से न बोल पाने के कारण संकोच में रहते हैं पर हिन्दी समझ लेते हैं और हिन्दी के कार्यक्रम भी देखते हैं।

कनाडा में भारतीयों का आगमन १९०३ में माना जाता है। सब से पहले आनेवाले भारतीय पंजाबी सिख थे जो कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया नामक राज्य में आये। वे हांगकांग में प्रथम विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश सैनिकों के साथ थे और इसलिये कनाडा आये थे ताकि उन्हें अधिक पैसा मिल सके। १९०८ तक यहाँ ५,२०९ भारतीय आ चुके थे। जनवरी ८, १९०८ को एक रेगुलेश्न पास किया गया जिसके अनुसार किसी भी भारतीय को तब तक कनाडा में प्रवेश की आज्ञा नहीं दी जायेगी जब तक कि वह अपने जन्मस्थान से सीधा यात्रा कर के नहीं आता। इससे हाँगकाँग या जापान से भारतीय सैनिकों के कनाडा आने पर रोक लग गई। दक्षिणी एशियाई लोगों के प्रति दुर्भावना का चरम दिखाई दिया "कोमागाटा मारू" कांड में। ब्रिटिश कोलम्बिया में रहने वाले एक धनी पंजाबी सिख ने भारत से लोगों को बुलाने का प्रबंध जापानी जहाज़ ’कोमागाटा मारू" से किया था। उस जहाज़ में ३०० सिख, २४ मुसलमान और १२ हिंदू थे। वेन्कूवर में इस जहाज़ से लोगों को उतरने नहीं दिया गया। हस्साम रशीम और सोहन पाठक के नेतृत्त्व में इसका विरोध हुआ, उस समय भारतीयों ने २२००० डालर एकत्र कर के कोर्ट में अपील की पर शर्मनाक तरीक़े से सरकार ने उनकी अपील ठुकरा दी और जुलाई १९ को पुलिस के द्वारा जहाज़ को वापस समुद्र में भेज दिया गया। जहाज़ के लोगों और पुलिस में झड़प हुई और केवल २० लोगों को जहाज़ से उतरने दिया गया। इस घटना ने भारतीयों को कनाडा आने के लिये हतोत्साहित किया ।


(चित्र: कोमागाटा मारू के यात्री भारतीय लोग; साभार- Image: (गूगल)James Luke Quiney fonds/City of Vancouver Archives/AM 15984-:CVA 7-122)

बाद में कनाडा की सरकार ने दबाब में आकर यहाँ रहने वाले भारतीयों के बच्चों और पत्नियों को आने की स्वीकृति दे दी परन्तु भारतीयों की संख्या बढ़ने के स्थान पर १९२० तक केवल १३०० रह गई। १९३० में सरकार ने "ग्रेट डिप्रैशन" के समय भारतीय समुदाय की मज़बूत आर्थिक स्थिति को देखते हुये प्रत्येक वर्ष १०० भारतीयों को आने की स्वीकृति दी। यह नियम १९५७ तक चला। इस समय कुल भारतीयों की संख्या यहाँ बहुत कम थी और जो भारतीय यहाँ थे भी उनमें पंजाबी भाषी ही अधिक थे। १९४७ के आस पास भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति और विभाजन के बाद भारत से आने वाले लोगों में गोआ के लोगों की बहुतायत थी। गोआ तब भी पुर्तगालियों की कोलोनी था और गोआ के लोग समझ नहीं पा रहे थे कि वे हिन्दु प्रधान भारत में या मुसलमान प्रधान पाकिस्तान में सुरक्षित रह पायेंगे। अत: उस समय उन लोगों ने विदेश की राह ली और बहुत से लोग कनाडा आये। १९६६ में वीसा देने पर हर प्रकार के नियम हटा दिये गये। कनाडा के प्रवासी लोगों की संख्या कम होने पर कनाडा ने "पांइट्स सिस्टम" बना दिया ताकि अधिक लोग आ सकें। इसके बाद से हज़ारों भारतीय मूल के लोग कनाडा आये। इनमें न केवल भारत से आने वाले लोग थे अपितु दक्षिणी अफ्रीका से आने वाले लोग भी थे। ईदी अमीन के शासन काल में युगांडा से बड़ी संख्या में भारतीयों को निष्कासित किया गया था। हज़ारों लोग वहाँ से भी कनाडा आये। इसी तरह फिजी, सूरीनाम, ट्रिनिडाड से नौकरी और सुरक्षा की खोज में भारतीय मूल के लोग कनाडा आये। ये लोग अंग्रेज़ी के साथ घर में भारतीय बोलियाँ भी बोलते हैं जिनमें उनके उस देश की भाषाओं का मिश्रण भी होता है जहाँ से वो आये हैं।

इस तरह कनाडा में भारतीयों का इतिहास प्रारंभ हुआ और यहाँ की पहली भारतीय भाषा पंजाबी बनी जिसका प्रचार-प्रसार हुआ १९०० के आसपास से ही प्रारंभ हो गया। हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार की बात बहुत बाद में आई। १९०८ में पंजाबी की पहली कक्षा, खालसा दीवान सोसाइटी, वैंकूवर गुरुद्वारे से हुई जबकि हिन्दी की पहली कक्षा का कोई रिकार्ड नहीं मिलता। पंजाबी का पहला समाचार पत्र १९१० में "स्वदेश सेवक" के नाम से निकला पर हिन्दी का समाचार पत्र बहुत समय तक नहीं निकला। आज भी कनाडा में पंजाबी का प्रभुत्त्व हिन्दी की अपेक्षा अधिक है। पंजाबी रेडियो/टी.वी, चैनल और पत्र-पत्रिकायें हिन्दी की अपेक्षा अधिक हैं। पंजाबी के समाचार प्रतिदिन टी.वी. पर प्रसारित होते हैं।

जनभाषा के रूप में हिन्दी का प्रयोग

हिन्दी का प्रयोग अधिक भारतीयों के आने पर भी संभवत: उतना ही रहा। १९९६ में यहाँ २.४% लोग साउथ ऐशियन थे और २०११ में यह संख्या ४.८% हो गई लेकिन इस से हिन्दी बोलने वाले लोगों की संख्या नहीं बढ़ी। २००६ में जहाँ ०.३ % लोग हिन्दी बोलते थे वहाँ २०११ में भी ०.३% लोग ही हिन्दी बोलते हैं जबकि पंजाबी बोलने वाले २००६ में १.२% थे और २०११ में १.३% हैं। कनाडा के सरकार इन आँकाड़ों के तथ्य को समझते हुये पंजाबी भाषा के प्रचार-प्रसार पर निस्संदेह हिन्दी की अपेक्षा अधिक ध्यान देती है। अन्य बहुत सी भारतीय भाषायें जैसे कि तमिल, बंगाली और गुजराती भाषाओं की स्थिति भी बहुत दृढ़ है। उदाहरण के रूप में यह चार्ट देखें:

कनाडा में बोली जाने वाली भारतीय भाषायें
(स्टैटेस्टिक्स कनाडा- Statistics Canada /सरकारी सूत्र)
भाषा कुल संख्या:
भाषा प्रयोग
केवल बोलते हैं अधिकतर बोलने
वाले
समान भाषा प्रयोग प्राय: प्रयोग
पंजाबी 280,540 132,380 71,660 29,220 47,280
तमिल 97,345 45,865 29,745 9,455 12,280
हिन्दी 165,890 114,175 116,075 19,090 26550
उर्दू 89,365 30,760 27,840 12,200 18565
गुजराती 60,105 18,310 16,830 7,175 17,790
 मलयालम 6,570 1,155 1,810 505 3,100
बंगाली 9,7052 12,840 9,615 2,780 4,470

    इस पर भी कनाडा की सरकार का प्रयत्न है कि सभी आवश्यक सुविधायें अंग्रेज़ी और फ्रेंच के अतिरिक्त मुख्य अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में उपलब्ध हो सकें। इस नियम के अनुसार यहाँ कोर्ट, अस्पताल (मानसिक रोग केंद्रो में), म्यूनिसिपल सर्विसेज़ (नगरपालिका की सेवाओं) आदि में हिन्दी और पंजाबी में भी सेवायें उपलब्ध हैं। ये सेवायें ओँटारियो, ब्रिटिश कोलम्बिया, अल्बर्टा और मेनीटोबा में भी हिन्दी और पंजाबी में उपलब्ध बताई जाती हैं परन्तु अन्य प्रांतों में इनके होने के विषय में स्पष्ट आँकडे नहीं हैं।

हिन्दी पाठ्यक्रम में:

हैरिटेज क्लास:

हिन्दी कनाडा के स्कूलों के नियमित पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ाई जाती। वह प्रारंभिक शिक्षा के रूप में विभिन्न स्कूल-बोर्ड द्वारा "हैरिटेज क्लास" के तौर पर पढ़ाई जाती है। हर बड़े शहर का स्कूल बोर्ड शहर में एक स्कूल में ये कक्षायें उपलब्ध कराता है। प्राय: ये कक्षायें शनिवार को या स्कूल के बाद सप्ताह में एक दिन दी जाती हैं। इन कक्षाओं में बच्चे हिन्दी बोलना, लिखना और पढ़ना सीखते हैं परन्तु ये कक्षायें खुली कक्षायें होती हैं यानी कि कोई भी बच्चा किसी भी समय से इन कक्षाओं में आकर बैठ सकता है और साथ ही ये एक ही स्तर की कक्षायें होती हैं अत: बच्चे बहुत अधिक सीख नहीं पाते। उदाहरणत: जिस बच्चे को कक्षा एक की हिन्दी आती है वह बच्चा कक्षा तीन के स्तर की हिन्दी जानने वाले के साथ बैठता है और इस कक्षा में भी २ महीने बाद कोई भी नया बच्चा आकर बैठ सकता है और फिर शिक्षक को पूरी कक्षा को उस नये बच्चे के साथ फिर से कोर्स पढ़ाना पडता है। इस तरह की पढ़ाई से बच्चे बहुत ज़रूरी बातें तो हिन्दी में बोलना सीख जाते हैं परन्तु उस स्तर से आगे नहीं बढ़ पाते। उनकी भाषा के प्रति रुचि भी इस तरह के अव्यवस्थित वातावरण में समाप्त हो जाती है और शिक्षक के लिये भी सारे विद्यार्थियों को साथ लेकर चलना कठिन हो जाता है।

मंदिरों में हिन्दी कक्षाएँ:

कनाडा के प्रत्येक शहर में भारतीय जनसंख्या है। जहाँ भी भारतीय हैं उन्होंने अपने धर्म और संस्कृति को बचाये और आगे चलाये रखने के लिये मंदिरों का निर्माण किया है। यदि वे ज़मीन खरीद कर, उस पर बड़े मंदिर नहीं बना पाये तो उन्होंने घरों के बेसमेंट (तलघर) में मंदिर बनाये हैं। ये मंदिर धार्मिक स्थल के साथ ही सांस्कृतिक केंद्र भी हैं जहाँ विधि विधान से सभी बड़े त्यौहार मनाए जाते हैं, यहीं पर बच्चों को हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषा की शिक्षा भी दी जाती है। यह शिक्षा सप्ताह में एक घंटे की कक्षा में दी जाती है और साथ ही बच्चे भारतीय नृत्य और संगीत भी सीखते हैं।

ओंटेरियो के टोरोंटो शहर में लगभग ६६ मंदिर हैं और उनमें से लगभग ३०% मंदिरों में हिन्दी भाषा की शिक्षा दी जाती है। टोरोंटो के लक्ष्मीनारायण मंदिर, गुरमंदिर, चिन्मय मिशन, हिन्दू हैरिटेज सेंटर, ओकविल मंदिर, विष्णु मंदिर, हिन्दू सभा मंदिर आदि ऐसे बड़े मंदिर हैं जहाँ पर प्रतिवर्ष अनेक विद्यार्थी हिन्दी पढ़ने आते हैं। इसके अतिरिक्त १९९४ से "हिन्दु लर्निंग इंस्टीट्यूट" के श्री जगदीश शारदा शास्त्री और डॉ. रत्नाकर नराले, डॉ. भारतेंदु श्रीवास्तव (रामायण गान के माध्यम से) हिन्दी की शिक्षा दे रहे हैं। १९९० के आसपास हिन्दी प्रेमी डॉ. शिवनंदन यादव ने भी घर में प्राइवेट हिन्दी की कक्षायें देनी शुरू की थीं और यह स्कूल कुछ वर्षों तक चला था जिसमें यहाँ के हिन्दी के कुछ कवि और कवियत्रियों जैसे आशा बर्मन, दीप्ति अचला कुमार, शैल शर्मा आदि ने बच्चों को पढ़ाया था। इस तरह के और भी कई प्राइवेट स्कूल, जैसे "फ्रीडम योगा" (संदीप कुमार त्यागी) यहाँ हैं जो हिन्दी भाषा की शिक्षा देते हैं।

कनाडा की राजधानी ओटवा में "मुकुल हिन्दी स्कूल” है जहाँ सभी स्तरों पर कक्षायें दी जाती हैं। मुकुल हिन्दी स्कूल की स्थापना सन १९७१ में हुई थी और कुछ वर्षों के बाद ही इसे स्कूल बोर्ड ने मान्यता दे दी। अब इस में शिक्षा का सारा व्यय स्कूल बोर्ड उठाता है और पाठ्यक्रम निर्धारण और कक्षायें चलाने का भार स्कूल पर है। सरकारी मदद होने के कारण यह स्कूल व्यवस्थित रूप से आज भी चल रहा है।

ऐसे ही ब्रिटिश कोलंबिया में बर्नबी में विश्व हिन्दु परिषद ने १९७५ से, वैदिक हिन्दु सोसायटी ऑफ कैलगरी ने १९८० से, कैलगरी रामायन भजन मंडली ने १९८२ से, वैंकुवर के महालक्ष्मी मंदिर ने १९९१ से, सरी की वैदिक हिन्दु कल्चरल सोसाइटी ने १९९७ से और रिचमंड की वैदिक कल्चरल सोसाइटी ने २००४ से हिन्दी की शिक्षा देनी प्रारंभ करी ( साभार- श्रीनाथ द्विवेदी, Hindi activities in Canada) इन शहरों में भी प्राइवेट हिन्दी कक्षायें और सरकारी हैरिटेज कक्षायें दी जाती हैं। अल्बर्टा की "हिन्दू सोसाइटी" में कक्षायें दी जाती हैं। इसके अलावा वहाँ "अल्बर्टा हिन्दी परिषद" का हिन्दी स्कूल ऐसा अकेला हिन्दी स्कूल है जिसके पास अपनी इमारत है। वहाँ १९८५ से हिन्दी कक्षायें चलती है। इसी तरह सेंट जॉन्स में प्रो. एस.पी. सिंह के साथ कुछ इच्छुक माता-पिता ने मिल कर हिन्दी कक्षाएँ १९८० से प्रारंभ की। प्रो. सिंह ये कक्षायें मैमोरियल कॉलेज में लेते थे पर १९९२ में ये कक्षायें रोक दी गईं। मैनीटोबा में पहले ये कक्षायें मंदिर में ली जाती थीं परन्तु १९९८ में यह वहाँ के भारतीय भवन में पढ़ाई जाती हैं। नोवास्कोशिया के हैलीफैक्स शहर में कुछ हिन्दी प्रेमियों ने हिन्दी की कक्षायें १९७२ से १९८३ तक चलाईं।

विश्वविद्यालय के स्तर पर:

कनाडा के कुछ विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है जैसे ओँटारियो में; यूनिवर्सिटी ऑफ टोरोंटो, यॉर्क यूनिवर्सिटी, वैस्टर्न यूनिवर्सिटी, ब्रिटिश कोलंबिया में यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया में ईस्ट एण्ड साउथ एशियन लेन्गुएजस विभाग के अन्तर्गत बी.ए. हिन्दी की डिग्री प्राप्त की जा सकती है। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया ने १९७० में हिन्दी का बी.ए. के स्तर पर कोर्स डिग्री रूप में प्रारंभ किया। डॉ. एस. कर्ल पहले हिन्दी प्राध्यापक के रूप में नियुक्त किये गये। १९७२ में यूनिवर्सिटी ऑफ टोरोंटो ने हिन्दी के कोर्स देने प्रारंभ किये जो आज तक चल रहे हैं। प्रो. बी.एम सिन्हा ने मैकगिल यूनिवर्सिटी में १९८४-८५ में हिन्दी पढ़ाई। मॉन्ट्रियल स्थित मैकगिल यूनिवर्सिटी बहुत प्रसिद्ध है और वहाँ ९७३७ कोर्स में पढ़ाई उपलब्ध है परन्तु आज की तिथि में हिन्दी भाषा पर कोई कोर्स अलग से उपलब्ध नहीं है, एक कोर्स रिलिजियस स्टडीज़ के अंतर्गत हिन्दुइज़्म का पढ़ाया जाता है। २०१५ से अल्बर्टा यूनिवर्सिटी हिन्दी का कोर्स देना प्रारंभ करने वाली है।

कनाडा में हिन्दी की शैक्षिणिक स्तर पर यह धीमी कार्यवाही हिन्दी के भविष्य को चोट पहुँचा रही है। जो विद्यार्थी हिन्दी सीखते हैं वे इसे अपने परिवार से बातचीत करने के लिये सीखते हैं। व्यावसायिक स्तर पर हिन्दी का उपयोग लोगों को अधिक नहीं दिखाई देता। हाँ, पंजाबी लोगों की संख्या अधिक होने से और अपनी भाषा कॆ प्रति प्रतिबद्धता होने के कारण, पंजाबी सीखने पर हिन्दी सीखने से अधिक ज़ोर दिखाई देता है। कनाडा की सरकार इन भाषाओं के प्रति उस प्रकार का उत्साह नहीं दिखाती जिस प्रकार अमरीकी सरकार दिखाती है।

स्कूलों के अतिरिक्त हिन्दी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भाषा माध्यम भी है। हिन्दी प्रेमियों ने साहित्य सृजन के माध्यम से हिन्दी भाषियों को हिन्दी साहित्य और संस्कृति से जोड़े रखने की चेष्टा की है।

क्रमश:


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