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05.23.2017
 
"बच्चा"
डॉ. शैलजा सक्सेना

आधी रात फिर बच्चा रोया।
जाने किन सपनों में था,
बेगाने या अपनों में था,
खोया था या रहा पास,
शायद टूटी कोई आस।।
आधी रात, फिर बच्चा रोया।

भूली पिछली कोई लड़ाई,
फिर सपने में शायद आई,
या फिर इच्छाएँ पगली
पागल उसे बना आई।।
आधी रात फिर बच्चा रोया।

क्षण पहले तो मुस्काया,
खिल-खिल कर था हँस आया,
प्यार से किसने चिपटाया?
मीत मिला क्या मन भाया?
शायद खोया कुछ पाया
फिर होंठ सिकोड़े, फैलाए,
बंद आँख, आँसू आए,
देख किसे यह डर जाए,
घर, घबराकर जग जाए,
खूब हिलाया, समझाया।
आधी रात फिर बच्चा रोया।

सपन सरीखी सारी दुनिया,
कौन गिने खोना पाना,
कष्ट हुए या मिली खुशी,
क्या सपने सच हो पाए?
सदियों से कहते आए,
पंडित ऋषि सब समझाएँ,
दुनिया नींद, सपन जीवन,
आँख खुलें फिर घर आए,
नश्वर तन, क्या पाया खोया?
आधी रात फिर बच्चा रोया।

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