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अक्सर
हटने लगी है नज़र पाये हुए से
अप्राप्य सब याद आने लगा है,
हर बीता पल सताने लगा है।
दु:ख है
कि ’कल’ का वह पल,
चिंगारी से भभक कर आग क्यों नहीं बना
जीवन की उपलब्धियों का भाग क्यों नहीं बना?
संभावनाएँ रहते हुए भी
क्यों नपुंसक रह गया?
वक्त के रास्ते में मौन क्यों ढह गया?
’कल’ का वह पल अगर सार्थक हो जाता,
तो आज मैं हिमालय हो जाता।
पर,
संभावना केवल संभावना रह गयी,
कर्मठता केवल घोषणा सी बह गयी।
जीवन की मेज़ पर ’कल’ का काम
’पैंडिंग" आज भी पड़ा है
और दफ़्तर के बाबू सा मेरा मन
अतीत की मृत देह के पास ठगा सा खड़ा है।
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