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05.03.2012
दो

पुनर्नवा : एक अंश
(आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी)

डॉ. शैलजा सक्सेना (प्रेषक)


एक दिन देखा गया कि रूपगर्विता नगरश्री मंजुला अपने सारे अभिमान को ताक पर रखकर उदास-भाव से देवरात के आश्रम की ओर नंगे-पाँव चली जा रही है। हलद्वीप के लोगों के लिए इससे बड़ा आश्चर्य और कुछ नहीं था। आत्म-गौरव की प्रतिमा, अभिमान की मूर्त्ति, शोभा की अविजित रानी, नगर-रसिकों की आकंक्षा-भूमि मंजुला अकेली चल पड़ी है। साथ में कोई दास-दासी नहीं है, रथ नहीं है, पालकी नहीं है, हाथी-घोड़े नहीं हैं, वह सब प्रकार से अकेली है।

हलद्वीप के नगरवासियों ने कभी इस प्रकार की बात की कल्पना भी नहीं की थी। मंजुला पर अभिमानिनी के रूप में ही परिचित थी। उसके बारे में सैंकड़ों किंवदन्तियाँ प्रचलित थीं। कहा तो यहाँ तक जाता था कि वह नित्य एक घड़े दूध से स्नान करती है। इधर सरस्वती-विहार वाली नोंक-झोंक ने नगर में अनेक प्रकार की किंवदन्तियों को उकसावा दिया था। लोगों ने आश्चर्य के साथ सुना था कि मंजुला में अनेक परिवर्त्तन हुए हैं। वह अपना अधिकांश समय अब पूजा-पाठ में बिताती है, व्रत-उपवासों का विधिवत्‌ उद्यापन करती है, उसकी वीणा से अब केवल विरह के स्वर झंकृत होते हैं। परन्तु इन बातों की सच्चाई में बहुत थोड़े लोगों को विश्वास था। बुद्धिमान व्यक्तियों ने सिर हिलाकर कहा थ – देखते रहो, जनम की विलासिनी, करम की मायाविनी गणिका अगर पूजा-पाठ करने लगे, तो मानना होगा कि बबूल में भी कमल के फूल खिलतए हैं! लेकिन किंवदन्तियाँ अमूलक नहीं थीं। मंजुला में सचमुच परिवर्त्तन हुआ था। वह नृत्य को महाभाव का साधन मानने लगी थी, अपने को खोकर अपने को पाने की ओर अग्रसर होने लगी थी। निस्सन्देह उसमें व्याकुलता थी। वह महाभाव का रहस्य समझना चाहती थी। किससे पूछे, कौन बतायेगा कि महाभाव क्या है? एकमात्र देवरात ही बता सकते थे, पर वे मंजुला के लिए दुरभिगम्य थे। आजीवन जिन ब्रह्मास्त्रों का उसने वशीकरण का उपाय मानकर अभ्यास किया था, वे देवरात से टकराकर चूर्ण-विचूर्ण हो गये थे। उसने उपेक्षा की थी। गणिकाशास्त्र में इन अस्त्रों से घायल न होनेवाला नपुंसक माना जाता है। मंजुला ने भी बराबर देवरात को ऐसा ही माना था, पर अब उसे दूसरा ही अनुभव हुआ था। गणिकाशास्त्र से ऊपर भी कुछ है। घायल होने के रूप भी अलग-अलग होते हैं। देवरात नहीं, मंजुला घायल हुई है। कहाँ? किस गहराई में? और क्या सचमुच देवरात किसी अतल में घायल नहीं हुए हैं? मंजुला उत्तर पाना चाहती है, पा नहीं रही है।

इस बीच एक अनर्थ हो गया था। राजसभा में उसकी पुकार हुई थी। उसे सुधि ही नहीं रही। यथासमय वह अनुपस्थित पायी गयी। राजकोप अयाचित अप्रत्याशित रूप से उस पर आ गिरा। देवरात ही उसकी रक्षा कर सकते थे। वे राजा को प्रभावित करने में समर्थ थे। मंजुला को अच्छा बहाना मिल गया। दुःख के आवेदन की देवरात कभी उपेक्षा नहीं करते। मंजुला आज निकल पड़ी है। अकेली।

नगर-भर में खलबली मच गयी। लोगों के आश्चर्य और कौतूहल का ठिकाना नहीं रहा। यह भी क्या सम्भव है कि अभिमानिनी नगरश्री इस प्रकार नगर की गलियों में अकेली चले? उसके पहिनावे में सिर्फ़ एक स्वच्छ साड़ी थी, आभूषण के नाम पर केवल एक हाथ में एक सोने की चूड़ी थी और गले में केवल एक सूत्र का हेमहार था। उसके पैरों में उपानह भी नहीं थे। ऐसा जान पड़ता था कि शोभा ने ही वैराग्य धारण किया है, कान्ति ने ही व्रतोद्यापन किया है, चन्द्रमा की स्निग्ध ज्योत्स्ना ही धरती पर उतर आयी है, पद्मवन की चारुता ने ही धूल पर चलने का संकल्प किया है और रति ने ही उदास-भाव ग्रहण करके धरती को धन्य किया है। निस्सन्देह वह इस वेश में भी मनोहर लग रही थी। शैवाल-जाल से अनुविद्ध होकर भी कमल-पुष्प की शोभा कमनीय होती है, मेघों से आवृत्त चन्द्र-मण्डल की शोभा भी रमणीय जान पड़ती है, मधुर आकृतियों के लिए सब-कुछ मण्डन-द्रव्य ही बन जाता है। नगर के गवाक्ष खुल गये, पौर-वधुओं के चकित नयनों ने नगर की शोभा को धूल पर चलते देखा, बच्चों का दल पीछे-पीछे दौड़ पड़ा, ग्राम-वृद्धों ने एक-दूसरे की ओर कौतूहल-भरी दृष्टि से देखकर कहा, बात क्या है? लेकिन मंजुला ने किसी ओर दृष्टिपात नहीं किया। वह निरन्तर आगे बढ़ती गयी। ऐसा जान पड़ता था कि इस अवस्था में भी उसका अभिमान उसे प्रच्छन्न भाव से अवगुण्ठित किये हुए है।

देवरात के आश्रम के बहिर्द्वार पर आकर वह ठिठक गयी, जैसे स्रोअस्विनी के सामने अचानक शिला-खण्ड आ गया हो। उसने चकित मृग-शावक की भाँति भीत नयनों से चारों ओर देखा, ऐसा लगा जैसे वह किसी ऐसे स्थान पर आ गयी हो जहाँ उसके प्रवेश का अधिकार न हो। क्या करे, क्या न करे? वह सोच नहीं पा रही थी। आश्रम उसे जलते अंगार-जैसा दिखायी दे रहा था, जिसको छूने से सम्पूर्ण रूप से जल जाने की आशंका थी। अभिमानिनी गणिका को पहली बार यहाँ अनुभव हुआ कि वह वह नहीं है जो अब तक अपने को समझती आयी थी। एक बार थके निराश नेत्रों से उसने आश्रम के भीतर देखा। उसकी दृष्टि दो बड़े ही सुन्दर बालकों की ओर गयी। ये बालक दौड़ते हुए उसके पास आ गये और बड़े शिष्ट भाव से बोले, आर्ये, आप क्या हमारे गुरुजी को खोज रही हैं? क्या आप भी पढ़ने आती हैं? हमारे गुरुजी आपको बहुत अच्छी तरह पढ़ायेंगे। आइए, आइए, स्वागत है। मंजुला को सन्देह नहीं रहा कि इन बच्चों को गुरु ने ही ऐसी शिष्ट भाषा बोलना सिखाया होगा। उसके मन में वात्सल्य भाव उदित हुआ। उसने दोनों बच्चों क िर पर हाथ फेरा और प्यार से का, हाँ वत्स, मैं गुरुजी के दर्शन के लिए ही आयी हूँ। उनसे निवेदन करो कि मंजुला दर्शन का प्रसाद पाना चाहती है। दोनों बच्चे दौड़कर गुरु के पास गये और थोड़ी देर में उनके साथ लौट आये। देवरात ने कभी कल्पना भी नहीं की थी की मंजुला इस रूप में उनके द्वार पर उपस्थित होगी। उन्होंने अत्यन्त मधुर वाणी में मंजुला का स्वागत करते हुए कहा, देवि, इस आश्रम को धन्य करने क कारण क्या हुआ? मैं किस सेवा के योग्य हूँ? शुभे, तुम्हारा चेहरा उदास देख रहा हूँ। कल्याण तो है? मंजुला फूट-फूटकर रो पड़ी और अनायास उनके चरणों पर सिर रख दिया। उसने अपने विथुरे अलकों से ही उनका चरण पोंछ दिया और बताया कि अकारण ही उसे राजकोप का शिकार होना पड़ा है। एकमात्र वे ही हैं जो राजकोप का निवारण कर सकते हैं।

देवरात ने उसे आश्वासन दिया, चिन्तित न हों देवि, मैं शक्ति-भर प्रयत्न करूँगा कि तुम्हें कोई कष्ट न हो और राजा कोप शान्त हो। मंजुला आश्वस्त हुई। फिर आँख नीची किये कुछ असमंजस की मुद्रा में खड़ी रही जैसे कुछ कहना चाहती हो, कह नहीं पा रही हो। देवरात ने उत्सुकतापूर्वक पूछा, क्या कहना चाहती हो, देवि! और मधुर-भाव से आश्वस्त करते हुए बोले, कह जाओ, संकोच की क्या बात है?”

मंजुला ने धीमे स्वर में पूछ, आर्य, उस दिन मेरे कविता-पाठ से आपको चोट लगी। अपराधिनी को क्षमा करना, मैं बहुत लज्जित हूँ।

देवरात हँसे, तुम्हारी उस कविता से मुझे चोट लगी? किसने कहा, देवि? फिर उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना बोलते गये, बासी घाब हरा हो गया था, देवि! उसके बारे में न पूछ बैठना, पर उस दिन तुम्हारे भीतर सुप्त देवता का सन्धान मुझे मिला था, सुप्त देवता, जो जाग उठा था।

मंजुला की आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी। फफककर बोली, हाय आर्य, मेरे भीतर देवता भी है, यह बात तो केवल तुमने ही देखी है। लोग तो इसमें मिट्टी का ढेला ही खोजते हैं। मैं अपने पाप-जीवन से ऊब गयी हूँ, आर्य! हाय, इस नरक से मेरा कभी उद्धार भी होगा! उसने दीर्घ निःश्वास लिया।

देवरात ने कहा, मैं भुजा उठाकर कह सकता हूँ, देवि, तुम्हारे भीतर देवता का निवास है। तुम जिस पाप-जीवन की बात कह रही हो वह मनुष्य की बनायी हुई विकृत सामाजिक व्यवस्था की देन है। चिन्ता न करो देवि, उद्धार हो सकता है। तुम्हारा देवता तुम्हारे भीतर बैठा हुआ अवसर की प्रतीक्षा कर रहा है। कोई बाहरी शक्ति किसी का उद्धार नहीं करती। यह अन्तर्यामी देवता ही उद्धार कर सकता है। चिन्ता की क्या बात है, देवि!

मंजुला आँखें फाड़कर देवरात की ओर देखती रह गयी। उसे इन बातों का अर्थ स्पष्ट नहीं हो रहा था। पर बिना अर्थ समझे भी जैसे साम-मान चित्त को अभिभूत कर लेता है; कुछ उसी प्रकार का भाव उसे अनुभव हुआ।

देवरात ने उसे और भी उत्साहित किया, देवता न बड़ा होता है, न छोटा; न शक्तिशाली होता है, न अशक्त। वह उतना ही बड़ा होता है जितना बड़ा उसे उपासक बनाना चाहता है। तुम्हारा देवता भी तुम्हारे मन की विशालता और उज्ज्वलता के अनुपात में विशाल और उज्ज्वल होगा। लोग क्या कहते हैं इसकी चिन्ता छोड़ो। अपने अन्तर्यामी को प्रमाण मानो। वे सब ठीक कर देंगे, देवि!

मंजुला को जैसे नया सुनने को मिला। नवीन बाल-मृगी जैसे बरसते मेघ के रिमझिम संगीत को आश्चर्य से सुनती है, उसी प्रकार वह सुनती रही – चकित, उल्लसित, उत्सुक!

देवरात ने उपसंहार किया, अपने देवता की उपेक्षा न करना, देवि! जाओ, मंगल हो!

मंजुला भहरा गयी। वह इतनी जल्द उपसंहार के लिए प्रस्तुत नहीं थी। वह बहुत सुनना चाहती थी, उसे थोड़े में सन्तोष नहीं हो रहा था। हाय, उसके भीतर भी देवता है – चिर-उपेक्षित, चिर-पिपासित, चिर-अपूजित! उसकी बड़ी-बड़ी आँखें धरती की ओर जो झुकीं सो मानो चिपक ही गयीं। वह दाहिने पैर के नाखून से धरती कुरेदती खड़ी रही। नाना भाव-तरंगों के आघात-प्रत्याघात से वह जड़ प्रतिमा की भाँति निश्चेष्ट हो गयी। देवरात मुग्ध-भाव से उसकी मनोहारिणी शोभा को देखते रहे। वे भी चित्रलिखित-से खड़े-के-खड़े रह गये। श्यामरूप और आर्यंक चकित होकर दोनों को देखते रहे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि इन्हें हो क्या गया है! थोड़ी देर तक यही अवस्था रही। फिर देवरात का ही ध्यान भंग हुआ। बोले, चारुशीले, मैंने जो कहा, उससे तुम्हारे चित्त को आश्वासन नहीं मिला क्या? मंजुला ने आँखें ऊपर उठायीं, बोली, अपराधिनी हूँ, आर्य! आपको सदा गलत समझा है। मैं बिल्कुल नहीं जानती थी, कि कोई मेरे भीतर देवता का भी सन्धान पा सकता है। मुझे अब लगता हि कि केवल आज नहीं, पहले भी तुमने मेरे भीतर के सुप्त देवता को देखा था। मैं आजीवन पाप-पंक में डूबी हुई, तुम्हारी भावनाओं को क्या जानूँ। मैं तो सिर्फ़ यह जानती रही कि लोग मेरे भीतर जाग्रत पशु को ही देखते हैं, उसी का सम्मान करते हैं। जो इस पशु को नहीं देख पाता, उसे दृष्टि ही नहीं है। हाय आर्य, मेरे अन्तरतर का देवता सुप्त रहकर भी तुम्हें जितना प्रभावित कर सका, उसका शतांश भी तुम्हारे जाग्रत देवता से यह पापिनी प्रभावित हो पाती! देवरात ने बीच में ही टोका, ’सुनो देवि, तुम इतनी व्यथित क्यों हो रही हो? अपने पर तुम्हारी यह अनास्था उचित नहीं है। तुम बार-बार अपने को पापिनी और अपराधिनी कहती हो, तो मेरा अन्तरतर काँप उठता है। यहाँ शुद्ध सुवर्ण कहीं नहीं है, सब जगह खाद मिला हुआ है। सब-कुछ शुद्ध सुवर्ण और खाद से बना हुआ हेमालंकार है। किसने यह आभूषण पहन रखा है? उसी को खोजो। मन में खोट न आने दो देवि, तुम नारायण की स्मित-रेखा के समान पवित्र हो, आह्लादक हो, आनन्ददायिनी हो। देवि, जिस देवरात ने तुम्हें देखा था, उस दिन उसे लगा था कि वह कुछ अपूर्व देख रहा है, कुछ नवीन अनुभव कर रहा है। तुम विश्वास मानो देवि, तुम्हारे दर्शनमात्र से देवरात का सम्पूर्ण अस्तित्व उमड़ आता है। निस्सन्देह तुम्हारे भीतर कोई महा आकर्षक देवता बसता है। लोग उसको ठीक नहीं पहचानते। वे मन्दिर को ही आकर्षण का हेतु मान लेते हैं। बिचारे कृपण हैं, उनका देवता भी सुप्त है। जागेगा, मगर कब, कहना कठिन है।

मंजुला का अंग-अंग द्रवित हो उठा। नस-नस में आनन्द की अननुभूत लहरी सिहरन पैदा कर गयी। वह क्या सुन रही है? उसे देखकर देवरात का सम्पूर्ण अस्तित्व उमड़ आता है! उसे वे नारायण की स्मित-रेखा के समान पवित्र और आह्लादवर्धिनी समझते हैं, यह भी का चाटूक्ति है? हाय, कितनी बेधक चाटूक्ति है यह! मंजुला के अन्तरतर को वह वेध रही है। अब तक सुनी हुई चाटूक्तियाँ उसे ढक देती रही हैं। आज की उक्ति उसे उधेड़ रही है। नारायण की आह्लादिनी स्मित-रेखा! पहले उस स्मित-रेखा ने मोहिनीरूप में ही संसार को वशीभूत किया था। आज उसका पवित्र आह्लादक रूप प्रकट हो रहा है। मंजुला अपने को पा रही है।

देवरात ने पुनः कहा, ’देवि, तुम्हारे नृत्य में तुम्हारा देवता अभिव्यक्त होता है। देवरात उसे पहचानता है।

मंजुला अपने को सम्हाल नहीं सकी। उसने आवेशपूर्वक देवरात के चरणों पर सिर रख दिया। देवरात पीछे हट गये। मंजुला बोली, इतने से वंचित न रहने दो, आर्य! मैं फटी जा रही हूँ। ऐसा जान पड़ता है कि इस सारे आवरण को छिन्न करके एक नयी मंजुला निकलना चाहती है। इस कलुषित मंजुला के भीतर से शुद्धसत्त्वा अकलुष मंजुला! वह अकलुष मंजुला ही तुम्हें समर्पित है, आर्य! उसे अपने पवित्र ममत्व से वंचित न करो। हाय आर्य, बड़ी देर हो गयी!

देवरात भाव-विह्वल, अचंचल!

क्षणभर में क्या-का-क्या हो गया। देवरात का सारा सत्त्व मथित होकर ढरक जाना चाहता है।

मंजुला प्रकृतिस्थ हो गयी। बोली, इससे अधिक लोभ नहीं करूँगी, आर्य! इस नवीन मंजुला को मत भूलना। पुरानी को क्षमा कर देना!

देवरात ठगे-से, खोये-से, हारे-से, स्तब्ध!

मंजुला ने उनके चरणों की धूल आँखों में लगायी और चलने को प्रस्तुत हुई। देवरात निश्चल, अकम्प!

मंजुला अन्तिम प्रणाम निवेदन करके जाने को हुई। घूमकर पहला ही पग उठा पायी थी कि देवरात ने झपटकर उसका कन्धा पकड़ लिया, रुको देवि, थोड़ा और रुको!

मंजुला ने घूमकर देवरात की ओर देखा। उनका चेहरा लाल था। आँखें न जाने कैसी-कैसी हो गयी थीं। बोले, देवि, बासी को ताज़ा करने के लिए उस दिन का साधुवाद ग्रहण करो!

मंजुला इसका ठीक-ठीक अर्थ नहीं समझ सकी। उसे उस दिन का राजसभा का परिहास तो याद था, पर इस अवसर पर उसका क्या तुक था? हाथ जोड़कर बोली, ’समझ नहीं सकी आर्य! देवरात के चेहरे पर सहज दीप्ति आ गयी। हँसकर बोले, ’सब प्रसाद समझकर ही नहीं लिये जाते। पर प्रसाद प्रसाद ही है। मंजुला देवरात के मुख पर एकटक दृष्टि लगाये ताकती रही। मन-ही-मन उसने कहा – यह सहज-प्रसन्न मुख-मण्डल अक्षोभ्य नहीं है! साहस बटोरकर उसने कहा, यदि अनुचित न समझें तो दासी किसी दिन अपने घर पर चरणों की धूली पाने की मनोकामना रखती है। देवरात पुलकित होकर बोले, अवसर आने पर तुम्हारी मनोकामना भी पूर्ण होगी। गणिका को जैसे राज्य मिल गया हो। अत्यन्त कृतज्ञता-भरी दृष्टि से देवरात की ओर देखते हुए वह सन्तुष्ट चित्त से घर लौट गयी।

पूरे हलद्वीप में यह बात आँधी की तरह फैल गयी। बुद्धिमानों ने सिर हिलाकर कहा, इसमें कुछ रहस्य है। यह गणिका मायाविनी है। वह देवरात को फँसाना चाहती है। कुछ दूसरे लोग यह कहते सुने गये कि यह राजा का षड्‌यन्त्र है। वह देवरात की लोकप्रियता से चिन्तित है और उसे बदनाम करना चाहता है। तरुण नागरिकों में कुछ और ही तरह की कानाफूसी चलने लगी। उनके मन में गणिका के प्रेमासक्त होने की ही सम्भावना अधिक थी। जितने मुख, उतनी बातें सुनायी देने लगीं। बातें धीरे-धीरे वृद्धगोप तक भी पहुँचीं। उन्होंने देवरात को सावधान करने की बात भी सोची। परन्तु स्वयं देवरात के चित्त में कोई विकार नहीं देखा गया। उनका सदा-प्रसन्न चेहरा जैसा-का-तैसा बना रहा। कोई पूछता तो कहत, मंजुला देवी ने निमन्त्रण दिया है, अवसर आने पर उस निमन्त्रण का सम्मान तो करना ही होगा। अवसर आ भी सकता है, नहीं भी आ सकता है। और हँस देते। उस हँसी में एक प्रकार का विषाद-भाव भी मिला होता था। ऐसा जान पड़ता था कि उनकी हार्दिक कामना यही थी कि अवसर न आये। लेकिन नगर के विडम्ब-रसिकों ने उनकी हँसी की भी नाना प्रकार से व्याख्या की। नित्य-नयी कहानियाँ गढ़ी जातीं और फैलायी जातीं। यहाँ तक भी सुना गया कि नगरश्री मंजुला स्वयं अभीसार-यात्रा की तैयारी कर रही है। परन्तु देवरात यथानियम अपने काम में लगे रहते। उन्होंने इन बातों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी।

इसी बीच देवरात राजा से कई बार मिल भी आये। यह भी सुना गया कि राजा ने उनकी बात मान ली है और गणिका को क्षमा प्रदान कर दी है। अटकलों के बवण्डर उड़ते रहे। इतना अवश्य देखा गया कि गणिका ने राजकोप के शमन के बाद धूमधाम से क्षिप्तेश्वर महादेव की पूजा करवायी और सहस्त्रों नागरिकों को अपना नृत्य दिखाकर मुग्ध भी किया। नगर के लोग इस परिणति से सन्तुष्ट हो गये और कानाफूसी धीरे-धीरे दब गयी। लोग धीरे-धीरे इस घटना को भूल गये। 


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