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05.03.2012
 
पहचान : एक शाम की
डॉ. शैलजा सक्सेना

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"क्लासिकल म्यूज़िक का प्रोग्राम है, सुनने चलोगी?" पड़ोस की प्रौढ़ा जया मुखर्जी ने पूछा।
"म्यूज़िक प्रोग्राम" सुनकर उसकी आँखें कुछ चमकी थीं, अरसा हो गया किसी संगीत कार्यक्रम या नाटक या किसी भी तरह के ऐसे महौल तक में गए हुए उसे।
"कितने बजे हैं?" उसने उत्सुकता से पूछा।
"पौने सात से शुरू होगा पर घर से साढ़े पाँच तक तो निकलना ही पड़ेगा। " मैनेज कर लो तो चलना, मैं जा रही हूँ" जया ने पूरी सूचना दे दी थी। जाने - आने का साथ भी है, जगह ढूँढने की दिक्कत से भी बचा जा सकता है। मन में लालच आ गया विनीता के।
"देखती हूँ, कोशिश करती हूँ। सब काम हो गए तो फोन करूँगी आने का, हाँ लौटने में क्या बज जाएगा?" सब खबर रखना ज़रूरी था।
"साढ़े नौ से दस के बीच का समय हो सकता है। चल सको तो अच्छा है पर न हो पाए तो कोई मलाल की बात नहीं, मेरे बच्चे छोटे थे तो मैं भी कहाँ जा पाती थी, यह ख्याल रहता था कि ये अकेले न रहें या मेरा उनके पास रहना ही मेरा सबसे बड़ा काम है।"
जया शायद विनीता की मन:स्थिति समझ रहीं थीं। भीतर की माँ और निजी अस्तित्व में द्वंद्व शुरू हो गया था।
"बच्चे तो राकेश भी रख सकते हैं, वो कहाँ मना करते हैं मुझे जाने से, पर छोटा रोएगा मुझे छोड़ते हुए, फिर सुबह की लायी सब सब्जियाँ साफ कर रखने का काम भी पड़ा है, सुबह से घर -बाहर दौड़ते-दौड़ते थक भी कितना गयी हूँ।" ’हुहँ’ मन द्वंद्व में और उलझता, उससे पहले ही जया को संक्षप्ति सा उत्तर देकर "फोन करूँगी साढ़े चार तक", वह निकल आयी थी। चाहती नहीं थी कि मन की छाया" कोई दूसरा पढ़े।

घर जाने से पहले छोटे को स्कूल से लेकर आयी। घर आकर चाय-दूध-नाश्ता करते-कराते कुछ समय निकल गया। चाय का कप लेकर वह राकेश के पास आ बैठी।
"तुम अगर कहो तो मैं शाम को ’नेहरु सेंटर’ हो आऊँ, जया जा रही है।"
राकेश ने नज़र उठा कर विनीता को देखा, फिर खरखराए शब्दों में कहा- "जाना है तो जाओ, मुझे क्या कहती हो?"
"नहीं। मतलब... तुम सब संभाल लोगे? खाना मैं बना कर रख जाऊँगी, पर बच्चे..."
"हाँ, कर लूँगा" एक तना हुआ सा उत्तर कानों पर आकर पड़ा।

’हाँ’ कह तो रहा है वो, फिर क्यों मन चाहता है कि वह प्यार से उससे कहे,"कितना समय हो गया, तुम कहीं गई ही कहाँ हो, तुम ज़रूर जाओ।" ऐसा मनुहार भरा स्वर सुनने को पिछले दस साल से उसके कान तरस रहे हैं पर राकेश को यह सब "लाग-लपेट" वाली बातें नहीं आतीं। एकाध बार विनीता ने खुल कर कहा भी था कि "जब तुम काम में कमियाँ जोश-खरोश से निकाल सकते हो तो किसी बात की तारीफ़ भी तो कर सकते हो, कभी प्यार से भी तो कुछ कह सकते है।" उसे राकेश का दिया तर्क याद है, उसने कहा था- "तुम ’सेल्फ़-सिम्पैथी’ चाहती हो, सोचती हो, मैं बेचारी यहाँ घर के काम-काज कर रही हूँ, बच्चे संभाल रही हूँ तो सबको मुझसे सिम्पैथी होनी चाहिए कि ’बेचारी’ बहुत मेहनत कर रही है। मैं भी तो नौकरी करता हूँ, रोज़ ऑफिस से आकर मैं तुमसे उम्मीद करूँ कि तुम कहो कि ’हाय! बेचारा कितनी मेहनत करता है’, तो कैसा लगेगा तुम्हें?"

यह सब कहते हुए राकेश की भाव-भंगिमा ऐसी थी कि विनीता के दिल पर घूंसा सा लगा था, लगा चेहरे पर किसी ने कस-कस कर कई थप्पड़ जड़ दिए हों, "सेल्फ़पिटी"! "सेल्फ़सिम्पैथी"!! कहाँ प्यार के चंद शब्द सुनने चाहे थे और कहाँ यह क्रूर, विचित्र विश्लेषण सुनना पड़ा। दफ़तर में की गई पैसे वाली नौकरी और घर की चौबीस घंटे की बिन पैसे की ताबेदारी - क्या समानता है दोनों में? जी में आया था भीतर के बिलबिलाते आँसुओं को साध, ज़रा यह बात पूछूँ उससे, पर राकेश की चढ़ी भौंहें और फूले नथुने बता रहे थे कि बात आगे बढ़ी तो नारी जाति की ’महानता’ पर ऐसे जुमले सुनने को मिलेंगे कि...। उस दिन के बाद उसने प्यार भरे, कोमल, सम्वेदनशील शब्दों की माँग नहीं की। शब्द सुने भी पर उनके ताप से बचने की बराबर कोशिश की। आज भी मन जब फिर उस नेह के लिए छटपटाया तो पल दो पल में ही उसने खुद को साध लिया। घड़ी देखी तो चार बज रहा था। झटपट दाल चढ़ाई, सब्जी काटी-छौंकी, चावल धो कर, नाप कर पानी भर, भगौना गैस पर ही ढक कर रख दिया। जाकर राकेश को बताया कि सब बन कर तैयार है, बस चावल वाली गैस ऑन कर लेना।

कितना काम बाकी पड़ा था और पौने पाँच बज गया था। उसे लगा, वह एकदम पस्त हो गई है। अभी फ़ोन करके जया को बताना भी है कि वह आएगी भी कि नहीं? क्षण भर को विनीता पस्त सी सोफ़े पर बैठ गई। सोचा - "मना कर दूँ, भागा-दौड़ी कर रही हूँ सुबह से, अब ऐसी थकी हुई सी जाऊँगी तो क्या ’एन्जॉय’ करूँगी, फिर ट्रेन बदल-बदल कर जाना, मौसम भी इतना ठंडा है, लौटने पर सबके मुँह फूले होंगे, छोड़ ही दूँ - ऐसा भी क्या कर लूँगी प्रोग्राम में जाकर?"

राकेश से फिर एक बार टटोलने की गरज से पूछा, "तो मना कर दूँ क्या?"

आधुनिक पुरुष का पत्नी को स्वतंत्रता का ’अधिकार’ देता सा, वही खरखराया स्वर आया-
"जो करना है, सो करो, फिर मुझसे न कहना।"

थकावट और इच्छा के बीच चलते द्वंद्वयुद्ध में वह पलभर स्तब्ध सी राकेश को देखती रह गई-

"क्या मुसीबत है ’हाँ’ कहूँ तो मुश्किल और न जाऊँ तो भी चैन नहीं, कहीं कोई प्रोत्साहन का स्वर नहीं - बात नहीं। औरत घर से कदम निकाले तो घर के सब काम करके और घर के काम करने को ही, अपनी इच्छापूर्त्ति के लिए बाहर निकले तो अपराधिनी भाव से, सबके सब काम ख़त्म करके! ऐसे में कितनी ताकत रह जाती है और कितना उत्साह रह जाता है कुछ करने का! ख़ैर!! फ़ोन तो करना ही था दोनों हालातों में। चुस्त हाथों से उसने फ़ोन उठा, नंबर मिलाया तो उधर से जया का प्रफुल्ल स्वर सुनाई दिया -"हलो!"

मन अभी तय नहीं कर पाया था, यही बात अगर अपने लिए न होकर राकेश के लिए होती, उसके साथ कहीं जाना होता या बच्चों के काम से जाना होता तो क्या इतने थके होने के बाद भी क्या तुरंत वह चल न पड़ती? फिर जया को देखो, 55-60 वर्ष के बीच में है, अभी नौकरी से रिटायरमेंट लिया है, पर नई भाषा" सीखने और इधर-उधर के कई कामों में बराबर व्यस्त रहती है, लंदन की विदेशी भूमि पर अपनी पहचान से जुड़ने के लिए बराबर नेहरु सेंटर जाती रहती है। वह खुद भी तो इसी पहचान से जुड़ने के लिए भटक रही है, तब मौका पाकर क्यों ऐसी पस्त है- -बरबस मुँह से निकला-

"ठीक है, मैं मिलती हूँ स्टेशन पर साढ़े पाँच बजे।"

कहने के साथ ही सारा असमंजस बर्फ़ की पतली झिल्ली सा टूट गया। ..पैरों में जैसे स्प्रिंग लग गए, भागम भाग शुरू हो गई। उन्हीं दस मिनट में कपड़े इस्त्री हुए, शॉवर लिया। और बाल बाँध कर तैयार हो गई। आज पहली बार लंदन की मैट्रो ट्रेन में सलवार-कमीज़ पहन, बिंदी लगाकर जा रही थी - चाहें कितने ही भारतीय यहाँ क्यों न रहते हों, तब भी यहाँ के लिए तो सब विदेशी ही हैं ...पराए!! वैसे ही लोगों की निगाहें उठती हैं, बिन्दी लगा लो तो और अधिक निगाहें झेलो, सलवार-सूट का अधिकांश भाग तो ओवरकोट में छिप जाता है पर बिन्दी भारतीयता का पासपोर्ट बनी माथे पर दमकती है। कोई और मौका होता तो ’जैसा देश वैसा भेष" ही चलता पर शास्त्रीय संगीत सुनने के लिए जैसे ख़ास ’तमीज़’ की ज़रूरत होती है वैसे ही उस सभा में जाने के लिए ख़ास ’तहज़ीब’ की भी ज़रूरत होती है, फिर जया भी साथ थी। दो का साथ अजनबी ज़मीन पर हिम्मत बन गया।

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