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05.23.2017
 
मिंदा
डॉ. शैलजा सक्सेना
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ठंडी साँस ने मिंदा को यथार्थ का भान कराया। जगप्रीत कब का जा चुका, यादें रह गईं हैं, तस्वीरों सी उभरती और रह गई मिंदा के मन में उलटती पुलटती तीख़ी चुभती टीस! उस दिन के बाद मिंदा ने कनाडा न आने की कोई बात न छेड़ी। निश्चित दिन आँसू भरी आँखों से सास, जेठानी-जेठ, देवर-देवरानी और अपने ’प्रीत और पुत्तर’ और मिलनेवाले आये लोगों को छोड़ वो नई दुनिया की ओर बढ़ आई थी।

कनाडा आकर कुछ दिन तो भाई भाभी, उनके बच्चों के साथ बातों में, उपहारों के लेन-देन में ही निकल गए, फिर ज्योत की पढ़ाई का, घर-बार की व्यवस्था का सोचने देखने में कुछ समय निकला। तय तो सब कुछ जगप्रीत के आने पर ही होना था सो मिंदा उसके आने के दिन गिन रही थी पर वो बस दिन गिनती रह गई। प्रीत की जगह उसके न रहने का फ़ोन आया था। पाल की भर्राई आवाज़ तीर की तरह, पसलियों के बीच धड़कते सीने में फंस गई थी। कैसा अकल्पनीय, भंयकर घट गया था उसकी हँसती-मुस्कुराती ज़िन्दगी में।उसे हज़ारों मील दूर, नई ज़मीन पर इंतज़ार करने को भेज, प्रीत अकेला किसी और ही जगह चला गया था। मिंदा फूट-फूट कर रोई और तत्काल वापिस जाने को तैयार हो गई। भाई परेशान कि जाने देंगे तो फिर टिकट का खर्चा है ही, ऊपर से छह महीने भी न रुकने से कोई नई परेशानी न हो जाए। पर मिंदा कुछ सुनने को तैयार न थी।
"आखिरी बार तो देख लूँ।" कहते कहते वह बिलख उठी थी। भाइयों ने हार-थक कर पाल को फ़ोन किया, उसे समझाया और माँ को समझाने को कहा। पाल ने कहा था कि गर्मियों में शरीर को दो दिन नहीं रखा जा सकता और फिर बाऊजी की इच्छा बाहर रहने की थी, उसका न आना ही ठीक रहेगा और वो कुछ ही दिनों में आ जाएगा। यहाँ का सब कुछ ताऊ-चाचा संभाले हैं सो वो चिंता न करे।बेटे की कितनी बात उसके पल्ले पड़ी थी उसे याद नहीं, बस याद रहा, "बाऊजी की इच्छा बाहर रहने की थी.." उनकी किस इच्छा का विरोध उसने कब किया था।.. अब उनकी आखिरी, इच्छा मिंदा के पाँव बाँध गई।

कमरा बंद किए इस पहाड़ जैसे दुख को, आँसुओं की गंगा में बहाने का प्रयास करती रही थी वो। कुछ दिनों में जगपाल आ गया था। दूसरे घर में जाकर रहने की बात टल गई। मामा ने ’ढंग’ की नौकरी पाने के लिए कोर्स करने की ज़रूरत समझा, उसका दाखिला भी कहीं करा दिया था। बच्चे अपनी पढ़ाई में लगे और मिंदा-- उसे होश ही कहाँ था अपना। वो जैसे किसी बुरे सपने में जी रही थी। पर सपना तो था नहीं वह, धीरे धीरे बढ़ते खर्च और उसकी रोनी सूरत का असर भाई-भाभी, भतीजे-भतीजियों के व्यवहार में दिखने लगा। फिर एक दिन किसी की चुभती बात सुन उसकी आँखें खुलीं। बेटी कैसे रह रही है और बेटा कैसे चुपचाप सब झेल रहा है..., उसे होश आया। वो अपने दुख में ऐसे डूबी थी कि बच्चों का कोई ध्यान उसे था ही कहाँ और बच्चे पिता के जाने का दुख और मामा मामी की बातें सुन भी, उसको दुखी देख चुप रहे!!! मिंदा शर्म और ग्लानि से गड़ गई, कैसी माँ है वो? बच्चों को पितृहीन के साथ-साथ मातृहीन भी बना दिया था उसने...। कुछ देर की सोच के बाद मिंदा ने फैसला लिया.. पहली बार... उसका अपना फैसला पर वो जानती थी कि जगप्रीत को भी इस फैसले से सुख मिलेगा।

उस रात जगपाल जब ’क्लास’ से लौटा तो उसे मिंदा को अपना इंतज़ार करते देख बहुत हैरानी हुई। माँ की आँखों में उसने, लम्बे समय के बाद उदासी और आँसू की जगह निश्चय देखा। उसने बेटे से, छोटा सा ही सही, अलग घर ढूँढने को कहा। पाल के चेहरे पर अनायास राहत उभर आई। अगली सुबह उसने भाई से बात की और अलग घर लेने का निर्णय भी सुनाया। भाई अपने कर्त्तव्य और शेष रह गये स्नेह में बँधे उसे रोकते रहे पर वह तय कर चुकी थी। हाँ, उसने अपने लिए काम ढूँढने में भाई की मदद माँगी। कुछ दिनों बाद भाई उसे ड्राईक्लीनर की दुकान पर ले गए। प्रीत के ’ऐश’ करवाने का स्वप्न कब से धूमिल पड़ चुका था। नए हालातों की अब नई मिंदा सब काम करने को तैयार थी। घबरायी सी, मन में बेचैनी दबाए, नम हो आती आँखों को चुनरी से सहेजने की कोशिश करती, ’बड़ी बहनजी’ के दफ़्‍़तर में मिंदा भाई के साथ गई थी। ’कुछ गलत न हो जाए’ इस डर से विमूढ़ सी खड़ी वो भाई को अंग्रेज़ी में बात करते हुए सुन रही थी। जब स्नेह भरे, अजनबी हाथ ने उसका कंधा छुआ तो वह चौंकी, ’बड़ी बहनजी’ ने सच ही, बड़ी बहन की तरह उसे सहेज कर काम समझाया तब कहीं उसकी आँखों के चौंकते-भागते हिरण कुछ थमे थे। चलते समय उसकी आँखों में कृतज्ञता, नमी के रूप में चमक रही थी और उसका पहला दिन हिन्दी, अंग्रेज़ी, पंजाबी के बिना, बस आँखों की भाषा के सहारे चल गया था, पर हर रोज़ तो यह हो नहीं सकता था। उसने अंग्रेज़ी सीखने के लिए रात की क्लास ली। जीवन नए सिरे से अजनबी पगडंडियों पर चल निकला। माँ की हिम्मत और मेहनत, दोनों बच्चों की मार्गदर्शक बन गई थी। स्कूल के बाद दुकान पर ज्योत आकर माँ का हिसाब-किताब देख देती। पाल ने पहले ’पार्ट-टाईम’ नौकरी की, फिर धीरे-धीरे कोर्स समाप्त कर पूरे समय की नौकरी कर ली। ज्योत माँ-भाई का बढ़ावा पा, स्कूल पूरा कर नर्सिंग कोर्स में चली गई। बच्चे धीरे-धीरे बड़े हो गए और वो कुछ बुढ़ा गई।

पाल पक्की नौकरी के बाद से उसके पीछे पड़ गया था, "बस बीजी! बहुत हो गया काम, अब आराम करो।"

उसकी बहू भी पाल की हाँ में ही हाँ मिलाती। बहुत लाड़ से वह इस बहू को अपने पिंड से ब्याहकर लाई थी और बहू भी उसे वही लाड़, आदर देकर ’भर’ देती।

साल-दो साल वह टालती रही। चाहती थी पाल अपना मकान खड़ा कर ले। जिस दिन पाल ने ’बाऊजी’ का वास्ता दिया उस दिन से मिंदा ने हफ़्‍़ते में तीन दिन काम पर जाना शुरू किया। जो वह पाल के पहले बच्चे के होने तक करती रही। उसके बाद बच्चे के मोह और काम, दोनों ने ही मिंदा को बाँध लिया। ज्योत की तरफ़ से भी उसके दिल में ठंडक थी। नर्सिंग पूरी कर वह बड़े हस्पताल में नौकरी कर रही थी और तीन साल हुए उसकी शादी भी हो गई थी।

रब्ब ने उसकी और प्रीत की लाज रख ली। बस जिसने यह सपना देखा और दिखाया था, वही सपने का सुख नहीं ले सका और इस दुख से मिंदा के मन के खाली कोने बजने लगते। मिंदा लम्बी साँस भर कटी सब्जियों का बर्तन लेकर उठ गई। धीरे से बुदबुदायी- "सुख चाहे सपने का हो, दुख तो मेरा सारी ज़िंदगी का ही है।"

पीछे -- 1, 2


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