अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 
इसी बहाने से---
लिखने की सार्थकता और सार्थक लेखन
डॉ. शैलजा सक्सेना

लम्बे समय की छुट्टी के बाद आज कलम जागी। अलसाई सी उठी तो देखा बाहर मौसम बदल गया। हरे पत्ते, लाल-पीले होकर झर गए, घास पर पत्तों का मोटा - चुरमुराता कालीन बिछ गया। आसमान में सूरज और बादलों की आँख-मिचौली चल रही है। दुनिया के बाहरी तापमान में कुछ कमी आ गई है, भीतरी खबरें ज्यों की त्यों गर्म हैं। कलम मुस्कुराई-

"दुनिया का दिल ठण्डा है, दिमाग गरम" और अपनी ही उक्ति की चतुराई पर खुश हो आई।
हाथ और दिमाग ने उसे समझाया, "विषय पर आओ, इधर-उधर की हाँकने से क्या लाभ?" पर कलम समझना नहीं चाहती। वह कभी लिखने से भिड़ रही है, कभी दिमाग से -

"लिखने से होगा क्या?" वह मुझसे पूछती है।
      "वह तो मैंने ’साहित्य के उद्देश्य’ में लिखा था।" मैंने कलम को सफ़ाई देनी चाही।
      "तुमने साहित्य, यानि ’साहित्य को किस उद्देश्य से लिखा जाए’ उस पर लिखा था, पर मैं एक बड़ी बात पूछ रही हूँ, लिखने से कुछ होगा? बदलेगा?"
      "यह कैसा सवाल है? बिल्कुल होगा। लिखने से बिल्कुल बदलेगा।" मैं झल्लाई।
      "राजनेता की तरह नारे मत लगाओ, बात की बारीकी पकड़ो।" कलम समझाने लगी, "किसी जमाने में कविता पढ़ कर लोगों में जोश उठता था। आल्हा-ऊदल सुनाकर गाँव के बुज़ुर्ग नई पीढ़ी को तलवार पकड़ा देते थे, तुलसी की चौपाइयाँ गाकर लोग, तेरा-मेरा भूल जाते थे, पर अब क्या होता है?"
      "क्या होता है?" मैंने पूछा
      "तुम्हें नहीं मालूम, तुम तो लेखक हो या खुद को लेखक कहलवाना पसंद करती हो। कितने प्रकाशक हैं भारत में - संख्या पता है? कितनी पुस्तकें छपती हैं - आँकड़े हैं? कितनी पुस्तकें खरीदी जाती हैं? कितने लोग ध्यान से पढ़ते हैं? पढ़ कर गुनते हैं? गुनकर प्रभावित होते हैं? बताओ?" प्रश्नों की बौछार कर कलम विजयी मुद्रा में मुझे देखने लगी। उसे पता था कि इन आँकड़ों को देने में असमर्थ हो जाऊँगी। मैंने जबाब देकर अपना पलड़ा हल्का करना उचित नहीं समझा बल्कि प्रश्न किया - "मैं जानती हूँ कि उत्तर देने से आसान, आजकल प्रश्न करना है।"
      "तो तुम्हारे हिसाब से लिखना बेकार है? यह मत भूलो कि लिखना रुका तो तुम्हारी सत्ता भी नहीं रहेगी।" मैंने कलम के गर्व को धमकी भरी चुनौती दी।

उसने मुझे तरस खाने वाली निगाहों से देखा फिर व्यंग्य से बोली - "बस हो गया तुम्हारा स्वान्त: सुखाय..."

मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया था। झट चिरौरी की मुद्रा में बोली - "हमारा-तुम्हारा झगड़ा किस बात का? तुम्हारे बिन मैं क्या रह पाऊँगी? तुम्हीं तो मेरी भावनाओं और विचारों को साँस देती हो, प्राण देती हो। तुम्हें हाथ में लेकर मैं कहाँ से कहाँ पहुँच जाती हूँ।"

कलम का हृदय अब तक नरम पड़ चुका था। मेरे भावों की गर्मी, उसकी नोंक पर पसीना बन चुकी थी, बोली -

"तो अभी तक लेखक के जीवन पर उसका लिखना असर करता है?"
      "क्यों नहीं, तुम तो जानती हो यह बात।" मैंने समझाया।
      "याद है जब अमृता प्रीतम अपनी कहानी लिखते लिखते रात को सो गई थी, सुबह उठीं तो बारिश हो रही थी, देखते ही परेशानी से सोचने लगी कि बारिश में मंगल काम पर कैसे जाएगा?" मंगल उनकी कहानी का नायक था। ऐसे कितने ही किस्से हैं, जब लेखक अपने लेखन से एक रूप हो गया, उन्हीं में खो गया।" कलम खँखारी, मेरी विचारमुद्रा भंग करते हुए बोली -
      "तुम ठीक भी कहती हो और ठीक नहीं भी कहती हो।"
      "कैसे?"
      "लेखक लिखना प्रारंभ करता है तब विचार में पात्रों से एकरूप होता है, यह ठीक है फिर पात्र लेखक के नियंत्रण से निकल कर, मुझसे मनमाना लिखवा लेते हैं - यह तो तुम जानती होगी", फिर समझाने की मुद्रा में बोली- "अन्ना कारनिना लिखते समय टॉलस्टॉय के साथ क्या हुआ था - जानती हो न? वे नहीं चाहते थे कि अन्ना उपन्यास के अंत में ट्रेन के नीचे आकर जान दे पर क्या अन्ना ने अपने लेखक की सुनी? बिल्कुल नहीं! मेरा दिल धड़कता रह गया और उसने मनमानी की, कलम और कलमकार दोनों को हक्का-बक्का छोड़ वह चलती गाड़ी के आगे कूद कर मर गई।" कलम दो पल चुप हो गई। वह समय की पिछली गलियों में घूमती, अन्ना के मर जाने का सोग मनाने लगी।

मैं ने कुछ देर तक तो उस अकाल-मृत्यु पर मौन धारण किया पर फिर कलम को वापस वर्तमान में लाने की इच्छा से बोली-

"यह सब जानकर भी क्यों पूछती हो कि लिखने का असर लिखनेवाले पर क्या होता है?"
"हाँ, होता है असर, कुल लोगों पर होता है अपने कहे और दूसरे के कहे - लिखे का असर, पर बहुत से ऐसे हैं जो बिन कुछ करे साहित्य सागर पर अपना परचम फहराते दुनिया को आकृष्ट करना चाहते हैं। उनका उद्देश्य क्या लिखना है? यह नहीं है बल्कि लिखने से प्राप्त क्या होगा? यही है।"
       मैंने आदर्शवाद का चोला पहना, बोली-
      "अरे, ऐसे पानी में उतरे बिना गोताखोर बनने वालों के लिखे का क्या कोई प्रभाव रहेगा? क्या ऐसे में लेखन की नाव कुछ दूर तक भी चल पाएगी? चिंता क्यों करती हो - तुम्हें कोई धक्के देकर कितनी देर चला सकता है? कुछ दूर जाकर तो तुम रुक ही जाओगी।"
कलम ने मुझे तरस खाने की मुद्रा में देखा -

"यह आजकल जो अखबारों में, टी.वी. पर लिखा या दिखाया जा रहा है - वह क्या है? तुम मुझे अपने झूठे आदर्शवाद का घोल मत पिलाओ, यही घोल पिला-पिला कर लेखक अपनी जिम्मेदारियों से बचता रहा है और केवल "यैलो जरनलिज़्म" ही नहीं "यैलो लिट्रेचर" का पूरा भण्डार बन गया है, जिसके बारे में तुम बुद्धिजीवी बात भी नहीं करना चाहते!"

मैं कुछ तैश में आने लगी थी, बोली -
     "तुम सभी लेखकों पर यह इल्ज़ाम क्यों लगाती हो। कितने ही आज के लेखक हैं - कमलेश्वर, चित्रा मुद्‌गल, ममता कालिया, डा. नरेन्द्रमोहन, डा. रामदरश मिश्र..."

मेरी सूची अभी और बढ़ती कि कलम ने टोका -
      "हाँ ठीक है, ये लेखक अपने लेखन का धर्म ईमानदारी से निबाह रहे हैं पर जो कुछ गलत इनके अपने समय में लिखा जा रहा है, उसे पूरी ताकत से, जोश से नकार कर लोगों को सच बताने का काम क्या इनका नहीं है?"
     "तो क्या तुम यह चहती हो ि ये लोग अपना समय, शक्ति घटिया रिपोर्ट और घटिया टी.वी. सीरियलों के विरोध में लगाएँ? जनता खुद समझदार है, वह अच्छे, बुरे को पहचानती है" मैंने कहा।
    "हँ!! जनता समझदार है तभी स्टेशनों पर बिकने वाली किताबों को अधिक पढ़ा जाता है, जनता समझदार है तभी इन रिपोर्टों के आधार पर अपनी राय बना कर राजनैतिक, धार्मिक मसले के पक्ष और विरोध में होती है, जनता समझदार है तब यह सब गलत चीज़ें बरदाश्त कैसे कर रही है?"

मुझे चुप देखकर कलम बोली, "तुम जनता से कुछ अधिक अपेक्षा कर रही हो या कहें कि अपनी जिम्मेदारी भी तुम पाठकों को सौंप देना चाहती हो। वे गलत का विरोध करें, वे सही और गलत की पहचान करें... यही न, और तुम क्या करोगी? तुम उन्हें यह पहचान करने के लिए आवश्यक विवेचन दृष्टि दे रही हो क्या? क्या तुममें स्वयं यह विवेचन दृष्टि है? क्या तुम खुद वाद और दल के घेरे से मुक्त हो? क्या तुममें इतिहास और समाज के भीतरी तत्त्व और संघर्ष को समझने, पकड़ पाने, खोलने, विवेचित करने का ज्ञान, विवेक है? क्या तुम निजी विचारों को परे रख कर हमेशा खरा सच कहती हो?"

मैं कलम के इन सवालों के कटघरे से अचानक घिर गई, बोली-
      "तुम मेरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लेखकीय स्वतंत्रता पर हमला कर रही हो!"
      कलम ठठा कर हँस पड़ी, बोली,
      "मुझे तुमसे ठीक इसी उत्तर की उम्मीद थी।"
      मुझे कलम का व्यंग्य बहुत चुभा। रोष से बोली-
     "जो लेखक सही लिख रहे हैं, सही समझ रहे हैं, विश्व के इतिहास को बारीकी से जाँचने-समझने की शक्ति रखते हैं और दलों में नहीं बंधते, उनके लिए तुम क्या कहोगी?"

मैं रोष से हाँफने लगी थी। कलम बिल्कुल शांत थी, पलभर उसने मुझे खाली निगाहों से देखा, फिर वैसे ही शांत स्वर में बोली-
    "बुद्धिजीवी"
    "तुम बुद्धिजीवी शब्द का इस्तेमाल पत्थर की तरह कर रही हो, बुद्धिजीवी होने में बुराई क्या है?" मैंने कहा।
    कलम बोली - "बुद्धिजीवी होने में क्या बुराई है - प्रश्न यह नहीं है, प्रश्न यह है कि क्या  बुद्धिजीवी अच्छा लेखक होता है?"
      मैंने झट से कहा - "बेशक!"
      कलम समझाने और फटकारने के स्वरों को घोलने लगी -
     "कैसे? बुद्धिजीवी विवेचना कर सकता है, विश्लेषण के सकता है पर जनता के दर्द के साथ जुड़ कैसे पायेगा? वह अपनी बुद्धि के सहारे दुनिया के नक्शे पर, साहित्य के नक्शे पर इतना फैल जाता है कि अपने समय और स्थान को ‘ग से नहीं पकड़ पाता। अपनी ही जनता से जुड़ नहीं पाता। यह ठीक है क अच्छा लेखन स्थान-सीमा और काल-सीमा से परे होता है पर लेखक तो पहले अपने देश और अपनी जनता का होता है, तभी वह उस देश और समय से ऊपर उठ पाता है।"

मैं उसकी बात का सिरा ढूँढ रही थी, बोली -
      "तुम कहना क्या चाहती हो?"
      कलम बोली - "हिन्दी के लेखन पर कितनी पाश्चात्य विचार-धाराओं का असर पड़ा है, जानती हो? ठीक है उन्हें भारतीय पृष्ठभूमि पर फैलाया-समेटा गया पर क्या इस सारी प्रक्रिया में लेखन, यहाँ की जनता से दूर नहीं हो गया? कविता - कहानी केवल पढ़े-लिखों (पढ़ने का अर्थ यहाँ अक्षरज्ञान से नहीं है, बल्कि मेरा मतलब ज्ञानवान लोगों से है) की चीज़ बन कर रह गई। जब आम जनता को लेखकों की किताबें समझ में ही नहीं आयेंगी तब जनता को साहित्य प्रभावित कैसे करेगा?"

कलम हल्के से मुस्कुराई, मज़ाक के स्वर में बोली -

"कभी लोगों को आपस में बात करते हुए सुना है कि ’कविता तो सिर पर से निकल गई’ अगर बात को उलझा कर कहना या ऐसे शब्दों में कहने में बढ़ाई मानी जाएगी कि वह बात, वह भाषा किसी को समझ ही न आए तो प्रश्न यह है कि साहित्य लिखा किस के लिए जा रहा है? साहित्यकार असर किस पर डालना चाहते हैं? साहित्य की सबको साथ लेकर चलने की भावना का क्या होगा"

मुझे कमल के विषय दर विषय पर कूदने से आपत्ति हुई। मैंने कहा -
"सारी चीज़ें एक साथ मत मिलाओ। विषय पर बात करनी है तो वह कहो, भाषा की समस्या उठानी है तो उसको अलग से उठाओ।"

कलम बोली -
      "लेखन भी तो सब मिला जुला है। कथ्य कितना भी बढ़िया क्यों न हो अगर उसे लचर, कमज़ोर भाषा या गरिष्ठ भाषा में प्रस्तुत कर दिया जाए तो कितना असर डालेगा और भाषा खूब सुंदर, जीवंत, बुद्धि भाग ग्राह्य हो लेकिन कथ्य केवल कल्पना या दिमाग की दौड़, तब भी उसका प्रभाव नहीं होगा।"

मैं ने सहमति में सिर हिलाया, कहा -
     "बात तो तुम्हारी ठीक है पर अभी तक यह समझ नहीं पा रही हूँ कि तुम्हारी बात का सिरा क्य है, तुम्हारी पीड़ा ठीक-ठीक पकड़ाई में नहीं आ रही है।"
     "मेरी पीड़ा... मेरी पीड़ा की खूब कही तुमने" कलम बोली, "मेरी पीड़ा मुझे पकड़ने वाले की पकड़ाई में नहीं आ रही है, इससे बड़ी त्रासदी और क्या होगी?"

मैंने क्षुब्ध होकर कहा -
      "देखो व्यंग्य मत करो.."

बात बीच में ही काटते हुए कलम बोली -
      "ठीक है, ठीक है, तुम भी साधारण प्राणी हो, पर यही बात तो मैं तुम्हें समझाना चाहती हूँ। तुम कभी युगद्रष्टा बनने का दंभ करते हो, कभी बुद्धिजीवी बनने का, कभी समस्याओं के समाधान, बिना कारण और कार्य की प्रक्रिया के दे देते हो। कभी समस्या उठा कर छोड़ देते हो, कभी भाषा इतनी मिलावटी बना देते हो कि सिद्ध क्या करना चाहते हो, यह पता नहीं लगता और कभी इतनी क्लिष्ट कि बात क्या है - वही समझ में नहीं आती। कभी तुम दलितों - पीड़ितों की पीड़ा सुनाते हुए रोने लग जाते हो, उनके संघर्ष को उनकी शक्ति बताना और बनाने की बजाये, उन्हें अपनी सहानुभूति और दया में डुबो कर एक लम्बा-चौड़ा "फ्रस्ट्रेटेड सोल" खड़ा कर देते हो। तो कभी अपने दिशा-निर्देश के कर्त्तव्य से हट कर केवल रिपोर्टिंग करने लगते हो - तुम करना क्या चाहते हो यह बात जनता को समझ में नहीं आती और उनके हिसाब से तुम किसी और ही दुनिया में रहने वाले प्राणी बन जाते हो जो सिर्फ़ बातें करता है, कभी छोटी बातें और कभी बड़ी बातें। तभी तो तुम पर जुमले कसे जाते हैं, व्यंग्य होता है कि "कवि हो गया, लेखक हो गया तो यह केवल सुनाने को अकुलाया रहता है।" मैं देख रही थी कि कलम हार थोड़ी देर बाद मुझ पर प्रश्नों की बौछार कर देती है। मैंने शान्तिनीति अपनाई और उठते - उमड़ते जोश और रोष को दबा कर कहा- "अपने किए विवेचन से तुम्हें स्वयं ही पता चल जाना चाहिए था कि लेखक हर युग में जनता और समाज से जुड़ने के लिए रास्ता ढूँढता है, इसीलिए उसका लेखन हर युग में रूप बदलता है। अब अगर समाज उसके इस प्रयास को लेखक की भटकन कहे तो क्या जबाब है ऐसी सिरफिरी बात का! प्रेमचंद ने जब ’हृदय परिवर्तन’ की नीति समाज की समस्या सुलझाई तब समाज ने कहा कि हर समस्या अपने आप में अनोखी और अलग होती है, अत: हर समस्या का समाधान केवल एक नहीं हो सकता। फिर बाद के लेखकों ने जब केवल प्रश्नों को ईमानदारी से प्रस्तुत करना शुरू किया तब समाज यह कहने लगा कि केवल प्रश्न उठा कर छोड़ देने से क्या होगा, कोई दिशा क्यों नहीं दी जाती। जब भाषा में मिलावट होती है, गँवई, प्रांतीय, विदेशी शब्द आ जाते हैं तब भाषा की शुद्धता के पक्षधारों को बुरा लगता है और जब भाषा की शुद्धता को बचाये रखने की चेष्टा होती है, लोगों को क्लिष्ट नज़र आती है।" मैंने कलम को उपदेश देने की मुद्रा में कहा, "कलम! हिन्दी लेखन हर युग में जनता को प्रभावित करता रहा है और करता रहेगा। वह जनता की माँग का ध्यान रखते हुए अपने रूप बदलता रहा है इसलिए तुम उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त रहो।"

कलम ने दो क्षण चुप रह कर मुझे देखा फिर संधि करने के स्वर में बोली-

"चलो मान लिया कि लेखक जनता से जुड़ने के प्रयास में लगा है, तब यह बताओ कि जनता हिन्दी की किताबें इतना कम क्यों खरीदती है? ’हैरी पॉटर’ की लाखों करोड़ों प्रतियाँ अनुवादित होकर इसी गरीब और एक अरब से अधिक जनसंख्या वाले भारत में बिकती हैं और ’मृत्युंजय’, ’आवा’ और ’कितने पाकिस्तान’ जैसी रचनाएँ बड़ी संख्या में बिक कर भी, उतनी व्यापक लोकप्रियता नहीं पा सकीं या उनकी बिक्री की संख्या क्यों इतनी नहीं है?"

मैं उसकी संधिमुद्रा से आश्वस्त हुई थी पर फिर इस प्रहार से तिलमिलायी, बोली -
"तुम अंग्रेज़ी भाषी किताब से हिन्दी किताबों की तुलना क्यों कर रही हो! वे लोग तो मीडिया के सहारे अपनी किताबों का पूरा बड़ा बाज़ार खड़ा करते हैं, फिर हर किताब तो ’हैरी पॉटर’ सी लोकप्रिय नहीं होती?"

कलम मुस्कुराई, बोली -
      "तुमने जो कहा, उस पर ध्यान भी दिया है?"
      "मतलब?"
     "मतलब यह कि तुम्हें आज के जनसंचार साधन युक्त समाज में किताब छपने की सूचना सब जगह पहुँचाने की ज़रूरत महसूस नहीं होती? क्या आज के विज्ञपनी युग में, जब साबुनों, तेल, कपड़ों के ब्राँड नाम लोगों को रटे हुए हैं, तब लेखक, प्रकाशक को अपने लिए बाज़ार खड़ा करने की ज़रूरत नहीं लगी।" कलम ने कहा।
     "यह सब घटिया लगता है, छिछला", मैंने मुँह सिकोड़ कर कहा, "अपना नाम प्रचलित कराने के दम्भी प्रयास सा।"
     कमल झल्लाई - "तुम लेखकों की एक कमी यह है कि कभी-कभी ज़रूरी बातों को भी दम्भ और आत्मप्रचार जैसी वाहियात बातों में घसीट लेते हो। यह तुम्हारी ज़रूरत न हो पर यह सच्चाई है। यह आज के समय की माँग है कि प्रकाशन केन्द्र जनता को, लेखकों और अच्छी किताबों से ठीक उसी तरह परिचित कराने का प्रयास करें जैसे बाकी के व्यापारी करते हैं। लेखन व्यापार नहीं पर जनसंचार के साधन केवल व्यापार से जुड़ कर रहें - ऐसा किसने घोषित किया? मीडिया के गलत और सही रूप पर निष्पक्ष राय बताना भी लेखक की ज़िम्मेदारी है। यह सब जनता से जुड़ने के प्रयासों में शामिल होता है लेखिका महोदया!!" कलम मुस्कुराई।

मुझे तुम्हारी बात समझ में आ रही है", मैंने धीरे से कहा।

"तुम्हें मेरी बात समझ में आए, जनता की बात सुनाई दे और गलियों, सड़कों, घरों में, चलते जीवन के महाकाव्य को तुम अपनी धारणाओं, आयातित विचारों - धाराओं के फ्रेम से हट, साफ़ आँखों से देख सको और उसी तरह ही साफ़ भाषा में कह सको तो जनता को भी तुम्हारी बात समझ आएगी और तभी साहित्य का लोकमानस से सही अर्थों में संगम होगा। वही साहित्य की, लेखक की यानि तुम्हारी - मेरी - हम सबकी विजय का दिन होगा जिस दिन साहित्य पूरे मायनों में, सही अर्थों में जनता से प्रभावित होगा और जनता को प्रभावित करेगा।"

कमल की इस शुभकामना को मैंने सिर नवाया। बात इतनी छोटी भी नहीं है कि चंद पन्नों में सिमट जाए। जीवन की यांत्रिक संश्लिष्टता (mechanical complexes) और समाज की मूल्यहीनता से लेखक आम जनता से अधिक प्रताड़ित होता है क्योंकि संवेदनशीलता उसके अस्तित्व का अटूट अंग है, तब लेखन, साहित्य इससे अछुता कैसे रह सकता है। परन्तु यह सच भी तो है, दलित साहित्य, जन साहित्य, ग्राम साहित्य आदि - आदि अनेक वादों,दलों के बाद भी आज के जीवन में साहित्य का हस्तक्षेप कितना है - समाज को बनाने (या बिगाड़ने, दोनों ही रूपों में) में साहित्य और साहित्यकार की क्या वही सार्थक, सक्रिय भूमिका रह पाई है जो आज से 300-400 वर्ष पूर्व थी? अपनी बुद्धि का विस्तार करने के बाद भी बुद्धिजीवी, इस विस्तार से जनता के हृदय-धरा पर कुछ दाने जीवन के पैदा कर सका है या बुद्धिवादी होकर, निरा शब्दजाल - बुद्धिजाल फैला रहा है? घर के कमरे या बड़ी गोष्ठियों में हुई शिक्षित बहसें, जनता के किन सही पक्षों को उठा पाई हैं, समझ पाई हैं? फ़्रॉयड, सार्त्र, कामू, एज़रा पाउण्ड की विचारधाराएँ हमारी ज़मीन पर कितनी कारगर सिद्ध हुई हैं या होंगी? इसका विश्लेषण भी ज़रूरी है और लेखक स्वयं अपनी पक्षधरताओं के चश्मे उतार कर, सही स्थिति कहें और राष्ट्रीय ज़रूरतों को पहचानते हुए निर्माणकारी तत्त्वों को अपने साहित्य में प्रश्रय दें - यह आवश्यक है। आज के असुरक्षित, आंतकग्रस्त, धर्मांध शक्तियों के तांडव नृत्य के बीच अपनी बुद्धि, अपने लक्ष्य और अपनी कलम को सीधा रख, लेखक आग बढ़े - आज समय की, साहित्य की यही माँग है। यह माँग पूरी कैसे की जाए यह गंभीर विचारणीय विषय है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें