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ISSN 2292-9754

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03.06.2016


हिन्दी साहित्य सृजन
(कनाडा में हिन्दी)
डॉ. शैलजा सक्सेना

इसी बहाने से -

 पत्र-पत्रिकायें

हिन्दी प्रेमियों ने घरों में कवि सम्मेलन करने से अपनी साहित्यिक गतिविधियाँ प्रारंभ की थीं पर आज ये गतिविधियाँ इतनी बढ़ गई हैं कि शहरों में कवि सम्मेलन, नाटक, संगोष्ठियाँ आदि होती हैं। पहला हिन्दी पाक्षिक "विश्वभारती" नाम से सरदार रघुवीर सिंह ने १९७६-७७ में टोरोंटो में प्रारंभ किया। यह पत्र धार्मिक और सांस्कृतिक सूचनाएँ देने के साथ ही हिन्दी भाषा सिखाने का काम भी करता था। इसमें डॉ. भारतेंदु श्रीवास्तव ने हिन्दी भाषा शिक्षा से संबंधित बहुत लेख लिखे। एक अन्य पत्र "नवभारत टाइम्स" भी इसी समय निकला था जो कुछ समय बाद बंद हो गया। इस संस्था ने १९८५ में "हिन्दी संवाद" नामक त्रैमासिक पत्रिका छापी जो लगभग १५ वर्षों तक नियमित रूप से प्रकाशित हुई"* (श्री ओंकारनाथ द्विवेदी, ’काव्योत्पल’, पृष्ठ xv)। साथ ही १९९० के आसपास "संगम" नाम का एक पाक्षिक पत्र टोरोंटो से उमेश विजय ने निकालना शुरू किया जो कई वर्षों तक चला। इसी समय श्री ज्ञान राज हंस ने रेडियो स्टेशन से "भजनमाला" का प्रसार शुरू किया जो बहुत अधिक लोकप्रिय हुआ।

ए.टी.एन.का टी.वी. चैनल प्रारंभ हुआ जिसे चंद्रशेखर चलाते हैं, यह चैनल आज भी बहुत लोकप्रिय है।

"हिन्दी चेतना" त्रैमासिक पत्रिका का संपादन श्री श्याम त्रिपाठी ने मार्च १९९८ में प्रारंभ किया। इस पत्रिका ने कनाडा के हिन्दी कवियों को प्रकाशन के लिये एक मंच दिया। यह पत्रिका आज भी चल रही है और डॉ. सुधा ओम ढींगरा के सहसम्पादन में यह आज उत्तरी अमेरिका की इतनी महत्त्वपूर्ण पत्रिका बन गई है कि इस में प्रकाशित होने के लिये भारत के प्रतिष्ठित लेखक भी इच्छुक रहते हैं।

श्री जगमोहन हूमर ने १९८२ में "अंकुर" नाम से हिन्दी और अंग्रेज़ी की पत्रिका निकाली जो कुछ वर्षों तक चली। इसी तरह त्रिलोचन सिंह गिल ने "भारती" पत्रिका निकाली जो अधिक नहीं चल पाई। ब्रिटिश कोलंबिया में डॉ. नीलम वर्मा नवंबर २००५ से एक अंग्रेज़ी और हिन्दी की मासिक पत्रिका ’एशियन आउटलुक’ निकालती हैं जिसका बड़ा पाठक वर्ग है। डॉ. जाइद लाइक "पोर्ट मूडी" से द्वैमासिक अंग्रेज़ी-हिन्दी का पत्र निकालते हैं जिसमें हिन्दी लेखों का स्वागत होता है। यह पत्रिका "शहपरा" २००१ से चल रही है। एडमंटन से दुष्यंत सारस्वत "सरस्वती पत्र" नाम से मासिक पत्र जुलाई २००४ से चला रहे हैं। हिन्दी लिटरेरी सोसाइटी ऑफ कैनेडा की पत्रिका "संवाद" १९८४ से डॉ. ओ.पी. द्विवेदी (गुऐल्फ) और डॉ. बी.एन. तिवारी (भारत) के सहयोग से निकलनी प्रारंभ हुई थी और आज भी यह आचार्य श्रीनाथ द्विवेदी के संपादन में चल रही है।

कनाडा में टोरोंटो से कई हिन्दी समाचार पत्र आज भी निकलते हैं जैसे, “इण्डिया अब्रौड"(सम्पादन-रवि रंजन पांडे), “समय इंडो-कनैडियन”(कंवलजीत सिंह कंवल) आदि।

टोरोंटो से कनाडा की पहली हिन्दी वेब पत्रिका "साहित्यकुंज" भी निकली जिसके सम्पादक श्री सुमन कुमार घई हैं। इस पत्रिका से भारत और दुनिया के बहुत से नामी लेखक जुड़े हुये हैं। कुछ ही समय पहले टोरोंटो से "प्रयास" ई-पत्रिका का सम्पादन ’विश्व हिन्दी संस्था” के निदेशक सरन घई ने प्रारंभ किया है। इस तरह इंटरनेट का लाभ उठा कर दुनिया परस्पर जुड़ रही हैं।

संस्थायें और साहित्यकार

सन १९८२ में टोरोंटो में "हिन्दी परिषद टोरोंटो" का निर्माण हुआ, जिसके प्रथम अध्यक्ष सरदार रघुबीर सिंह थे। इस संस्था में कई हिन्दी प्रेमी सक्रिय थे जैसे रघुवीर सिंह, डॉ. भारतेंदु श्रीवास्तव, प्रो. हरिशंकर आदेश, श्याम त्रिपाठी, शैल शर्मा आदि। सन १९८३ में ”हिन्दी लिट्रेरी सोसाइटी ऑफ कैनेडा" की स्थापना की गई। इसके प्रथम अध्यक्ष (स्वर्गीय) डॉ. त्र्यम्ब्केश्वर द्विवेदी मॉंट्रियाल से थे और फिर इसके अध्यक्ष ब्रिटिश कोलम्बिया के आचार्य श्रीनाथ द्विवेदी हुये। श्रीनाथ द्विवेदी की अध्यक्षता में यह संस्था अब कनैडियन एशियन स्ट्डीज़ एसोसियेशन से संबद्ध हो गई है। हर दो वर्ष में ये किसी न किसी यूनिवर्सिटी में हिन्दी भाषा और साहित्य पर संगोष्ठी कराते हैं। सन १९९९ में "हिन्दी साहित्य सभा" का गठन हुआ। यह सभा १२ हिन्दी प्रेमी परिवारों ने मिल कर शुरू की और यह अभी भी सक्रिय है। इस संस्था ने टोरोंटो में कई कवि गोष्ठियाँ और समसमायिक नाटक आयोजित किये। इस संस्था के माध्यम से भारत और इंग्लैंड के कई कवियों को सुनने का अवसर भी टोरोंटो शहर को प्राप्त हुआ। इस संस्था के मुख्य सदस्य और सक्रिय लेखक थे/हैं : डॉ. भारतेंदु श्रीवास्तव, अरुणा भटनागर, डॉ. ब्रजकिशोर कश्यप, राज कश्यप, विजय विक्रांत, आशा बर्मन, अचला दीप्ति कुमार, शैल शर्मा, डॉ. कैलाश भटनागर एवम सरोज भटनागर, सुरेश भार्गव एवम प्रमिला भार्गव, डॉ. ओंकार प्रसाद द्विवेदी श्री भगवत शरण श्रीवास्तव

१९९८ में टोरोंटो में ही ’हिन्दी प्रचारिण सभा का गठन हुआ जिसके अध्यक्ष श्री श्याम त्रिपाठी हुये। इसी के अन्तर्गत "हिन्दी चेतना" का प्रकाशन होता है।

२००८ टोरोंटो में सुमन कुमार घई, विजय विक्रांत और डॉ. शैलजा सक्सेना ने "हिन्दी राइटर्स गिल्ड" संस्था प्रारंभ की जिसका उद्देश्य साहित्य स्तर में सुधार के लिये मासिक गोष्ठियाँ करना और हिन्दी की पुस्तकों का कनाडा में ही प्रकाशन/प्रचार करना है। इस संस्था ने अब तक १३ पुस्तकों और पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया है। इस संस्था में डॉ. शैलजा सक्सेना ने हिन्दी साहित्य के कई प्रसिद्ध नाटकों जैसे "अंधायुग", "रश्मिरथी", “मित्रो मरजानी", "सूरदास”, "संत जनाबाई" आदि नाटकों का निर्देशन/ मंचन करके हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के प्रति लोक-रुचि उत्पन्न करने के सफल प्रयास किये हैं। यह संस्था अब तक छह नाटकों का मंचन कर चुकी है। हिन्दी राइटर्स गिल्ड और टोरोंटो के प्रकाशित एवं सक्रिय लेखक हैं: कृष्णा वर्मा (अम्बर बाँचे पाती-हाइकू संग्रह), मानोशी चटर्जी (उन्मेष), आशा बर्मन (कही-अनकही), पूनम चंद्रा ’मनु’ (जज़्बात), दीप्ति अचला कुमार (विविध रंग), जसबीर कालरवि (रबाब, अमृत (उपन्यास), निर्मल सिद्धु (निर्मल भाव), भगवत शरण श्रीवास्तव (मृगतृष्णा), पाराशर गौड़ (उकाल-उन्दार), डॉ. शैलजा सक्सेना (क्या तुम को भी ऐसा लगा?), पंकज शर्मा (आवाज़, गज़ल, सफर), अनिल पुरोहित (शहर की पगडंडी, अन्त:पुर की व्यथा कथा), रीनू पुरोहित (सिंदूर की वक्र रेखा (उपन्यास), मीना चोपड़ा (सुबह का सूरज अब मेरा नहीं है), आचार्य संदीप कुमार ’त्यागी दीप’ (साँझ, चंद्र शेखर आज़ाद”शतक’, डॉ. रेणुका शर्मा (एक धुला आसमान), आदि। सभी कवियों और कवयित्रियों का नाम यहाँ नहीं लिया जा सकता पर टोरोंटो शहर के स्तंभ कहे जाने वाले तीन कवि हैं: डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव,’ ’उस पार से’, ’शब्द मधुबन’, ’भगवद्गीता ज्ञान और गान’,’महाभारत हिन्दी गान’ आदि अनेक किताबें लिख चुके हैं। डॉ. शिवनंदन यादव का चार सौ कविताओं से अधिक का काव्य संग्रह है, ’चंदनवन’ और तीसरे महाकवि. प्रो. हरिशंकर आदेश। सत्यनारायण मोटुरि पुरस्कार विजेता आदेश जी ने ५ महाकाव्यों (अनुराग, शंकुतला, निर्वाण, महारानी दमयंती के साथ ही लगभग ३०० से अधिक काव्य और संगीत की पुस्तकें प्रकाशित की हैं। आदेश जी ने "भारतीय विद्या संस्थान" नामक संस्था भी चलाई जिसमें हिन्दी, संगीत, संस्कृत और धार्मिक शिक्षा दी जाती थी।

”क्युबैक हिन्दी संघ’ १९७५ में बना। मैनीटोबा में प्रो. वेदानंद, विधु झा और शरद चंद्र ने "मैनीटोबा हिन्दी परिषद" १९८२ में बनाई जो केवल थोड़े से समय चल कर बंद हो गई।

कनाडा से कई काव्य संग्रह भी निकले। श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी ने १९८८ में "कैनेडियन" शीर्षक नाम से कनाडा के कवियों का काव्य संकलन सम्पादित किया था। डॉ. निर्मला आदेश ने १९९५ में "किंजल्क" नाम से एक काव्य संग्रह सम्पादित किया। १९९७ में डॉ. भारतेन्दु श्रीवास्तव और श्याम त्रिपाठी ने "प्रवासी काव्य" शीर्षक से टोरोंटो के कवियों का काव्यसंकलन निकाला। श्री नाथ द्विवेदी ने हिन्दी, पंजाबी, उर्दू और बंगला भाषा के कवियों का संकलन "रावी के अहसास फ्रेजर के तट पर" और २००६ में "उत्तरी अमेरिका के हिन्दी साहित्यकार" संकलन प्रकाशित किया। इस संकलन में अमेरिका और कनाडा के ५२ हिन्दी कवियों और कवयित्रियों की १२१ कवितायें संकलित हैं। २००९ में डॉ. भारतेंदु श्रीवास्तव, अचला दीप्तिकुमार और डॉ. शैलजा सक्सेना के संपादन में "काव्योत्पल" प्रकाशित हुआ जिसमें टोरोंटो के ३८ कवियों की रचनायें संगृहीत हैं।

इसके साथ ही कवि सम्मेलनों का प्रारंभ भी हुआ और धीरे-धीरे इनकी लोकप्रियता बढ़ती गयी है। पहला कवि सम्मेलन टोरोंटो की हिन्दी परिषद ने १९८२ में आयोजित किया जिसके संचालक श्री श्याम त्रिपाठी थे। हिन्दी लिट्रेरी सोसाइटी ऑफ कनाडा ने पहला अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन कराया। ये कवि सम्मेलन हर बड़े शहर में करवाये गये।

कनाडा में टोरोंटो शहर के अलावा ऑटोवा, मोंट्रियाल, सरी, विक्टोरिया आदि शहरों में भी साहित्य सृजन का कार्य हो रहा है। जन रुचि को देखते हुये हास्य कवियों और लेखकों के सार्वजनिक कार्यक्रमों की संख्या बढ़ रही है। भारत से कवि बुलाये जाते हैं। अतिथि कवि एक साथ कनाडा के ६ और अमरीका के १० शहरों में जाने का कार्यक्रम बना कर आते हैं और उत्तरी अमरीका में हिन्दी प्रेम को बढ़ाते हैं। इस तरह से हिन्दी के प्रति प्रेम और साहित्य के प्रति रुझान को बढ़ाने की चेष्टा की जा रही है परन्तु इस देश में शिक्षण के स्तर पर बहुत कम सरकारी प्रयास किये जाने के कारण समुदाय के स्तर पर जो कुछ किया जा सकता है, वह करने की चेष्टा अनेक लोग करते हैं। हिन्दी के विश्व मानचित्र पर कनाडा की स्थिति उतनी सशक्त नहीं है जितनी कि मौरिशस, अमरीका या इंग्लैंड की, किन्तु कनाडा हिन्दी भाषा और साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ाने और दुनिया के सामने लाने के लिये निरंतर चेष्टारत है।

क्रमश:


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