अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
08.16.2007
 
भरपूर
डॉ. शैलजा सक्सेना

होंठों पर मुस्कुराहट
सूरज सी खिली,
माथे के चिंता-बादल,
हो गये तिरोहित सब।

आस खिली कमल बन,
मानस के नील जल।

आत्मा का पँछी फड़फड़ाता पर,
अनहद का किल्लोल भर, अपने स्वर...
तुम..

कहाँ हो दूर???
मेरे ही भीतर
भरपूर!!!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें