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05.23.2017
 
भक्ति: उद्‌भव और विकास
डॉ. शैलजा सक्सेना

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कुछ पश्चिमी विद्वानों ने भारत में भक्ति को ईसाई धर्म की देन सिद्ध करने की चेष्टा की थी जैसे वेवर, कीथ, ग्रियर्सन तथा विलसन आदि। ग्रियर्सन का मत है कि ईसा की दूसरी-तीसरी शताब्दी में कुछ ईसाई मद्रास में आकर बस गए थे तथा इनके प्रभाव से भक्ति का प्रसार हुआ। वेवर महोदय ने महाभारत में वर्णित ’श्वेत द्वीप’ का अर्थ गौरांग जातियों का निवास स्थान (यूरोप) बताया है। एक महोदय तो ’कृष्ण’ को यीशु का ही रूपांतरण मानते हैं।

इन सभी मतों का खंडन किया जा चुका है। भक्ति भारत की अपनी ही उपज है, बाहर से आयातित विचार नहीं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं - "एक जमाने में ग्रियर्सन, केनेडी आदि पंडितों ने उसमें ईसाईपन का आभास पाया था। उनकी समझ में नहीं आ सका कि ईसाई धर्म के सिवाय इस प्रकार के भाव कहीं और से भी मिल सकते हैं। लेकिन आज की शोध की दुनिया बदल गई है। ईसाई धर्म में जो भक्तिवाद है वही महायानियों की देन है सिद्ध होने चला है।"

द्विवेदी जी ने भक्ति को पराजित मनोवृत्ति की प्रतिक्रिया नहीं मानकर उसे ’जातिगत कठोरता और धर्मगत संकीर्णता’ की प्रतिक्रिया माना है जिसके कारण "साधुओं की विशाल वाहिनी सेना खड़ी होती जाती थी।" भक्ति के कारण इस अवस्था में नवीन आशा एवं उदारता का संचार हुआ था।

हम भक्ति को वैदिक काल में भी किसी न किसी रूप में उपस्थित देखते हैं। यज्ञ कार्यों में जो श्रद्धा तत्त्व था वही भक्ति का भी मूल तत्त्व है। उस काल में बहुदेववाद के प्रचलन को कालान्तर में भाव-एकता के आधार पर एक माना गया तथा उसे ’सत्‌’ कहा गया। वैदिक भक्ति परम्परा का सूत्रपात हो चुका था। यह परम्परा ईसा पूर्व कई शताब्दियों से शरणागति एवं समर्पण की प्रबल भावना को लेकर चली आ रही थी। इस धारा को दक्षिणात्य आचार्यों ने उत्तर भारत में भी बहुत लोकप्रिय बनाया। वैदिक काल की भक्ति के बीज लेकर ब्रह्मसूत्रों, उपनिषदों, गीता एवं भाष्यों की परम्परा को अपनाया गया। फलत: तत्कालीन पारम्परिक भक्तिमार्ग में भी कई नूतन परिवर्तन हुए। दक्षिण से आने वाला भक्ति का प्रवाह उत्तर भारत पर पूरी तरह छा गया परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं था कि उत्तर भारत भक्ति से पूर्णतया शून्य था। वैदिक काल से श्रद्धा, प्रेम के भाव शाश्वत प्रवाह की तरह यहाँ की जनता को भी विरासत में मिले थे। राजनैतिक उथल-पुथल के समय में भी पण्डितों के शास्त्रार्थ, भाष्यों का विवेचन, गीता पाठ आदि चलता ही रहता था। उत्तर भारत में बहुत पहले से (ई.पू. 200 से ई.पू. 600 तक) ब्राह्मण युग में समन्वय की चेष्टाएँ प्रारम्भ हो गई थीं। दक्षिण भारत में यह स्थिति बहुत समय बाद आई। मौर्य-साम्राज्य में ब्राह्मणों के ओज एवं तेज को नवीन उत्साह मिला। तब सूत्रों-स्मृतियों की व्याख्या आदि का शिथिल पड़ा हुआ कार्य फिर प्रारम्भ हुआ। गुप्तकाल में भी वैदिक धर्म के पुनरुत्थान की सफल चेष्टा हुई। देवी-देवताओं एवं मन्दिरों की स्थापना द्वारा यह लुप्त होती हुई व्यवस्था फिर जागृत हो उठी। इस काल में वैष्णव धर्म या विष्णु आराधना पर विशेष बल दिया गया था। ब्राह्मणों में भी एक ऐसा वर्ग उभर रहा था जो शास्त्रों के नियमों की कट्टरता त्याग कर, समय के प्रवाह के साथ ब्राह्मणेतर श्रमणादि के साथ समन्वय कर रहा था। इसे नव ब्राह्मणवाद कहा गया जिसके अरन्तर्गत -

1.धर्म विशेष का लौकिकी करण
2.अवतारवाद की स्वीकृति
3. देवालयों में देव प्रतिमाओं की पूजा
4. तीर्थादि की स्थापना
5. भारतीय जीवन में धर्म का संरक्षण।

इन सबका भारत के मध्यकालीन जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा था। जनता में तीर्थाटन, साधु-संन्यासियों का सम्मान, कर्म-फल में विश्वास, स्वर्ग-नरक, मूर्त्ति पूजा, अवतारवाद आदि के प्रति विश्वास थे। इस तरह एक दृढ़ पृष्ठ-भूमि यहाँ दक्षिण से आने वाले भक्ति प्रवाह के लिए पहले ही बन चुकी थी। हिन्दू समाज इस समय दो मुख्य वर्गों में बँटा हुआ था - एक, जो कि शास्त्रों के समर्थक थे, दूसरे - जिनकी परम्परागत -त्रयी (श्रीमद्‌भगवत गीता, उपनिषद्‌, बादरायण का ब्रह्मसूत्र) पर श्रद्धा थी। ब्रह्मसूत्रों पर शंकराचार्य (ई. 788-820ई.) का ’शारीरिक भाष्य’ का महत्त्व इतना अधिक था कि वेदान्त का अर्थ - शंकर वेदान्त - ही समझा जाता था। कुमारिल भट्ट ने भी भारतीय वैदान्तिक चिन्तन-धारा को बहुत अधिक प्रभावित किया था।

शास्त्र-समर्थित वेदान्त प्रसार की स्थिति में भी दक्षिण भारत में वैष्णव भक्ति के संरक्षण एवं प्रसार की सफल चेष्टा की जा रही थी। यह कार्य मुख्यत: दक्षिण के आलवार भक्त कर रहे थे। आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने भक्ति आन्दोलन का श्रेय इन्हीं आलवार भक्तों को दिया है। वैसे इनकी संख्या अधिक नहीं थी, ये केवल 92 थे जिनमें मीरा के समान मधुराभक्ति करने वाली एक भक्तिन भी थीं। इनका समय ईसा की प्रथम शताब्दी से कुछ पहले से लेकर 8वीं - 9वीं शती तक माना गया है। इन भक्तों में भक्ति के सैद्धान्तिक पक्ष को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक भक्ति पर बहुत अधिक बल दिया गया था। 10-11वीं शताब्दी में आचार्य नाथ मुनि हुए, जिन्होंने वैष्णवों का संगठन, आलवरों के भक्तिपूर्ण गीतों का संग्रह, मन्दिर में कीर्त्तन एवं वैष्णव सिद्धान्तों की दार्शनिक व्याख्या आदि महत्त्वपूर्ण कार्य किए जिनसे भक्ति परम्परा को नया बल मिला। इन्हीं के उत्तराधिकारियों में रामानुजाचार्य हुए जिन्होंने उत्तर भारत में भगवान विष्णु की दास्य भक्ति पर बल दिया था, इनका सम्प्रदाय श्री सम्प्रदाय था। इस तरह भक्ति की यह धारा, दक्षिण से उत्तर में आई किन्तु इसको पुष्ट करने में उत्तर एवं पूर्व भारत के अपने विश्वासों, मतों तथा विचारों का सहयोग मुख्यत: रहा है। इसी परम्परा में रामानन्द जी हुए। इन्होंने विष्णु के रामावतार पर मुख्य रूप से बल दिया। इस तरह राम भक्ति का प्रवाह आरम्भ हुआ जिसको कालान्तर में व्यापक एवं पुष्ट बनाने में रामानन्द जी से प्रभावित तुलसी का सहयोग मुख्य रहा। तुलसी ने रामभक्ति को सर्वाधिक लोकप्रिय बनाया। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठा करके नैतिक तथा सामाजिक जीवन को ऊँचा उठाने का अप्रत्यक्ष प्रयास उन्होंने किया।

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