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03.27.2012
 
भक्ति: उद्‌भव और विकास
डॉ. शैलजा सक्सेना

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भक्ति किसी काल विशेष में बँधकर रहने वाला भाव नहीं है। भक्ति का प्रार्दुभाव कब हुआ, इसके विषय में स्पष्ट एवं निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। अत्यन्त प्राचीन काल अर्थात्‌ वैदिक युग में ही कभी इसका जन्म हुआ था एवं प्रकारान्तर में यह अपने स्वरूप को और अधिक स्पष्ट करने में सफल हुई।

प्राय: साहित्य का, उसकी प्रवृत्तियों के आधार पर काल विभाजन करते हुए हमारे विद्वान आचार्यों ने मध्यकाल के प्रारम्भिक भाग को भक्तिकाल की संज्ञा दी है। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि इस काल में अन्य प्रकार की रचनाएँ ही नहीं होती थीं अथवा इस काल के समस्त ग्रन्थ भक्तिमूलक हैं। वस्तुत: प्रवृत्तिविशेष के आधार पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस काल को यह संज्ञा प्रदान की। उन्होंने इसकी अवधि तक निश्चित की है। यद्यपि यह कालावधि बहुत से विद्वानों को पूर्णतया उचित नहीं जान पड़ती है तथापि ठोस प्रमाण के अभाव में वे इसमें परिवर्तन कर सकने में असमर्थ सिद्ध हुए हैं। विषयवस्तु के आधार पर कुछ अन्य रचनाओं को इस काल-धारा में अन्तर्युक्त करते हुए डा. नगेन्द्र भक्तिकाल को चौदहवीं शती के मध्य से सत्रहवीं शती के मध्य तक मानते हैं क्योंकि उनके अनुसार चौदहवीं शती के मध्य तक आदिकाल की प्रवृत्तियाँ पर्याप्त बलवती थीं। अपना मत देने के उपरान्त भी उन्होंने अन्य विद्वानों की भाँति ही आचार्य शुक्ल के निर्णय को स्वीकार किया है। इस तरह काल विभाजन के विषय में आचार्य शुक्ल का मत मान्य है परन्तु भक्ति के प्रार्दुभाव के विषय में दिए गये आचार्य शुक्ल के विचार विश्लेषण विवेचन के आधार पर मान्य नहीं हुए हैं। शुक्ल जी का मत था - "देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए अवकाश न रह गया। उनके सामने ही उनके देवमन्दिर गिराए जाते थे, देवमूर्त्तियाँ तोड़ी जाती थीं, अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?"

इस तरह शुक्ल जी ने भक्ति को पराजित, असफल एवं निराश मनोवृत्ति की देन माना था। अनेक अन्य विद्वानों ने इस मत का समर्थन किया जैसे, बाबू गुलाब राय आदि। डा. राम कुमार वर्मा का मत भी यही है - "मुसलमानों के बढ़ते हुए आतंक ने हिंदुओं के हृदय में भय की भावना उत्पन्न कर दी थी इस असहायावस्था में उनके पास ईश्वर से प्रार्थना करने के अतिरिक्त अन्य कोई साधन नहीं था।"

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सर्वप्रथम इस मत का खंडन किया तथा प्राचीनकाल से इस भक्ति प्रवाह का सम्बन्ध स्थापित करते हुए अपने मत को स्पष्टत: प्रतिपादित किया। उन्होंने लिखा - "यह बात अत्यन्त उपहासास्पद है कि जब मुसलमान लोग उत्तर भारत के मन्दिर तोड़ रहे थे तो उसी समय अपेक्षाकृत निरापद दक्षिण में भक्त लोगों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की। मुसलमानों के अत्याचार से यदि भक्ति की धारा को उमड़ना था तो पहले उसे सिन्ध में फिर उसे उत्तरभारत में प्रकट होना चाहिए था, पर हुई वह दक्षिण में।"

इस मत का समर्थन उन्होंने पुष्ट, प्रामाणिक विचारों द्वारा किया है जिससे यह सिद्ध हुआ है कि भक्ति किसी आतंक या भय से उत्पन्न पंगु विश्वास नहीं था अपितु उत्साह एवं वीरता से पूर्ण क्षणों में कल-कल निनाद कर बह उठने वाली श्रद्धाधारा थी जिसे सूर, तुलसी, कबीर जैसे सशक्त व्यक्तित्व मिले थे। वस्तुत: अधिकांश मुसलमान शासक अत्याचारी थे। फिर भी अकबर, शाहजहाँ, जहाँगीर का राज्यकाल भारत को समृद्ध एवं सम्पन्न बनाने वाला काल था। इस समय तक हिन्दू एवं मुसलमान संस्कृतियों का पारस्परिक वैचारिक आदान-प्रदान द्वारा समन्वय भी स्थापित हो चला था। यह भारतीय संस्कृति की अत्यन्त प्राचीन काल से विशेषता रही है कि वह इस धरती पर आने वालों की संस्कृति का स्वागत कर उसे अपना लेती है अत: भारतीयों के लिए इस प्रकार की घटना कोई पहली घटना नहीं थी। आर्य जाति का यक्ष, किन्नर आदि जातियों से समन्वय उससे बहुत पहले ही इस तथ्य का प्रमाण बन चुका था। मुगलों के भारत आने से पूर्व भी अनेकों विदेशी आक्रमण भारतीय झेल चुके थे। आतंक, भय, विनाश का वातावरण वे सह चुके थे। अत: मुगलों का आक्रमण, देवमन्दिरों का गिराया जाना, आदि घटनाएँ उनके लिए अचानक आई हुई या अनोखी विपत्ति नहीं थी। फिर मुगल इस दृष्टि से अन्य आक्रमणकारियों से भिन्न थे कि वे भारत को लूट कर वापिस नहीं लौटे अपितु यहीं बस गए। सूफ़ी सन्तों ने इनसे भी पूर्व
अपनी सहृदयता एवं प्रेम से हिन्दुओं के मन में कुछ विश्वास जागृत करने की सफल चेष्टा की थी। इस तरह लम्बे समय तक साथ रहने से तथा एक-दूसरे के विषय में कुछ जानकारी मिलने से भारतीयों ने मुसलमानों के साथ सहिष्णुता एवं उदारतापूर्वक व्यवहार किया फलत: ये दोनों संस्कृतियाँ भी परस्पर बहुत कुछ समन्वित हुईं।

इस तरह यह एक तथ्य तो स्पष्ट हो गया कि भक्ति का सम्बन्ध मुगलों के आक्रमण या उनके आने से मुख्यरूप से नहीं है। दूसरा विचार भक्ति को पराजित मनोवृत्ति की देन मानने का था, यह उचित नहीं है।

भारतीय अपनी पराजय बहुत सरलता से स्वीकार नहीं करते हैं और यदि पराजित हो भी जाते हैं तो आशा नहीं त्यागते हैं। संघर्ष और कर्म वैदिक काल से ही इस संस्कृति के दो प्रमुख तत्त्व रहे हैं जिसके मर्म को भारतीय पहचानते हैं अत: हर परिस्थिति में संघर्ष एवं कर्म करना यहाँ का इतिहास रहा है। पलायन इस धरती की प्रवृति नहीं है। इस आधार को लेकर चलने वाले राजपूतों को हम मुगलों से अपनी शक्ति के अन्तिम सोपान तक लड़ते हुए पाते हैं। हिन्दू जाति की जीवनी शक्ति विषम से विषम परिस्थिति में भी प्रखर रही है अत: इस इतिहास को ध्यान में रखते हुए हम उन्हें पराजित मनोवृत्ति युक्त नहीं मान सकते। इसी सन्दर्भ में दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि भक्ति का उदय अशान्ति, निराशा या कुण्ठित वातावरण में संभव नहीं है। भक्ति कोई बाह्य आवरण या कवच नहीं है जिसे असुरक्षा की अनुभूति से बचने के लिए कुछ क्षणों के लिए पहना जा सके। भक्ति हृदय के भीतर से उत्पन्न होने वाला सघन रागात्मक तत्त्व है जिसमें हृदय की समस्त संवेदना, अनुभूति प्रेम का रूप धारण करके ईश्वर के चरणों में समर्पित होती है अत: इसे "रेडीमे" वस्तु नहीं माना ा सकता आ्रमण होता देखा तो ग्रहण कर लिया एवं शान्तिपूर्ण दिनों में इसे त्याग दिया। एक तथ्य यह भी ध्यान देने योग्य है कि भक्तिकाल के प्रमुख व्यक्तियों - सूर, तुलसी, कबीर, मीरा आदि में से कोई भी राजनैतिक नेता या सेनापति नहीं था। इन लोगों में तो राजनैतिक निर्लिप्तता का ही गहन भाव दिखाई देता है। इस दृष्टि से भयाकुल एवं आतंकपूर्ण वातावरण में सूर के कृष्ण की विविध लीलाओं का लोकप्रिय होना भी कम आश्चर्य की बात नहीं थी। उपरोक्त विवेचन से भी यही स्पष्ट होता है कि भक्ति निराशा की देन नहीं थी। फिर यह भी महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि उसी काल में सूफ़ी सन्त भी भक्ति का मार्ग क्यों ग्रहण कर रहे थे? उन पर तो कोई आतंक, भय नहीं था, उन्हीं के धर्मावलंबी इस देश पर शासन चला रहे थे, इसलिए इन कारणों से उनका ’ख़ुदा’ की ओर झुकना अस्वभाविक दिखाई देता है।

इन सबसे यह स्पष्ट होता है कि भक्ति के उदय का कारण कुछ और ही था, पराजित या निराशा मनोवृत्ति नहीं थी। आचार्य शुक्ल का मत भी इसी कारण मान्य नहीं हो सका।

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