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01.26.2008
 

जीने नहीं देते वो
शैलेश भारतवासी


कल रात
फिर से आ घिरा या
उनके बीच
आँख मिचौली खेल रहे थे
वे
चानक कँपकँपा गया था मन
सोचा
प्रकाश कर दूँ कमरे में
अभी उठकर पकड़ लूँगा उनको
पर वैसे ही पड़ा रहा
क्योंकि जानता था
प्रकाश की एक किरण भी
मेरी परेशानी बढ़ायेगी
भूत में
ऐसे कई प्रयास कर चुका था मैं
यह जानते हुये कि
प्रकाश होते ही
वे मेरी ही रूह में बैठ जायेंगे
........
पता नहीं कब चैन लेने देंगे
ये अंधेरे!
शायद....शायद
तब
जब अंतर एवम्‌ बाहर दोनों प्रकाशित होगा
पर.... कब
शायद अंतिम श्वास की घड़ी तक
यह सम्भव नहीं हो सकेगा।


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