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01.15.2012
 
विवश पशु
शैलेन्द्र चौहान

चरागाह सूखा है
निश्चिंत हैं हाकिम-हुक्काम

नियति मान
चुप हैं चरवाहे

मेघ नहीं घिरे
बरखा आई, गई

पशु विवश हैं
मुँह मारने को
किसी की खड़ी फसल में

हँस रहे हैं
आकाश में इन्द्र देव


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