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ISSN 2292-9754

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10.13.2014


'तलछट' से निकले हुए एक महान कथाकार

शैलेश मटियानी (14 अक्तूबर 1931-24 अप्रैल 2001)

 मटियानी जी से मेरी प्रत्यक्ष मुलाकात सन 1982 में परिमल प्रकाशन के संस्थापक शिवकुमार सहाय के घर पर हुई थी। तदुपरांत मटियानी जी का स्नेह मुझ पर आजीवन बना रहा। एक बार जब वह गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल दिल्ली में भर्ती थे तब मैं डॉ. मनु और रमेश तैलंग के साथ उन्हें देखने गया था तब वह लगातार दुर्गा सप्तपदी नामक किसी किताब की चर्चा कर रहे थे। संभवतः उस किताब का उनके मन पर गहरा प्रभाव था।

शैलेश मटियानी हिंदी साहित्य में नई कहानी आंदोलन के दौर के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। उन्होंने मुठभेड़, बोरीबली से बंबई, जैसे चर्चित उपन्यास, चील, अर्धांगिनी जैसी महत्वपूर्ण कहानियों के साथ ही अनेक निबंध और संस्मरण भी लिखे। 1950 से ही उन्होंने कविताएँ और कहानियाँ लिखनी शुरू कर दीं थी। शुरू में वे रमेश मटियानी 'शैलेश' नाम से लिखते थे। उनकी आरंभिक कहानियाँ 'रंगमहल' और 'अमर कहानी' पत्रिका में प्रकाशित हुईं। उन्होंने 'अमर कहानी' के लिए 'शक्ति ही जीवन है' (1951) और 'दोराहा' (1951) नामक लघु उपन्यास भी लिखा। उनका पहला कहानी संग्रह 'मेरी तैंतीस कहानियाँ' 1961 में प्रकाशित हुआ। उनकी कहानियों में 'डब्बू मलंग', 'रहमतुल्ला', 'पोस्टमैन', 'प्यास और पत्थर', 'दो दुखों का एक सुख' (1966), 'चील', 'अर्द्धांगिनी', ' जुलूस', 'महाभोज', 'भविष्य' और 'मिट्टी' आदि विशेष उल्लेखनीय है। कहानी के साथ ही उन्होंने कई प्रसिद्ध उपन्यास भी लिखे। उनके कई निबंध संग्रह एवं संस्मरण भी प्रकाशित हुए। उन्होंने 'विकल्प' और 'जनपक्ष' नामक दो पत्रिकाएँ निकालीं। उनके पत्र 'लेखक और संवेदना'(१९८३) में संकलित हैं। उनका जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। उनके जीवन के बारे में जानकर उनके संघर्षों का अनुमान लगाया जा सकता है। जिस वक्त वे एक छोटे से ढाबे में लगभग एक वेटर का काम कर रहे थे- प्लेटें धोने और चाय लाने का, उस वक्त तक उनकी कहानियाँ 'धर्मयुग' में छपनी शुरू हो गई थीं। कितनी बड़ी विडंबना है कि 'धर्मयुग' जैसे सर्वश्रेष्ठ अखबार में जिनकी कहानियाँ छपना शुरू हो गई हों वो एक छोटे से सड़क के किनारे बने ढाबे में चाय-पानी देने और प्लेट साफ करने का काम कर रहा हो। उन स्थितियों में निकलकर, जिसे गोर्की ने कहा है, 'समाज की तलछट से आए हुए लोग', वे आये थे। गोर्की ने अपनी आत्मकथा में इसी जीवन को जिया था जिसका नाम रखा था 'मेरा विश्वविद्यालय' गोर्की कहते थे कि ये मेरे विश्वविद्यालय हैं। यहाँ से मैंने ट्रेनिंग ली है। मटियानी का सशक्त बिंदु भी यही है। वो अपने ढंग के एक विचारक भी थे। देश की समझ, राष्ट्र की समस्या, भाषा की समस्या पर वे हमेशा लिखते थे। क्योंकि बिना लिखे रह भी नहीं सकते थे या कुछ तो आर्थिक कारणों से भी खाली रह सकना उनके लिए संभव नहीं था।

मटियानी जी का जन्म बाड़ेछीना गाँव (जिला अलमोड़ा, उत्तराखंड) में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। बारह वर्ष की अवस्था में उनके माता-पिता का देहांत हो गया। उस समय वे पाँचवीं कक्षा के छात्र थे। इसके बाद वे अपने चाचाओं के संरक्षण में रहे किंतु उनकी पढ़ाई रुक गई। उन्हें बूचड़खाने तथा जुए की नाल उघाने का काम करना पड़ा। पाँच साल बाद 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने फिर से पढ़ना शुरू किया। विकट परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की। वे 1951 में अल्मोड़ा से दिल्ली आ गए। यहाँ वे 'अमर कहानी' के संपादक, आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहाँ रहने लगे। तब तक 'अमर कहानी' और 'रंगमहल' से उनकी कहानी प्रकाशित हो चुकी थी। इसके बाद वे इलाहाबाद गए। उन्होंने मुज़फ़्फ़र नगर में भी काम किया। दिल्ली आकर कुछ समय रहने के बाद वे बंबई चले गए। फिर पाँच-छह वर्षों तक उन्हें कई कठिन अनुभवों से गुज़रना पड़ा। उनकी कहानी की दुनिया मार्जिनलाइज़्ड की दुनिया है। गरीबों की दुनिया है। वह ख़ुद जाति व्यवस्था से पीड़ित रहे, पहाड़ से भगा दिए गए। वे भगाए गए थे इसलिए कि वे उस ढंग से क्षत्रिय भी नहीं थे। कसाई थे। इनके परिवार में कसाई का काम होता था। यह उनको तकलीफ़ देता था। 1956 में श्रीकृष्ण पुरी हाउस में काम मिला जहाँ वे अगले साढ़े तीन साल तक रहे और अपना लेखन ज़ारी रखा। बंबई से फिर अल्मोड़ा और दिल्ली होते हुए वे इलाहाबाद आ गए और कई वर्षों तक वहीं रहे। 1992 में छोटे पुत्र की मृत्यु के बाद उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। जीवन के अंतिम वर्षों में वे हल्द्वानी आ गए। विक्षिप्तता की स्थिति में उनकी मृत्यु दिल्ली के एक अस्पताल में हुई।

निराला, भुवनेश्वर, मुक्तिबोध और मटियानी इन सबके साथ जो कुछ हुआ उसको देखकर ऐसा लगता है कि हिंदी का एक ईमानदार लेखक कितना निरीह होता है। इन सभी की ट्रेजेडी यह है कि जितने प्रतिभाशाली ये थे इतनी मान्यता उन्हें नहीं मिली, उतनी स्वीकृति नहीं मिली। उससे भी ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की रही कि जिनमें कम प्रतिभा थी वो लोग अपने संपर्कों से, साधनों से, तिकड़मों से स्थापित हो गए। और हिंदी में यही ट्रेंड आज भी बाकायदा कायम है।


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