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| 10.05.2007 |
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स्वप्निल
द्वीप शैलेन्द्र चौहान |
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अच्छा
होता
विस्मृत
हो जातीं
सारी
परिकथाएँ,
चमचम
मनोहर वे
स्वप्निल
द्वीप !
यथार्थ चीर देता
तलवार की धार से
विगत और वर्तमान को
दो भागों में
ठहर जाती हवा
छुप जाता चाँद
हँसते रहते हम |
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