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01.15.2012
 
स्वप्निल द्वीप
शैलेन्द्र चौहान

 

अच्छा होता

विस्मृत हो जातीं

सारी परिकथाएँ,

चमचम मनोहर वे

स्वप्निल द्वीप !

 

        यथार्थ चीर देता

        तलवार की धार से

        विगत और वर्तमान को

        दो भागों में

 

            ठहर जाती हवा

            छुप जाता चाँद

            हँसते रहते हम


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