अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
01.15.2012
 
परिवर्तन
शैलेन्द्र चौहान

 

कई बार

झुँझलाया हूँ मैं

सड़क के किनारे खड़ा हो

न रुकने पर बस

 

गिड़गिड़ाया हूँ कई बार

बस डक्टर से

ले चलने को गाँव तक

हर बार

कचोटता मेरा मन

कसमसाता

आहत दर्प

 

अब

गुज़रता मैं

तेज गति वाहनों से

देखता इन्तज़ार करते

ग्रामवासियों को

किनारे सड़क के

 

नहीं कचोटता मन

न आहत होता दर्प

 

सोचता --

नहीं मेरे हाथ में लगाम

न पैरों के नीचे ब्रेक

 

नहीं

अब कोई अपराध बोध भी नहीं

मेरे मन में


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें