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01.15.2012
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मेरे सामने वाला
शैलेन्द्र चौहान

उस दिन इतवार था, अमूमन चाय नश्ता इतवार को दस बजे से पहले नहीं होता था । केतन सुबह छ: बजे ही उठ जाता पर मीरा और बच्चे सात आठ बजे तक उठते थे । उस दिन भी केतन जल्दी जाग गया और दैनिक क्रिया कर्म से निवृत होकर बाहर बरामदे में आकर बैठ गया । कुछ देर बाद मीरा भी जाग गई और सुबह की चाय बनाकर उसने केतन को दे दी । चाय पीने के बाद केतन शेव करने के लिए उठा, फिर सोचा क्यों न आज शेव बाहर बैठकर ही कर ली जाए सो उसने पानी, शीशा और शेविंग किट मीरा से बाहर ही मँगा लिए । मीरा घर के काम में लग गई, बच्चों के उठने के बाद नाश्ता बनाना था । केतन जब शेव कर रहा था तो उसने देखा कि शुभा छत पर टहल रही है । थोडी देर बाद वह सीधी केतन की सीध में अपने टीवी का एन्टीना घुमा रही थी । उसने केतन की ओर देखा, केतन को लगा प्रत्युत्तर में अभिवादन स्वरूप थोड़ा मुस्करा देना चाहिए पर नहीं मुस्करा पाया सोचा कहीं इसका गलत अर्थ न निकाल लिया जाए और व्यर्थ में गलतफहमी पैदा हो जाए । शुभा की बड़ी बड़ी सुन्दर आँखें निश्चित ही बहुत मोहक है, केतन मन ही मन उसकी तारीफ किए बिना न रह सका । शुभा नीचे चली गई, थोडी देर में एक फिल्मी गाने की दो लाइनें जोर से उभरीं दिल है कि मानता नहीं, मुश्किल बड़ी है रस्में मुहब्बत जानता ही नहीं । पुन: गाने को यहीं रोककर रिवाईंड करके वही लाइनें फिर बजीं । यही गाना रात को भी बज रहा था । केतन को लगा यह गाना शुभा को ज्यादाप्रिय है पर सिर्फ दो लाइनें ही बजाने का अर्थ उसकी समझ में नहीं आया ।

बरसात का मौसम आ गया था, शाम घिर आई थी, बादल छाए हुए थे, अचानक ठंडी-ठंडी हवा बहने लगी । केतन और मीरा बाहर बरामदे में निकल आए । सुहावनी हवा से प्रफुल्लित होकर वे अपनी छोटी बेटी द्वारा एक दिन ऐसी ही किसी सुबह कही गई बात को याद करके खुश होने लगे कि बहुत सुन्दर हवा चल रही है ।जब तुतलाते हुए सुन्दर को उसने सुन्दल कहा था तो कितना अच्छा लगा था और इस बात को वे इस सुन्दर मौके पर याद करके आनंदित हो रहे थे । उसी समय एक बेसुरा स्वर उभरा जब चली ठंडी हवा, जब उठी काली घटा इसके बाद खेल खत्म । मीरा को मजा आ गया बोली गाना तो मौसम के अनुकूल है ।

केतन हँसा और बोला लगता है यहाँ दो ही लाइनें गाने और सुनाने की रवायत है ।

मीरा बोली इतने दिनों तक तो न कभी सुर फूटा न ताल, अचानक कैसे मौसम बदल गया ।

केतन ने अपनी रटी रटाई राय दोहराई उम्र का तकाजा है, वैसे अच्छी लड़की है ।

मीरा ने थोड़ा हँसते हुए भृकुटी चढ़ाई वैसे कैसे अच्छी लड़की है?’

केतन थोड़ा सहमा फिर बोला तुम भी क्या बात करती हो ।

 ठीक है तुम बैठो, मैं तो अब खाना बनाने की तैयारी करने चली, बच्चों को भूख लग रही है कहकर मीरा घर के अंदर चली गई ।

केतन का मैं बेहद सम्मान करता था, शांत, सौम्य और धीर गंभीर व्यक्ति था वह । अनायास ही उसके प्रति सम्मान का भाव मन में जन्म ले लेता था । मैं जब भी उससे बात करता तो बहुत ही विनम्रता और नर्म लहजे में बात करता जैसे कि वह मुझसे वर्षों छोटा हो । दो चार वर्ष छोटा रहा भी होगा परन्तु मैंने जब भी उसे किसी और से भी बात करते देखा तो उसी अंदाज में । उसके बात करने में जो भोलापन और मुलायमियत थी वह उसके धीर गंभीर और चुप-चुप रहने वाले गर्वीले स्वभाव से मेल नहीं खाती । आज फिर मेरी पत्नी ने केत के लिए निन्दा राग छेड़ दिया । मुझे अचानक  समझ में नहं आया कि क्या हुआ पर जब पत्नी बोली कि शुभा आई थी तो मैं समझ गया कि पत्नी के दुराग्रह को शुभा से कुछ और बल मिला है । मैंने पूछा किस काम से आई थी वह?’

उस दिन ओवन ले गई थी, उसे ही लौटाने आई थी ।

मैंने आगे पूछा क्या कह रही थी?’

नहीं कुछ खास नहीं, बस यूँ ही घर द्वार की बातें, अपनी मम्मी और अपने बर्थ डे के बारे में । हाँ वह बोल रही थी कि मम्मी ने ही कहा था कि तू अपनी सहेलियाँ भर बुलाले, बाकी लोगों को क्या बुलाना ।

 अच्छा और क्या कह रही थी मैंने उत्सुकता जताई ।

कह रही थी कि उनके अपने पड़ोसी अवस्थी जी से अच्छे संबंध हैं नहीं, और जो नए किराएदार आए हैं उनके तो भाव ही नहीं मिलते, बड़े घमण्डी हैं । और शुभा की मम्मी कह रही थीं कि बदतमीज भी हैं, ऊपर बरामदे में बैठ जाते हैं ।

मुझे बहुत गुस्सा आया अपनी पत्नी पर, मैंने कहा इसमें बदतमीजी की क्या बात है? बरामदे में बैठते हैं तो अपने बरामदे में बैठते हैं किसी और के बरामदे में तो नहीं बैठते । और क्या बदतमीजी करते हैं वहाँ बैठकर? किसके साथ बदतमीजी की उन्होंने, शुभा की मम्मी के साथ या शुभा के साथ?’

पत्नी मेरे तेवर देखकर सहम गई और बोली मैंने कहाँ कहा, वह तो शुभा ही कह रही थी कि उसकी मम्मी कहती हैं ।

उनकी तो किसी के बारे में कुछ भी कहने की आदत है । यह बात तो सारे मोहल्ले वाले जानते हैं ।’ ’शुभा कह रही थी उसकी मम्मी को केतन का बाहर बैठना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता ।

वो तो बावली हैं, केतन शरीफ आदमी है, बीबी बच्चों वाला । क्या तुम्हें ऐसा लगता है या शुभा कुछ बता रही थी । मैंने पूछा ।

वह बोली नहीं ऐसा तो नहीं लगता, शुभा तो उसके मजे ले रही थी, नकल उतार रही थी कि कैसे चलता है, कैसे देखता है, कैसे बोलता है और कह रही थी कि शायद अपनी बीबी से बहुत डरता है ।

केतन उस दिन जब घर की बाउंडरी के अंदर दाखिल हुआ तो उसे शुभा ड्राइंगरूम से निकल कर बरामदे में आती हुई दिखाई दी । दिन भर की थकान और किचकिच के बाद उसे यह एक अच्छा चेंज लगा । केतन सीधा सीढ़ियाँ चढ़कर अपने घर में घुस गया और शुभा अपने लॉन में गार्डन चेयर पर बैठ गई, केतन के छज्जे की ओर मुँह करके । आज उसकी मम्मी उसके पास नहीं थीं, वह बस चुपचाप बैठी थी । केतन उस दिन काफी देर तक बाहर छज्जे में आकर नहीं बैठा और जब वह बाहर आया तो अंधेरा घिर आया था । शुभा उठकर घर के भीतर चली गई थी । तभी कैसेट प्लेयर पर जोर से गाने की वही दो लाइनें बजीं दिल है कि मानता ही नहीं, मुश्किल है बड़ी रस्मे मुहब्बत जानता ही नहींऔर फिर बंद हो गईं ।

यद्यपि एक लम्बे समय के दौरान शुभा हमारे घर दो बार ही आई थी । एक बार ओवन माँगने और दूसरी बार वापस करने, पर न जाने क्यों मेरी पत्नी उसमें कुछ स्¡घ पा रही थी । वह शुभा की तो तारीफ करती थी और उसे अच्छी लड़की होने की सनद भी दे रही थी पर केतन को अच्छा आदमी मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी । मैंने पूछा कहीं यह तुम्हारी ईष्र्या तो नहीं है केतन के प्रति क्योंकि वह और लोगों जैसा एवरेज आदमी नहीं है, उसमें कुछ खास है ।

पत्नी चिढ़ी और बोली क्या खास है, कहीं का राजा नवाब है? देखने सुनने में भी कुछ खास नहीं,  हाँ नखरे जरूर स्टार वाले हैं ।

मैंने कहा तो यही तुम्हारी ईष्र्या का कारण है?’

वह बोली नहीं वह अच्छा आदमी नहीं है ।

मैंने पूछा उसने तुम्हारे साथ क्या कोई बदतमीजी की है ।

वह तैश में बोली क्या बात करते हो, मेरे साथ बदतमीजी करेगा तो मैं उसका मुँह नहीं नोंच लूँगी ।

तो फिर तुम उससे क्यों चिढ़ती हो? क्या तुम्हें शुभा ने कुछ कहा?’

अब पत्नी ढीली पड़ गई, बोली नहीं शुभा ने तो कुछ नहीं कहा, पर मुझे ऐसा लगता है कि वह शुभा के प्रति आकर्षित है ।

ऐसा तुम कैसे कह सकती हो?’

वह जितनी देर बरामदे में बैठा रहता है और टहलता है, शुभा भी बगीचे में होती है ।

बस करो, यह तुम्हारा कोरा भ्रम है, शुभा बगीचे में होती है तो केतन का क्या है? और फिर तुमने दुनिया भर का ठेका ले रखा है क्या? शुभा और उसकी मम्मी से ही तुम्हारा ऐसा क्या संबंध है । शुभा ऐसी भी कोई नासमझ नहीं है, एम एस सी फायनल में है । पत्नी चुप हो गई थी पर उसकी आँखों में संशय, किसी अप्रत्याशित घटना की आशंका भरी छाया नजर आ रही थी ।

    उसी दिन शाम को दुकान पर मुझे केतन मिल गया । वह अपने छोटे बेटे को घुमा रहा था और अपने चश्मे के फ्रेम में कील डलवाने दुकान पर आ गया था । मैंने पूछा केतन बाबू आजकल साइट पर कुछ ज्यादा काम है क्या, काफी देर से आते हैं ।

वह बोला नहीं काम तो कुछ ज्यादा नहीं है, हाँ साइट थोड़ी दूर जरूर है ।

अचानक न जाने क्यों मेरे मुँह से निकला ये मकान आपको छोटा नहीं लगता? इसी मोहल्ले में मेरे दोस्त का एक अच्छा फ्‍लेट है, आप चाहें तो देख लें ।

केतन थोड़ा असमंजस में पड़ गया, बोला अभी तो यहाँ आया हूँ, बार-बार शिफ्‍ट करने में दिक्कत होती है ।

मैं चुप हो गया पर मुझे लगा जैसे मैं अपनी पत्नी के प्रभाव में आता जा रहा हूँ । मैंने उसके चश्मे में कील लगा दी और वह पैसे देकर चला गया ।

केतन की दिनचर्या में अब अनचाहे ही मेरी भी एक रहस्यमयी रुचि पैदा हो गई थी । यद्यपि इसका पूरा श्रेय मेरी पत्नी को जाता था । अब सुबह-शाम मेरी निगाहें अपने आप केतन के बरामदे पर टिक जातीं । अब मुझे ऐसा लगता कि केतन ज्यादा देर तक बरामदे में बैठता है, पहले कुछ कम बैठा करता था । अब उठ-उठ कर टहलता भी है । मैं फिर सोचता कि यह मेरा भ्रम भी हो सकता है । मैं तो सुबह जल्दी दुकान के लिए निकल जाता हूँ और शाम को भी देर से ही आता हूँ, तब मैं कैसे यह कह सकता हूँ । मेरे मन में धीरे-धीरे एक अंतर्द्वंद्व छिड़ा रहने लगा । कभी लगता, हाँ कुछ गड़बड़ तो है, कभी लगता सब बकवास है । कुछ तय कर पाना मुश्किल ही था । पत्नी ने अब थोड़ा संयम धारण कर लिया था और इस मामले में ज्यादा रुचि लेना बंद कर दिया था । हाँ अब वह केतन के प्रति उतनी आक्रामक तो नहीं रही थी पर शुभा के लिए उसके मन में जो सहजता थी वह धीरे-धीरे कम होती जा रही थी । वह कहती शुभा लॉन में तभी पानी देती है जब केतन बरामदे में खड़ा होता है, या शुभा भी तब तक बाहर बैठी रहती है जब तक केतन बाहर रहता है ।इन दिनों एक और गतिविधि ऐसी थी कि मैं और मेरी पत्नी गौर किए बिना नहीं रह पाते थे । सुबह कॉलेज जाने के समय शुभा और शुभा की मोपेड कुछ ज्यादा ही शोर करने लगे थे । अपनी माँ से जोर-जोर से कुछ बतियाना, फिर मोपेड को देर तक स्टार्ट रखना, दो एक बार हार्न भी चेक करना, नियमित क्रिया हो गई थी । और मजेदार बात यह होती कि इसी वक्त केतन अपनी शेविंग का सामान लेकर बाहर बरामदे में आ बैठता । शुभा मोपेड निकालती, बाहर वाला गेट बंद करती और एक बार बरामदे की तरफ निगाह फरंकती, केतन भी उस वक्त बाउण्डरी गेट की ही तरफ देख रहा होता । हम पति-पत्नी ने इस बात पर दो तीन बार कुछ रस लेकर, कुछ अनमनी सी बहस की और अंतत: यह पाया कि इसमें कुछ भी विशेष बात नही ह, इसे सहज ही लेना चाहिए क्योंकि ऐसी तमाम स्थितियों में केतन की पत्नी भी वहाँ अक्सर मौजूद होती थी ।

मैं और मेरी पत्नी दोनों ने अनकहे ही, मन ही मन यह निर्णय लिया कि केतन और शुभा को लेकर अब अधिक उत्सुकता न पाली जाए । इस मामले की यथासंभव उपेक्षा की जाए क्योंकि और भी काम हैं दुनिया में मुहब्बत की जासूसी के सिवा । इस अनकहे निर्णय पर हम लोगों ने अमल करना शुरू कर दिया और बेवजह की परोक्ष दखलंदाजी से हमने अपने हाथ खींच लिए । अब हमें न केतन में कोई बुराई दिखाई देती, न शुभा में । बल्कि वे दोनों अपनी अपनी दुनिया में कहीं अधिक मस्त दिखते । केतन सुबह-सुबह घूमने जाता, लौटकर अपने पामेरियन कुत्ते को टहलाता, शेव करता, बाल्कनी में टहलता, फिर नहाता धोता, नाश्ता करके आफिस चला जाता। शुभा सबेरे सात साढ़े सात बजे तैयार होकर निकलती, चहकती, मोपेड स्टार्ट कर कुछ देर तक घर्र-घर्र करती, हार्न बजाती, गेट बंद करती, एक निगाह केतन की बाल्कनी में फरंकती, कॉलेज चली जाती । वह दोपहर में दो ढाई बजे कॉलेज से वापस लौटती, आराम करती, पढ़ती-लिखती और शाम को छह साढ़े छह बजे लॉन में आकर बैठ जाती, टहलती, पेड़-पौधों में पानी देती, अपनी माँ से बातें करती । केतन की जीप अक्सर सात साढ़े सात के बीच आकर रुकती । वह ब्रीफकेस उठाता, ड्रायवर से जाने को कहता, एक नजर अपनी बाल्कनी पर फेंकता, फिर धीरे से पड़ोस के लॉन में, और धड़धड़ाता हुआ जीना चढ़ जाता । कुछ देर बाद पति-पत्नी बरामदे में बैठकर चाय पीते दिखाई देते ।

इस बीच शुभा एक दिन किसी काम से फिर हमारे घर आई । पत्नी ने देर तक उससे बातें कीं, वह खुश थी । उसके जाने के बाद वह बोली कितनी सोहणी कुड़ी है । मुझे भी अच्छा लगा, दरअसल अब तक हम दोनों केतन और शुभा के बारे में उन्हें एक दूसरे से जोड़कर कोई बात करने में झिझकते लगे थे । हमें लगता था कि शायद हम ही कहीं गलत थे । उस दिन अचानक मैंने पत्नी से पूछ लिया क्या केतन के बारे में कुछ नहीं कह रही थी शुभा, फिर धीरे से मैंने बात को संभाला, अब उसकी मम्मी क्या कहती हैं । पत्नी बहुत सहज थी जैसे उसे अंदाजा था कि यह सवाल पूछा ही जाएगा । वह बडे फिलॉसफाना अंदाज में बोली पता नहीं हमारे समाज में क्या गड़बड़ है कि एक जवान लड़की और किसी जवान आदमी को आसपास भी देख लें तो शक करने लेगेंगे। शुभा कॉलेज जाती है, लौटकर पढ़ाई करती है, सुबह शाम फ्रेश होने के लिए लॉन में टहलती है, मन बहलाती है । वह कह रही थी कि केतन तो चुप्पा और घमंडी है पर उसकी पत्नी बहुत अच्छी है । केतन बीबी बच्चों वाला है, अब एकदम छड़ा तो है नहीं कि लफंगयाई पर उतर आए, फिर अच्छी नौकरी करता है । थोड़ी बहुत दिल्लगी करता होगा आखिर शुभा खूबसूरत तो है ही । पत्नी की बात सुनकर मुझे अच्छा भी लगा और आश्चर्य भी हुआ कि यह वही औरत है जो कुछ दिनों पहले तक केतन को छटा हुआ बदमाश मान रही थी । खैर हमने यह स्वीकार कर लिया कि कहीं कुछ ऐसा वैसा नहीं है, वह महज हमारा संशयी स्वभाव था जिसके कारण हमें ऐसा भ्रम हुआ था ।

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