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| 10.05.2007 |
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मेरे सामने वाला शैलेन्द्र चौहान |
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अवस्थी जी
के मकान में जब से नया किराएदार आया है तब से न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता
है कि मेरे घर के लोगों की उत्सुकता थम नहीं पा रही है । सात दिन बीत चुके
हैं पर सभी के मन में एक अबूझ जिज्ञसा का भाव तिर रहा है पता नहीं कैसा
होगा वह व्यक्ति जो अवस्थी जी के मकान में किराए से रहने आया है । लेकिन
आखिर सबके मन में आशंका क्यों है?
क्या अपेक्षा कर रहे हैं सब,
क्या करेगा वह किराएदार?
केतन को
यह मकान खाली किए हुए कोई दो तीन महीने बीत चुके हैं तब से न जाने कैसा एक
अजीब सा खालीपन महसूस होने लगा है । लगता है पतझर के बाद सीधी गर्मी की ऋतु
आ गई हो,
वसंत आया ही न हो । अवस्थी जी के पडोसी सिन्धु जी भी तो मकान खाली कर गए
हैं,
कोई छ: महीने पहले । उनकी छोटी बेटी शुभा कितनी सुंदर और चंचल थी । कितना
भरा भरा लगता था उसके कारण सामने वाला मकान । अब तो उस मकान की रौनक ही सब
खत्म हो गई । सिन्धु जी का ही कोई रिश्तेदार उसमें आकर रह रहा है,
ईंट भट्टे का मालिक । शुभा की सूरत मेरी आखों में घूम रही है । शायद मैंने
ऐसी कोई दूसरी लड़की नहीं देखी जो इतनी सुंदर तो हो पर होशियार और सरल
स्वभाव की भी हो । एक अच्छी लड़की,
हाँ बहुत अच्छी लड़की थी शुभा । कोई दो वर्ष पहले इन्हीं दिनों केतन अवस्थी
जी के मकान में रहने आया था । उसके दो छोटे-छोटे बच्चे थे,
बहुत ही प्यारे,
भोले भाले । इस नए किराएदार के प्रति तब भी हम लोगों के मन में उत्सुकता थी
पर धीरे-धीरे वह उत्सुकता अपने आप मिट गई । केतन बहुत शांत और रिजर्व था और
उसकी पत्नी मीरा भी घर के बाहर सहज ही दिखाई नहीं पडती थी । लगता था बहुत
ही संतुष्ट परिवार है,
अपने आप में ही आनंदित रहने वाला,
पूर्णत: सुखी । अवस्थी जी अपने नए किराएदार से बहुत प्रसन्न थे । उनकी नजर
में वह एक आदर्श परिवार था । युवावस्था में इतने शांत,
सौम्य और गंभीर कम ही लोग पाए जाते हैं ।
सिन्धु जी
अपनी नौकरी के अंतिम दिनों में शिमला ट्रांसफर होकर चले गए थे । केतन के
वहाँ आने के कोई छ: महीने पहले उनका ट्रांसफर हो गया था । तब तक ऐसी उम्मीद
नहीं थी कि अपने इस अच्छे खासे बने बनाए मकान को छोड़-छाड़ कर शिमला में ही
रहने की सोच लेंगे । आखिर नौकरी करने वाला आदमी कितनी मेहनत और लम्बी योजना
के बाद पैसा जोड़-जाड़ कर मकान बनवा पाता है । और अगर उन्हें मकान छोड़ना
ही होता तो फिर अवस्थी जी से ऐसा खराब झगड़ा क्यों मोल लेते कि बातचीत ही
बंद हो जाती । आखिर अवस्थी जी ने केतन जिस पोर्शन में रहता था उस पोर्शन
में एक छोटा सा बरामदा ही तो आगे निकलवा लिया था । उस पर सिन्धु जी को भारी
आपत्ति हो गई और तूतू-मैंमैं,
गाली-गलौज तक नौबत पहुँच गई । अगर अवस्थी जी के तीन-तीन जवान मुस्टण्डे
बेटे न होते तो सिन्धु जी उनका जीना हराम कर देते । सिन्धु जी मिलिटरी के
आदमी थे,
उन्हें अपने बाहुबल पर खासा भरोसा था । यह घटना केतन के मकान में आने के
डेढ़ दो साल पहले की है । सिन्धु जी जब शिमला गए तब शांति हुई । उनका बड़ा
बेटा भी मिलिटरी में कमीशन पा गया था,
बड़ी बेटी की शादी हो गई थी,
बचे इस घर में उनकी पत्नी और छोटी बेटी शुभा जो तब बी एस सी में पढ़ रही थी
।
शाम को
दुकान से लौटकर मैं कुछ हल्का नाश्ता कर रहा था कि पत्नी पास आकर खड़ी हो
गई,
बोली
’
सामने
वालों के बच्चे तो बड़े हैं ।’
मैंने कोई उत्सुकता नहीं जाहिर की आगे जानने की तो वह फिर बोली
’
बातचीत भी
खूब करते हैं,
केतन की तरह चुप्पे नहीं हैं ।’
केतन से अधिकतर लोग इसलिए चिढ़ते थे कि वह बहुत कम बात करता था । उन्हें
लगता कि वह घमण्डी है,
पर
जब एक बार उसे अच्छी तरह जान लो तो लगता कि उससे अधिक भोला दूसरा कोई
व्यक्ति नहीं है । मुझसे तो दुकान पर केतन की बात हो जाती थी इसलिए मैंने
उसे समझ लिया था पर अपनी पत्नी को यह समझाने में पूरी तरह असफल रहा था ।
इसका एक और कारण था,
केतन की पत्नी का स्वभाव भी केतन की ही तरह कम बोलने वाला था और वह सामान्य
औरतों की तरह न गली में खड़ी होकर आपस में बतियाती न बेमतलब बाहर निकलती थी
। केतन के बच्चे भी उन्हीं दोनों की तरह सीधे और चुप्पे थे ।
उन दिनों
केतन शाम को अक्सर बरामदे में आकर बैठ जाता था । उन लोगों ने वहाँ बेंत की
कुर्सियाँ डाल रखी थीं । कभी-कभी केतन की पत्नी भी वहाँ बैठती और बच्चे
खेलते रहते । न कोई शोर गुल न झांय-झांय,
न
ज्यादा बातचीत । एक तरफ उन लोगों के इस कदर शांत व्यवहार पर झुँझलाहट होती
तो वहीं स्नेह भी उमड़ता । अक्सर वे लोग न कहीं जाते,
न
कोई उनके यहाँ आता ही । कभी-कभी शाम को पास के बाजार और पार्क में टहलकर
जल्दी ही वापस आ जाते । सिन्धु जी की पत्नी को अवस्थी जी से पहले ही चिढ़ थी
इपर से उनके नए किराएदार कुछ इस ढब के थे कि उन्हें निरंतर उनपर गुस्सा आता
। वह कहतीं
’पता
नही कैसे-कैसे लोग दुनिया में पाए जाते हैं,
लगता है जैसे चिड़ियाघर से निकल कर आए हैं । न इंसानों की तरह बातचीत,
न
मेलमिलाप,
न
दुआ सलाम ।’
हालाँकि सिधु जी की पत्नी स्वयं अत्यंत आत्मकेन्द्रित और शक्की किस्म की
महिला थीं । उन्हें खुद अपने दो एक रिश्तेदारों को छोड़कर बाकी मोहल्ले
पड़ोस के लोगों से
न तो संबंध रखना ही पसंद था न
उनके यहाँ आना जाना । उन्हें अपने पति की कमीशन लेबल तक तरक्की का भी घमण्ड
था और लड़के के मिलिटरी में कमीशंड अफसर बन जाने का भी । दोनों लड़कियाँ भी
अच्छी पढ़ लिख गई थीं,
यह
भी संतोष की बात थी । बड़ी लड़की का विवाह एक बड़े व्यापारी परिवार में हो
गया था सो उन्हें अड़ोसी पड़ोसी सब बौने नजर आते । केतन उन्हें फूटी आँखों
नहीं सुहाता था,
वह
जवान था,
शरीर भरा पूरा और सुंदर,
सिंचाई विभाग में ऊँचे पद पर कार्यरत परंतु उसे साधारण रहन सहन और गैर
बनावटी जीवन ही पसंद था । शायद चिढ़ का एक कारण यह भी रहा हो पर मुख्य कारण
थी शुभा जो तब एम एस सी फायनल में पहुँच चुकी थी । इन दिनों शुभा की शोखी
बढ़ती जा रही थी और उसकी माँ की चिन्ता भी । वह अक्सर कहतीं कि शुभा एम एस
सी कर ले तो अच्छा घर वर देख कर इसके भी हाथ पीले कर दें । बड़ी वाली तो एम
एस सी करके कालेज में लेक्चरर हो गई है और उसे घर भी अच्छा मिल गया है ।
शुभा की जिद थी कि वह एम एस सी करके किसी अच्छे क्म्पटीशन में बैठेगी और
नौकरी लगने के बाद ही शादी के बारे में सोचेगी ।
सिन्धु जी
महीने दो महीने में शिमला से घर आते और दो एक दिन रहकर वापस चले जाते । उन
दिनों उनके घर में अच्छी खासी चहल पहल रहती । यार दोस्त जुटते,
पार्टी होती,
ड्रिंक्स और अच्छा खाना पीना होता । शुभा भी इतराती घूमती । कभी अपने पिता
से लाड़ में कहती
’क्या
पापाजी आपने इतनी भीड़भाड़ और शोर कर रखा है कि मेरी पढ़ाई नहीं हो पाती ।’
पिता कहते
’पुत्तर
एक ही दिन की तो बात है,
कल
मैं चला जाऊँगा तब खूब पढ़ना ।’यह
सुनकर शुभा चुप हो जाती । सिन्धु जी च्¡कि
प्रमोशन पाकर बड़े अफसर बन गए थे सो सिर्फ अपने बराबर के स्टेटस वाले लोगों
से ही दोस्ती रखते बाकी से बस हाय-हेलो कर लेते और इस बात को अपना बड़प्पन
समझते । उन्होंने पैसे कमाने और बच्चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं रखी थी ।
दो-तीन प्लॉट खरीद रखे थे,
ये
मकान जो साढ़े चार हजार वर्ग फुट के प्लॉट पर बनवाया था करीब दस वर्ष पहले,
इसका उन्हें काफी गर्व था । उसके बाद उन्होंने एक फिएट कार भी खरीद ली । इस
तरह वह उच्च मध्यवर्ग के पायदान पर थे
जहाँ से निम्न मध्यवर्ग से आवश्यक दूरी बनाए रखना अपने महत्व को
प्रदर्शित करने के लिए जरूरी होता है । सो सिन्धु जी और उनका परिवार उस
मुहल्ले में एक आइलैण्ड की तरह था इसलिए मुहल्ले वालों की भी बहुत अच्छी
भावना उनके प्रति नहीं थी । शायद सिन्धु जी को न तो इसकी चिन्ता ही थी न ही
अपेक्षा ।
अक्सर
शुभा मुहल्ले पड़ोस में किसी के घर नहीं जाती थी,
कालेज भला और अपना घर भला । ज्यादा हुआ तो शाम को अपनी सहेलियों के यहाँ हो
आई या कभी अपने मामा के यहाँ जो इसी शहर में रहते थे । पढ़ना और शाम को लâन
में माँ के साथ बैठना,
आजकल यही उसके शौक थे । उस दिन शाम को जब वह किसी काम से हमारे घर आई तो
पत्नी ने उसे बडे प्रेम से बिठाया और गप्पें मारने लगी । बातों-बातों में
अवस्थी जी के नए किराएदार के बारे में पत्नी पूछ बैठी
’कैसे
हैं ये लोग?
शुभा बोली
’वो
तो पागल है,
न
किसी से बात करता है न हँसता है,
गुमसुम मुँह फुलाए बैठा रहता है गुब्बारे की तरह ।’
मेरी पत्नी को इन बातों में काफी रस आया । आखिर निन्दा रस से अधिक आनंददायी
और क्या चीज हो सकती है । दोनों ने मिलकर केतन की निन्दा का भरपूर
रसास्वादन किया । मुझे लगता था कि केतन के इस चुप चुप व्यवहार के प्रति
मेरी पत्नी ही कुछ अधिक द्वेष या ईर्ष्या रखती थी परंतु तब मुझे लगा कि
शुभा केतन के इस व्यवहार के प्रति कहीं अधिक अक्रामक है ।
उस दिन
शुभा का जन्मदिन था,
वह
बाईस वर्ष की हो गई थी । शाम को जन्मदिन मनाने के लिए उसने अपनी सहेलियों
को बुलाया था । माँ बेटी ने मिलकर उनके खाने पीने का अच्छा खासा इन्तजाम
किया था । शाम पाँच बजे से ही उसकी सहेलियाँ आनी शुरू हो गईं । शुभा खूब
मस्ती में थी,
बहुत दिनों बाद नए-नए लकदक कपड़े पहन कर वह चहकती फिर रही थी । आठ दस
सहेलियाँ जुटी थी । कभी कमरे में,
कभी बरामदे में और एकाध बार छत पर घेरा बनाकर वे बतियातीं,
हँसतीं और मजे लेतीं । शाम सात बजे के लगभग एकमात्र मेहमान उसके मामा आकर
ले गए थे कोई बड़ा सा तोहफा देकर गए थे वह शुभा को । दिल्ली से एक बढ़िया
कीमती सूट भी लाए थे । केक खाया,
थोड़ा बहुत नाश्ता किया और शुभा की माँ के साथ पन्द्रह बीस मिनिट बातें
करके वह चले गए । आखिर लड़कियों के साथ क्या बैठें?
उनके जाने के बाद संगीत का दौर शुरू हुआ,
दो
एक लड़कियों ने जो गा सकती थीं,
फिल्मी गाने गाए फिर टू इन वन पर उन दिनों आई किसी पापुलर गानों का टेप लगा
दिया गया ।
केतन उस
दिन साइट से थोड़ा लेट ही लौटा था । जीप अवस्थी जी के घर के सामने रुकी तो
उसे पड़ोस के घर में चहल पहल और गाने सुनाई दिए । उसने ड्रायवर को जाने की
इजाजत दी और अपना ब्रीफकेस लेकर जीना चढ़ रहा था तभी लगा कि गाने की आवाज
कुछ और तेज हो गई है । वह जीना चढ़ कर घर के अंदर घुस गया । थोड़ी देर बाद
हाथ मुँह धोकर,
कपड़े बदलकर केतन और उसकी पत्नी बाहर बरामदे में कुर्सियों पर आकर बैठ गए ।
वे अक्सर शाम को बरामदे में बैठकर चाय पीते थे । केतन ने मीरा से पूछा
’
आज
पड़ोस में इतनी चहल पहल और गाने बजाने किसलिए हैं?’
मीरा ने बताया
’शायद
पड़ोस में जो लड़की है उसका जन्मदिन है ।’
उस
वक्त सभी लड़कियाँ बरामदे और लâन
में इकट्ठी होकर जोर जोर से बातें कर रही थीं । तभी नौकरानी कोल्ड ड्रिन्क
लेकर आई और सभी को एक एक गिलास थमा दिया । शुभा उन सब लड़कियों में एकदम
अलग और बहुत खूबसूरत लग रही थी । केतन को इस बात का यकायक अहसास हुआ कि वह
और उसकी पत्नी दोनों कितने अव्यवहारिक हैं कि पड़ोस में एक लड़की अपना
जन्मदिन मना रही है और वे उसे
’हप्पी
बर्थ डे’
भी
नहीं कह पा रहे हैं । उन दोनों की चर्चा तब इस विषय पर केन्द्रित हो गई कि
इन लोगों ने भी किसी संबंधी,
परिजन या आस पड़ोस के लोगों को नहीं बुलाया था हालांकि दोनों इस बात पर
सहमत थे कि छोटे बच्चे तक अपना जन्मदिन अपने साथियों में ही मनाना चाहते
हैं फिर यह तो जवान लड़की है और उस पर भी उसके पिता,
भाई,
बहन सभी बाहर हैं । मीरा ने बताया कि शायद उसके मामा आए थे और कुछ देर रुक
कर चले गए । पड़ोसियों से तो इनका कोई रफ्त-दफ्त ही नहीं है फिर बात जवान
लड़की की है सो क्यों किसी आदमी को बुलाया जाए । मीरा हालाँकि घर से बाहर
कहीं जाती आती नहीं थी,
न
ही अड़ोस पड़ोस या मकान मालिक के घर की महिलाओं से ही ज्यादा बातें करती थी
। कभी कभार ही वह लोगों से बोलती बतियाती पर स्त्री सुलभ सामान्य व्यवहारिक
ज्ञन और जानकारी सिर्फ अंदाज से ही काफी सही हासिल कर लेती थी । केतन और
उसके परिवार के बारे में कुछ लड़कियों की उत्सुकता पता चल रही थी शायद शुभा
ने उन्हें बताया होगा कि केतन पागल है और थोड़ी उसकी पत्नी भी,
या
पत्नी घर-घुस्सू है वगैरह । इसलिए जब लड़कियाँ बार-बार पड़ोस के बरामदे की
तरफ देखने और इशारा करके हँसने-हँसाने लगीं तो केतन और मीरा वहाँ से उठ गए
।
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