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ISSN 2292-9754

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10.13.2014


कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार

यह संभवतः सन 2005 की बात है, एक शाम मैं सहारा समय समाचार चैनल देख रहा था तो एक समाचार प्रसारित हुआ कि कैलाश सत्यार्थी का नाम नोबल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित हुआ है। मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ। मैं तब मध्य प्रदेश के धार जिले में था वहाँ से मैंने इस बात की पुष्टि करनी चाही। उन दिनों सहारा समय के विदिशा के पत्रकार बृजेन्द्र पांडे हुआ करते थे वहीं से यह समाचार लगा था। बृजेंद्र पांडे, मेरे और कैलाश के सहपाठी थे सन १९६७ -६९ में विदिशा के हायर सेकण्डरी स्कूल में। बाद को कैलाश ने इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमीशन ले लिया, मैंने और बृजेंद्र ने बी. एससी. में। मैंने उन्हें फ़ोन लगाया और इस बाबत उनसे पूछा। उन्होंने बताया कि कई लोगों ने कैलाश का नाम प्रस्तावित किया था। नोबल पुरस्कार लिए तब उन्हें नामांकित नहीं किया गया था। आज जब मैं बेटी से मिलने वैंकूवर पहुँचा तो उसने बताया कि आपके मित्र कैलाश सत्यार्थी अंकल को 'पीस' नोबल पुरस्कार मिला है।

कुछ महीने पहले मैं मेरी पत्नी तथा बेटी कैलाश के अलवर जिले के आश्रम गए थे। वहाँ उनकी पत्नी तथा बेटी भी थी। आज यह समाचार सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ। मलाला युसुफ़ज़ई के साथ सम्मिलित रूप से उन्हें २०१४ का शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें बच्चों और युवाओं के दमन के ख़िलाफ़ कार्य करने तथा सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए दिया गया है। कैलाश बंधुआ मजदूरी एवं बाल श्रम के विरुद्ध भारतीय अभियान में १९९० के दशक से ही सक्रिय रहे हैं, आंदोलन करते रहे हैं। कहा जाता है कि उनके द्वारा संचालित संगठन 'बचपन बचाओ आन्दोलन' ने लगभग ८० हज़ार बाल श्रमिकों को मुक्त कराया है और उनके पुनर्वास एवं शिक्षा की व्यवस्था में सहायता की है। कैलाश सत्यार्थी पिछले दो दशकों से वे बालश्रम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं और इस आंदोलन को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए जाने जाते हैं।

हायर सेकंडरी तक कैलाश एक मेधावी छात्र थे। इंजीनियरिंग में प्रवेश के बाद उनका ढर्रा बदलने लगा। वह आर्य समाजी तो थे ही फिर लोहियावादी भी हो गए। जाति-पांति में कैलाश का विश्वास नहीं था। एक दिन विदिशा के नीमताल चौराहे पर कैलाश ने दलित अछूतों से भोजन बनवाया और बिना किसी की परवाह किये बीच चौराहे पर बैठ दलित बंधुओं के साथ हम लोगों ने भोजन किया। आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो उन्होंने समाजवादी दल के प्रत्याशी का दल-बल के साथ प्रचार किया था। चुनाव के परिणाम आने के बाद कैलाश मुझे भोपाल के विधायक निवास ले गए और वहाँ तब निर्वाचित विधायक रघु ठाकुर से भेंट कराई थी। आर्य समाज तो उनका प्रथम प्रेम था जिसके चलते वह स्वामी अग्निवेश संपर्क में आए और बंधुआ मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गए। यही उनकी इस क्षेत्र में पहली पाठशाला थी। बंधुआ बाल श्रमिकों को मुक्त कराना उनकी प्राथमिकता बन गई और पैशन भी। एक बार इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य ने उनसे पूछा था, "कैलाश तुम्हारी योग्यता क्या है?" तब कैलाश ने कहा था, "आप देख रहे हैं जो कुछ मैं कर रहा हूँ यही मेरी योग्यता है।" तब कैलाश की इस योग्यता पर शायद किसी को विश्वास न रहा हो लेकिन आज यह प्रमाणित हो गया है कि कैलाश की यह योग्यता किसी अकादमिक योग्यता से कहीं बड़ी थी। ह्यूमन राइट्स वॉच के द्वारा ज़ारी की गई रिपोर्ट के अनुसार "भारत में बाल यौन उत्पीड़न घरों, स्कूलों तथा आवासीय देखभाल केंद्रों में आम बात है। दिल्ली बलात्कार कांड के बाद सरकार द्वारा कानूनी और नीतिगत सुधार सुझाने के लिए गठित की गई समिति ने पाया कि बाल सुरक्षा नीतियाँ "स्पष्ट रूप से उन लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं जिनका उन्होंने बीड़ा उठाया था।" भारत में बाल यौन उत्पीड़न से निपटने की प्रणाली और सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने में अपर्याप्त हैं। अनेक बच्चों को दोबारा दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ रहा है। उसका कारण है पीड़ादायक चिकित्सीय जाँच और पुलिस और अन्य अधिकारी जो या तो उनकी बात सुनना नहीं चाहते या फिर उन पर विश्वास नहीं करते। सरकारी तंत्र बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा पीड़ितों के साथ व्यवहार के मामलों को रोक पाने में विफल रहा है। यूँ तो स्कूलों को बच्चों का वर्तमान व भविष्य गढ़ने का केन्द्र माना जाता है। लेकिन बीते कुछ सालों से स्कूलों के भीतर से बच्चों के शोषण और उत्पीड़न की घटनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाली शारारिक प्रताड़ना, यौन शोषण, दुर्व्यवहार, हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। मौजूदा परिस्थितियाँ भी कुछ ऐसी हैं कि बच्चों के लिए हिंसामुक्त और भयमुक्त माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सवाल अब बहुत बड़ा सवाल बन चुका हैं। सस्ते श्रमिक, बंधुआ मजदूर, बच्चों एवं महिलाओं की तस्करी और उन पर किये जाने वाले ज़ुल्म बढ़ रहे हैं। दिल्ली में छत्तीसगढ़ और झारखण्ड से घरों में काम करने वाले बच्चों को लाया जाता है और उनके साथ लगातार अन्याय किया जाता है। दिल्ली की हाल ही की घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। विकलांग बच्चों में उनके जीवन के पहले दिन से बहिष्कार शुरू हो जाता है। सरकारी मान्यता के अभाव में, उन्हें अपने अस्तित्व और संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक सेवाओं और कानूनी सुरक्षा से काट दिए जाता है। उनकी उपेक्षा ही भेदभाव बढ़ाती है। द स्टेट ऑफ द वर्ल्डस चिल्ड्रन’स 2013: चिल्ड्रन विथ डिसेबिलिटी कहती है कि विकलांग बच्चों को स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने या स्कूल जाने की कम से कम संभावना होती है। वे हिंसा, उत्पीड़न, शोषण और उपेक्षा के सबसे बड़ी कमज़ोरी के बीच होते है ख़ास कर जब अगर उन्हें छिपाया जाता है या संस्थानों में डाला जाता है - कई सामाजिक कलंक के कारण या उन्हें उठाने के खर्च के कारण। वे दुनिया में सबसे उपेक्षित लोगों के बीच में है। गरीबी में रहने वाले बच्चों को अपने स्थानीय स्कूल या क्लिनिक में कम से कम में भाग लेने की संभावना होती है, लेकिन जो गरीबी में रहते हैं और विकलांग भी हैं उन लोगों में ऐसा कर पाने की संभावना कम होती है। भारत में बच्चों के लिए हज़ारों एनजीओ काम कर रहे हैं, फिर भी हर लाल-बत्ती पर बच्चे भीख माँगते हैं, हर खान-खदान-ढाबे-फैक्टरी में बच्चे काम करते हैं, हज़ारों बच्चे ग़ायब कर दिये जाते हैं, अनगिनत की हत्याएँ कर दी जाती हैं। कैलाश को ये सम्मान मिलने के साथ ही कई सवाल भी उठने लगे हैं।

नोबेल की राजनीति विचित्र है। गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार देने से इंकार करते हुए उन पर रंगभेदी होने का आरोप भी लगा दिया गया और विडंबना देखिये कि गांधी नाम का उपयोग करने के लिए कैलाश सत्यार्थी को यह पुरस्कार दे दिया गया। पिछले कुछ समय में जिन लोगों को शान्ति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है, उसने तो नोबेल की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। बराक ओबामा, अल-गोर, हेनरी किसिंगर जैसे को क्या सोचकर नोबेल का शान्ति पुरस्कार दिया गया, इस पर अनुसन्धान की आवश्यकता पड़ेगी! इससे जुड़ी इनामी रकम और दूसरी सुविधाओं की वज़ह से इन पुरस्कार के लिए लॉबिंग पहले से कहीं ज़्यादा होने लगी है। कुल मिलाकर, इस बार कैलाश सत्यार्थी को जो नोबेल शान्ति पुरस्कार मिला है और अतीत में जिन शान्तिदूतों को यह पुरस्कार दिया जाता रहा है, वह नोबेल पुरस्कार के पीछे काम करने वाली पूरी राजनीति का चेहरा साफ कर देता है। शेख हसीना के हवाले से कहा गया था कि नार्वे की टेलीनॉर कंपनी ने यूनुस के लिए लॉबिंग की और भारी भरकम धनराशि क्लिंटन फाउंडेशन को दान में दी, जिसके कारण उन्हें वर्ष 2006 में नोबल पुरस्कार मिल सका।

अमेरिका की मशहूर मैग्ज़ीन फोर्ब्स में काम करनेवाली महिला पत्रकार मेघा बाहरी ने कैलाश सत्यार्थी को शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर सवाल उठाए हैं। मेघा ने अपने पुराने अनुभवों को याद करते हुए उनपर आरोप लगाया है। मेघा ने कैलाश के एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन पर ग़लत तरीके से फंड जुटाने का आरोप लगाया है। मेघा ने उन्हें नोबल पुरस्कार दिए जाने पर सवाल खड़ा किया है। मेघा बाहरी लिखा है कि कैलाश सत्यार्थी को मिला यह पुरस्कार नोबेल योग्य नहीं है। मेघा ने उनकी संस्था 'बचपन बचाओ आंदोलन' पर गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा है कि 2008 में कैलाश सत्यार्थी के एक सहयोगी ने यूपी के एक गाँव में बाल मजदूरी को लेकर जो दावे किए थे वो झूठे निकले। उन्होंने लिखा है कि 'बचपन बचाओ आंदोलन' ज़्यादा से ज़्यादा विदेशी फंड हासिल करने लिए बाल मजदूरी के झूठे आंकड़े देती है। अपने लेख में उन्होंने सत्यार्थी पर आरोप लगाते हुए लिखा है कि 2008 में फोर्ब्स के लिए भारत में बाल श्रम के उपयोग पर एक आर्टिकल लिखते वक्त मैं बचपन बचाओ आंदोलन से मिली। संस्था से जु़ड़े व्यक्ति ने उन्हें बताया कि उत्तर प्रदेश का कार्पेट बेल्ट जहाँ गाँव के हर घर के बच्चे दूसरे देशों को भेजे जाने वाले कालीन को बनाने में लगे हैं। जब मेघा से उस जगह को दिखाने की बात कही तो वो शख़्स उन्हें घुमाता रहा। वो मेघा को यूपी के एक गाँव में लेकर गया। मेघा ने अपने लेख में लिखा है कि मुझे उस गाँव में कोई बच्चा काम करता नहीं दिखा। जब मैंने उससे सवाल किए तो वो मुझे एक घर के पास लेकर गया जहाँ कालीन का काम कर रहे लोगों के पास दो बच्चे बैठे थे। दोनों बच्चों में ख़ास बात यह थी कि वे स्कूल ड्रेस में थे। मेघा आगे बताती है कि मैं वहाँ से खुद ही निकल पड़ी और कई जगह देखा। मेघा ने 2008 की इस पूरी घटना का ज़िक्र किया है और इसके पीछे की मंशा पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए लिखा है कि जितने बच्चों को आप बचाते हुए दिखाते हैं विदेशों से उतना ही बड़ा चंदा आपको मिलता है। भारत में ज़्यादातर एनजीओ को लेकर तमाम सवालात उठ रहे हैं, उन्हें हो रही विदेशी फंडिंग और उसके पीछे की मंशा पर चिंता जताई जा रही है,भारत के एक एनजीओ संचालक को नोबेल मिला है और इसे बैलेंस करने के लिए पाकिस्तान की एक बच्ची के साथ उसे बाँट दिया गया है। इस नोबेल पुरस्कार की टाइमिंग से इतना कन्फर्म है कि इसे दुनिया के प्रभावशाली मुल्कों, ख़ासकर अमेरिका का संरक्षण-समर्थन हासिल है। यह अकारण नहीं है। क्या अजीब इत्तेफ़ाक है कि भारत में पिछले तीन-चार साल में एनजीओ का ज़बर्दस्त उभार देखा जा रहा है। एक-एक प्रोजेक्ट पर दुनिया के बड़े-बड़े दिमागों और इवेंट मैनेजरोंद्वारा मंथन किया जाता है। मिलते-जुलते नज़ारे दुनिया के कुछ अन्य देशों में दिखा देते हैं, जिससे लगता है कि हो न हो, इन सारे इवेंट्स की प्लानिंग और फंडिंग करने वाले लोग कॉमन हैं।


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