| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 10.05.2007 |
|
लोकतंत्र शैलेन्द्र चौहान |
|
चीत्कार !
हाहाकार !
भयातुर
आँखें !
सिसकती सभ्यता
संस्कृति है कराहती
प्रसन्न और संतुष्ट हैं
चिकने धूर्त राजनयिक
तुंदियल,
भ्रष्ट,
व्याभिचारी राजनेता
इसीलिए
लोकतंत्र
स्वस्थ है
? |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|