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03.01.2009
 

ख़ुदा की क़िताब
शैफाली ('नायिका')


वो दोनों चादर पर
सोये थे कुछ इस तरह
जैसे मुसल्ले पर
कोई पाक़ क़िताब खुली पड़ी हो
और खुदा अपनी ही लिखी
किसी आयत को उसमें पढ़ रहा हो

क़्त दोपहर का
त्म हो चला था,
डूबते सूरज का बुकमार्क लगाकर
ख़ुदा चाँद को जगाने चला गया

उन्हीं दिनों की बात है ये
जब दोनों सूरज के साथ
सोते थे एक साथ
और चाँद के साथ
जागते थे जुदा होकर

दोनों दिनभर न जाने
कितनी ही आयतें लिखते रहते
एक की ज़ुबां से अक्षरों के सितारे निकलते
और दूजे की रूह में टंक जाते
एक की कलम से अक्षर उतरते
दूजे के अर्थों में चढ़ जाते

दुनियावी हलचल हो
या कायनाती तवाज़न
हसद का भरम हो
या नरें सानी का आलम
अदीबों के क़िस्से हो
या मौसीकी का चलन
बात कभी ख़ला तक गूँज जाती
तो कभी ख़ामोशी अरहत (समाधि) हो जाती

देखने वालों को लगता
दोनों आसपास सोये हैं
लेकिन सिर्फ ख़ुदा जानता है
कि वो उसकी किताब के वो खुले पन्ने हैं
जिन्हें वही पढ़ सकता है
जिसकी आँखों में मोहब्बत का दीया रोशन हो


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