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ISSN 2292-9754

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03.22.2016


क्रिकेट

किसी भी आम हिंदुस्तानी की तरह अब्दुल भी क्रिकेट का बहुत बड़ा प्रशंसक था। क्रिकेट तो जैसे उसकी रग-रग में बहता था। बचपन में मोहल्ले में गली के लड़कों के साथ क्रिकेट खेलने और फिर जवानी में उसे टीवी पर देखते वह उसे किसी माशूक़ा की तरह प्यार करने लगा था। ऑफ़िस से आने के बाद और छुट्टी के दिनों में वह टीवी पर क्रिकेट मैच देखते ही अपना दिन गुज़ारता था। कभी-कभी उसके इस क्रिकेट प्रेम से उसकी बीवी इतनी ख़फ़ा हो जाती कि उसे बाहर भेजने के लिए टीवी का पलक हटा देती। लेकिन वह उसकी इस हरकत कभी ख़फ़ा नहीं होता था क्योंकि वह अपनी बीवी से बहुत मोहब्बत करता था। अभी तक उसकी ज़िंदगी इन्हीं दोनों - माशूक़ा और बीवी के बीच के हाल की तरह बीत रही थी।

वह टीम इंडिया का बड़ा समर्थक था कि उसका एक भी मैच नहीं छोड़ता। सब मैच देखता, चाहे वह दिन में हो या रात में.. पूरा का पूरा। अगर कोई मैच काम वाले दिन होता तो उस दिन वह दफ़्तर से छुट्टी ले लेता। और अगर रात में होता तो उसे देखने के लिए वह रात भर जागता। उसका क्रिकेट में शौक़ बस टीवी तक देखने तक ही सीमित नहीं था। वह क्रिकेट से संबंधित आने वाली सभी ख़बरों को भी बड़े ध्यान से पढ़ता था। सुबह ही वह सबसे पहले इलाक़े के तीनों मशहूर अख़बारों के खेल पृष्ठ पढ़ डालता। जब कभी वह बाज़ार जाता तो क्रिकेट सम्राट मैगज़ीन ख़रीदना कभी न भूलता। उसे भारतीय टीम के वर्तमान और भूतपूर्व खिलाड़ियों के साथ-साथ विश्व की अन्य टीमों के बेहतरीन बल्लेबाज़ों और बोलरों के बारे बहुत अच्छी जानकारी थी। मसलन किस खिलाड़ी ने कब खेलना शुरू किया? उसने अपना पहला मैच किस फॉर्मेट में किस टीम के ख़िलाफ़ खेला? उस मैच में उसका प्रदर्शन कैसा रहा? उसने कितने रन बनाए, कितने विकेट लिए, अब तक वह कितने मैच खेल चुका है और उन मैचों में उसने कितने शतक बनाये और कितनों में वह शून्य पर आउट हो गया? इसी के साथ वह टीम इंडिया में खेलने वाले हर खिलाड़ी की जन्म तिथि, जन्म स्थान, पढ़ाई, उनकी पसंद-नापसंद, अफ़ेयर्स और शादी तक बारे में जानता था। चाहे कोई खिलाड़ी कितना ही नया क्यों न हो! उसे हर किसी के बारे में मालूम रहता।

जब कभी दफ़्तर में साथियों के बीच, पार्टी में दोस्तों के बीच या मोहल्ले के लौंडों में क्रिकेट को लेकर चर्चा होती तो उसके केंद्र में अब्दुल ही होता। वह उनके हर सवाल का धड़ल्ले से जवाब देता। अगर कभी किसी मैच या सीरीज़ में टीम इंडिया हार जाती तो उसे अपनी टीम के खिलाड़ियों का बचाव करना भी आता था। इस पर वह कहता- "खेल का नियम ही है हार-जीत। अगर कोई एक बार हारता है तो वह उससे अगले दस बार जीतने का हुनर सीखता है। अगर इस वह हार गये तो क्या हुआ। इंशाअल्लाह, अगली बार वह ज़रूर जीतेगी।"

हालाँकि वह जानता था कि इस्लाम घर में कोई मूर्ति रखने या किसी जानदार मख़लूक की तस्वीर लगाना की इजाज़त नहीं देता। वह इसकी सख़्ती से मनाही करता है। फिर भी उसने अपने कमरे में बैड के ठीक सामने सचिन तेंदुलकर का एक बड़ा सा पोस्टर लगा रखा था। जिसमें वह किसी मैच में शतक लगाने के बाद ख़ुशी से अपना बल्ला ऊपर उठाए था।

2011 ग्यारह वर्ल्ड कप के सेमीफ़ाइनल मैच में जब टीम इंडिया ने पाकिस्तान को हरा दिया तो वह ख़ुशी से उछल पड़ा था और घुटनों के बल बैठकर सज्दा करके अल्लाह का शुक्र अदा किया था। इस मैच की जीत पर पूरे देश में दीपावली जैसा माहौल था। देश के साथ शहर में भी पटाखे और अनार बम फोड़े जा रहे थे। जीत ख़ुशी मनाने में अब्दुल भी पीछे नहीं रहा था। उनसे पूरी मोहल्ले में मिठाई बँटवाई थी। मदरसे के बच्चों की दावत की थी और घर में कुरान खुवानी भी करवाई थी। उस दिन वह इतना ख़ुश था कि ख़ुशी के मारे वह फूला नहीं समा रहा था। और बार-बार उसकी आँखों से आँसू छलक पड़ते।

मिठाई बाँटने के दौरान जब एक शख़्स ने उससे पूछा- "अरे भाई, सेमीफ़ाइनल ही तो जीता है। अभी वर्ल्ड कप बाक़ी है। कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी मिठाई का मज़ा ही किरकिरा हो जाए।"

तो उसने फटाक से जवाब दिया- "अरे नहीं दोस्त, पाकिस्तान को जीत लिया तो समझो वर्ल्ड कप जीत लिया। हमारे लिए यही वर्ल्ड कप है। अब चाहे हमारी टीम वर्ल्ड हार भी जाए, हालाँकि ऐसा होगा नहीं। अगर हो भी गया तो मुझे कोई ग़म न होगा।"

इसके बाद जब वह दफ़्तर गया तो वहाँ भी अपने साथ मिठाई का डिब्बा ले गया। वहाँ पहुँचकर सबसे पहले उसने अपने सभी साथियों को टीम इंडिया की पाकिस्तान पर जीत की मुबारकबाद दी। फिर उन सबका मुँह मीठा कराया। इसी दरमियान उसके बॉस भी आ गये, जो अभी पिछले दिनों ही इस सरकारी विभाग में तबादला होकर आये थे। अपने मातहतों से परिचय लेने और देने की रस्म के बाद उन्होंने उनसे ज़्यादा रब्त नहीं रखा था। बस काम पड़ने पर ही उनसे बातें करते। अब्दुल ने सोचा कि चलो इसी बहाने बॉस से एक और मुलाक़ात करने का मौक़ा मिलेगा। वह दोस्तों को मिठाई खिलाने के बाद डिब्बे को लेकर बॉस के केबिन में जा घुसा। उनके सामने मिठाई का डिब्बा करते उसने कहा- "ये लीजिए सर, मुँह मीठा कीजिए।"

"किस ख़ुशी में?” डिब्बे से मिठाई का एक टुकडा उठाते हुए उन्होंने पूछा।

"सर, सेमीफ़ाइनल में भारत की जीत की ख़ुशी में।"

"तो इसमें तुम्हें किस बात की ख़ुशी? तुम्हें तो पाकिस्तान के हारने का दुख होना चाहिए।"

"नहीं सर, मुझे उसके हारने से बहुत ख़ुशी हुई है।"

इस पर बॉस ने कोई जवाब नहीं दिया और मिठाई के टुकडे को डस्टबिन में डाल दिया।

अब्दुल को बॉस का यह व्यवहार बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। वह उनके केबिन से निकल आया। क्षुब्ध होकर अपने कुर्सी पर बैठ गया और विचारों में खो गया। क्या वह दूसरे लोगों की तरह अपने देश प्यार नहीं करता? क्या उसका बचपन यहाँ नहीं बीता? क्या उसका घर यहाँ नहीं है? क्या वह यहाँ की मिट्टी में पला-बढ़ा नहीं है? उसके माँ-बाप, दादा-दादी और बाक़ी अज्दाद इसी मिट्टी में दफ़न नहीं है? क्या मुस्लिम होने के कारण उसे अपने देश की टीम पर ख़ुशी मनाने का भी अधिकार नहीं है? क्या बस इसीलिए उसे पाकिस्तान का समर्थक मान लिया जाएगा कि वह मुस्लिम है? भले ही पाकिस्तान मुस्लिम देश हो, लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि हम उसका समर्थन करेंगे? अपने विरोधी देश की टीम का समर्थन करेंगे? नहीं! हम उसका बिल्कुल भी समर्थन नहीं करेंगे। किसी भी क़ीमत पर नहीं! हम सच्चे हिंदुस्तानी हैं जो अपने देश को अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करते हैं। और वह यह बात अपने बॉस को भी समझाकर रहेगा।

वह छुट्टी होने से पहले एक बार फिर बॉस के केबिन में गया। वह बैठे हुए चाय पी रहे थे। अब्दुल को अपने सामने खड़ा देख उन्होंने कोई स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी नहीं की। चुपचाप अपनी चाय पीते रहे। अब्दुल ने कहा- "सर, मुझे पाकिस्तान के हारने पर बिल्कुल भी दुख नहीं हुआ है। बल्कि मैं ख़ुश हूँ, ख़ुश क्या? बहुत ख़ुश हूँ कि हमारा देश, हमारा भारत देश सेमीफ़ाइनल में दुश्मन देश की टीम से जीत गया। उस देश से जिसने हमेशा हमारा बुरा चाहा है," यह कहते हुए ख़ुशी और गर्व के भाव उसके चेहरे पर नमूदार हो रहे थे। लेकिन बॉस ने चाय ख़त्म करके उसकी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कि उनके सामने खड़ा व्यक्ति झूठ बोल रहा हो और जबकि वह उसकी सच्चाई जानते हों। उसकी इन बातों को सुनकर वह हँस दिये। एक घृणित हँसी। जिससे नफ़रत और हिंसा की बू आ रही थी।

उन्होंने चाय के खाली कप को सामने मेज़ पर रखी ट्रे में ठीक से रखा और अपना बैग उठाकर केबिन से निकल गये।

बॉस की इस तरह की हँसी और यूँ चुपचाप चले जाने से अब्दुल वहाँ मूर्तिवत-सा खड़ा रह गया। वह भी उनके पीछे-पीछे केबिन से निकल गया और अपने घर चला गया। घर जाकर वह फिर सोच-विचार में पड़ गया। उसने सोचा कि शायद वह अपनी बात को ठीक ढंग से नहीं कह पाया है। उसे अपनी बात और अच्छी तरह से कहनी चाहिए थी। महज़ मुस्लिम हो जाने से ही तो हम पाकिस्तानी नहीं हो सकते? उसने फ़ैलसा किया वह कल फिर बॉस के केबिन में जायेगा और उन्हें ठीक से बतायेगा कि वह मुस्लमान है तो क्या हुआ? वह भी हर आम भारतीय की तरह एक सच्चा हिंदुस्तानी है।

अगले दिन वह समय पर ऑफ़िस जा पहुँचा। पहुँचते ही वह अपनी कुर्सी के पास गया और उस पर जमकर बैठ गया। उसने सामने मेज़ पर रखी फ़ाइलों का उलटा-पलटा और बॉस के आने की प्रतीक्षा करने लगा। बॉस बारह बजे के बाद आये। वह लंच के बाद दो बजे उनके केबिन अदब और तहज़ीब के साथ दाख़िल हुआ। बॉस दायें हाथ में पेन लिए फ़ाइलों में नज़रें गड़ाए बैठे हैं। उन्होंने केबिन में जब जूतों की आवाज़ सुनी तो एक पल के लिये नज़रें उठाकर देखा लेकिन जैसे ही उन्हें अपने सामने अब्दुल खड़ा दिखाई दिया तो उन्होंने फिर से अपनी नज़रें फ़ाइल में गड़ा लीं। अब्दुल ने अदब और तहज़ीब के साथ उनके सामने खड़े होकर फिर से कहा- "देखिए सर, आप मुझे ग़लत समझ रहे हैं। मैं पाकिस्तान के हारने पर बिल्कुल भी दुख नहीं हूँ। बल्कि मुझे ख़ुशी है भारत की जीत पर किसी भी आम हिंदुस्तानी की तरह।"

इस बार बॉस ने उसकी बात को बिल्कुल ही अनसुना कर दिया। उन्होंने एक बार भी उसकी तरफ़ देखा नहीं। बस चुपचाप फ़ाइल में लगे रहे। उन्होंने घंटी बजाई। चपरासी को बुलाया। उसे वह फ़ाइल देते हुए, दूसरे फ़ाइलें लाने के लिए कहा। अपनी इस उपेक्षा पर अब्दुल को दुख भी हुआ लेकिन उसे लगा शायद वह ग़लत वक़्त पर आ गया है। बॉस जब इतने व्यस्त हैं तो उसे आना नहीं चाहिए। लेकिन वह इस बात से बहुत परेशान था कि वह एक मुसलमान होने के कारण उसे पाकिस्तान का समर्थक समझ रहे हैं।

उसके मन पर उदासी और निराशा के बादल छा गये। फिर उसका काम में बिल्कुल भी दिल नहीं लगा। शाम को ऐसे ही हताशा, निराशा और परेशानी के आलम में घर पहुँचा। घर पहुँचकर उसने किसी से कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप सोफ़े पर बैठा रहा। उसकी बीवी ने चाय को पूछा। उसने मना कर दिया। फिर उसने खाने के लिए पूछा, तो उसे भी मना कर दिया। इस पर उसे कुछ शंका हुई। वह रसोई निकली और उसके पास जाकर बैठ गई। उसने उसे इस तरह परेशान बैठा देखकर पूछा- "क्या बात? आप बहुत परेशान लग रहे हैं। सब ठीक तो है ना?"

"नहीं कुछ भी ठीक नहीं है," और यह कहकर उसने मामला अपनी बीवी को बता दिया। सुनकर उसकी बीवी ने तैश में आ गई और उसने कहा- "ये भी भला कोई बात हुई। अगर हम मुस्लिम हैं तो क्या हमें अपने वतन से मोहब्बत नहीं है? क्या हमें उससे प्यार नहीं है? क्या बस मुस्लिम होने के कारण हम देशभक्त नहीं हो सकते? तुम्हें अपने बॉस को फिर से समझाना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि भले ही हम मुस्लिम हो लेकिन बाक़ी सब की तरह हम भी अपने वतन को अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करते हैं। और हाँ, इस बार तुम उनसे ऑफ़िस में कुछ मत कहना। हो सकता है वह इस तरह बातों को ऑफ़िस में करना पसंद न करें। तुम्हें इस बार उनके घर जाना चाहिए। और उन्हें तसल्ली से अपनी बात समझानी चाहिए। ताकि वह आइंदा फिर किसी से ऐसी बातें न कह सके।"

अब्दुल को अपनी बीवी की बात जंच गई। उसने सोचा कि ऑफ़िस के माहौल में ऐसे बात नहीं करना ठीक नहीं है। शायद इसीलिए बॉस ने उसकी बातों का कोई जवाब नहीं दिया। इस बार वह उनके घर जाएगा। इसके लिए अपनी या उनकी छुट्टी लेने की भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी, क्योंकि दो दिन बाद इतवार है।

इतवार के दिन वह अच्छे से नहाया-धोया। बेहतर टाई-सूट पहना। बालों का सँवारा। पॉलिश किए हुए जूते पहने। इत्र छिड़का। कोट के बायें तरफ़ अपने दिल के ठीक ऊपर एक छोटा-सा तिरंगे का बिल्ला लगाया। और दस बजते ही वह अपने बॉस के घर पहुँच गया।

बॉस बाहर लॉन में बैठे हुए गर्म चाय की चुस्कियों के साथ अख़बार पढ़ रहे थे। ऐसा लगता था जैसे वह कुछ देर पहले ही सोकर उठे हैं। उन्होंने सफ़ेद-कुर्ता पायजामा पहना हुआ था। जिसके ऊपर शॉल लपेट रखी थी। पैरों में बाटा की चप्पलें और बाल बिखरे हुए थे। अब्दुल उनके सामने जा खड़ा हुआ। उनसे हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा- "नमस्ते सर।"

बॉस अख़बार निगाहें हटाकर सामने खड़े शख़्स पर डाली तो क्रोध से उनके चेहरा लाल हो उठा। आँखों में चिंगारियाँ फूटने लगी। पूरे शरीर में ख़ून खौल उठा। उन्होंने अख़बार रखा और एक झटके में खड़े होते हुए चिल्लाकर- "दफ़ा हो जाओ सूअर के बच्चे। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की पाकिस्तानी जिहादी। तुम क्या समझते हो..., मैं तुम्हारी बातों में आ जाऊँगा। आतंकवादी कहीं के। निकल जाओ मुल्ले। अभी इसी वक़्त निकल जाओ यहाँ से।"

यह कहते वक़्त उनकी निगाह अब्दुल के सीने पर लगे तिरंगे के बिल्ले पर गई। जो धूप की रोशनी पड़ने से चमक रहा था। उन्होंने एक ही झटके में उस बिल्ले को नोंच लिया और ज़मीन पर फेंक दिया। उसे अपने पैरों से कुचलते हुए उन्होंने एक बार फिर चीखते हुए कहा- निकल मुल्ले। पाकिस्तानी कहीं के। मेरे घर से निकल जा।

अपनी उम्मीदों के विपरीत बॉस का इतना नफ़रत भरा व्यवहार देखकर अब्दुल किंकर्तव्यविमूढ़ रह गया। इस अचानक और अप्रत्याशित हमले से अब्दुल को लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंज़र घोंप दिया हो। उसकी साँसें रुकने लगीं। उसके क़दम जैसे जम गये थे। वह चाहकर भी उन्हें उठा नहीं पा रहा था। उसने अपनी सारी बची-खुची ताक़त को समेटा और डगमगाते क़दमों से घर की ओर चल दिया। वह किसी गंभीर रूप से घायल सैनिक की तरह जिसे उसकी की ही रेंज के अफ़सर ने अपनी बंदूक की गोली से लहूलुहान कर दिया हो घर पहुँचा और बैड पर गिर पड़ा।

अब्दुल की बीवी को रसोई में काम करते हुए आहट हुई तो उसने कमरे में आकर अब्दुल को पलंग पर लेटे देखा। उसके चेहरे पर निराशा, कुंठा और क्रोध की छाया थी। उसे लगा कि जो कुछ भी अब्दुल के साथ हुआ है वह सही नहीं है। वह चुपचाप किचन में लौट गयी और चाय का पानी उबलने के लिए रख दिया। अब्दुल की बीवी का मन भी बैठ रहा था, वह भी उसके अव्यक्त दर्द को समझ रही थी। इन्हीं ख़्यालों में खोये हुए उसने चाय का कप बनाया और अब्दुल के लिए कमरे में ले आयी। बीवी को अपने पास खड़ा पाकर अब्दुल पलंग पर उठ बैठा, पर उसमें हिम्मत नहीं थी कि अपनी बीवी से नज़रें मिलाये और उसके सीने में भी वो खंज़र भोंक दे जो उसके दिल को लहूलुहान कर रहा था।
बीवी ने धीमे से पूछा, "क्यों क्या हुआ जो इस तरह उदास बैठे हैं?"

अब्दुल सिर झुकाये ही बुदबुदाया, "इन लोगों के मन में इतनी नफ़रत, इतना ज़हर – कैसे ज़िंदा रह पाते हैं यह लोग?"

बीवी चुप रही, वह अब्दुल के दिल में भरे ग़ुस्से को लफ़्ज़ों में बह जाने का मौक़ा देना चाहती थी।

"बॉस से बात करना दीवार से सिर फोड़ने की तरह है। इस ज़मीन के लिये मेरी मोहब्बत केवल इसलिये नापाक है क्योंकि मैं मुसलमान हूँ?" न चाहते हुए भी अब्दुल की आवाज़ काँप गयी। उसकी बीवी की आँखों में बरबस आँसू भर आये।

उसने आगे बढ़ कर अब्दुल के सर को अपने सीने में छिपा लिया। उसने सोचा कि वह इस हालत में कमज़ोर नहीं हो सकती। उसे ही अब्दुल की ताक़त बनना होगा। अपने आपको सँभालते हुए संजीदा आवाज़ में कहने लगी, "क्यों अपने आपको इतनी तकलीफ़ दे रहे हैं। जो हुआ – उसे भूल जाइये। जानती हूँ कहना आसान है, करना मुश्किल! आपको अपनी जन्मभूमि से मोहब्बत है – आप जानते हैं, मैं जानती हूँ, ख़ुदा जानता है। मोहब्बत रूहानी जज़्बा है। इसका ताल्लुक़ परवरदिगार के साथ है। किसी घटिया इंसान के आगे साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं। अगर वो इस नफ़रत की आग में जल रहा है तो हमारी बला से! आपका बॉस है तो है, बस उसके साथ काम तक मतलब रखिये। हैवान के साथ इंसानी संबंध रखने कोई ज़रूरी तो नहीं।"

अब्दुल की बीवी चुप हो गयी। अब्दुल ने सर उठा कर नज़रें मिलायीं। बीवी के होंठों पर हल्की सी मुस्कुराहट देख कर उसके दिल में प्यार उमड़ आया, कितना ख़ुशकिस्मत है वह कि उसकी पत्नी उसका अनकहा दर्द भी समझती है। उस लम्हे में वह बाहरी दुनिया भूल गया। उसकी दुनिया बीवी आँखों में खेलती मुस्कुराहट में सिमट गयी। वह उठा और चाय के कप से उठती भाप में देखने लगा। उसकी गर्मी को महसूस करने लगा।


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