अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
01.27.2016


वो सम्मान

पिछले माह मुझे एक कार्यक्रम में जाने का मौक़ा मिला। मेरी एक परिचिता मुझे ले गई। उसने बताया कि यहाँ के महिला मंडल ने उन जोड़ों को सम्मानित करने के लिये बुलाया है जिन्होंने जीवन के 50 साल बिताए हैं। कार्यक्रम शहर के एक हॉल में था। करीब 70-80 दम्पत्ति जोड़े बैठे थे। मासूम बुज़ुर्ग चेहरे। बोलती आँखें, शाँत चेहरे और इक ठहरा सा जीवन। सब एक-दूसरे को एक दयनीय नज़रों से देख रहे थे। कार्यक्रम शुरू हुआ। सूची में लिखे नामों के साथ सबको मंच पर आमंत्रित किया गया। शॉल पहनाकर, स्मृति चिन्ह लेकर सब अपने-अपने स्थान पर आ गये। यक़ीन मानिये पूरे हॉल में एक अजीब सा सन्नाटा था। मेरी परिचिता ने मुझे कुछ शब्द बोलने को मंच पर आमंत्रित किया। उनके लिये हार्दिक अभिवादन के सिवा दिल में और क्या हो सकता है? वो लोग मेरे सामने थे जिन्होंने अपने माता-पिता, अपने बच्चों और फिर अपने नाती-पोतों को पाला था, आज यहाँ निचुड़ी सी देह लिये बैठे हैं। सोचा मन की शंका मिटा ही लूँ। 4-5 लाइनें उनके स्वागत, उनकी सेहत और उनके भविष्य की उज्जवल कामना करके पूछ ही बैठी, "कृपया आज वो लोग हाथ उठायें, जो अपने बच्चों के साथ रह रहे हैं और ख़ुश हैं।"

सब लोग एक-दूसरे की ओर ताकने लगे जैसे मैंने कोई कितना बड़ा गलत प्रश्न पूछ लिया हो। सबके हाथ बँध गये, एक भी हाथ ऊपर नहीं उठा। मंच की ओर थी टकटकी बाँधे अनेक प्रश्नों को समेटे शून्य में ताकती आँखें।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें