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ISSN 2292-9754

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05.25.2016


वो परिवार

शादी का कार्ड आया, देखकर, मन हिलोरें लेने लगा। "कल बीना की शादी है। कितनी सुन्दर लगेगी वह दुलहन के लिबास में।" मैं इस स्थान पर नई हूँ, मुझे लोगों के बारे में अधिक मालूम नहीं। स्कूल में नौकरी करने की वज़ह से बीना ने शादी का कार्ड मुझे भी दिया। मैं अपने पति के साथ गंतव्य पर पहुँची। कुछ देर के बाद मेरी एक और साथी मेरे साथ वाली कुर्सी पर बैठ गई। मैंने उनसे बीना के माता-पिता के बारे में पूछा। उसने एक वृद्धा व वृद्ध व्यक्ति की तरफ इशारा किया, जो कि इतनी उम्र होते हुए भी साहस बटोर-बटोर कर, दौड़-दौड़कर काम कर रहे थे। सबका स्वागत कर बधाई लेना न भूल रहे थे। उसका छोटा भाई शेरवानी पहने आने वालों को पानी-ठंडा पिलवा रहा था व बड़ा भाई ऊपर के कामों में लगा था।

"अरे, बच्चे तो छोटे-छोटे हैं परन्तु इसके मम्मी-पापा काफ़ी उम्र के लग रहे हैं।"

वो अध्यापिका बीना से अच्छी तरह परिचित थी। इस स्कूल में 7 बरसों से कार्यरत थी। वह बोली, "अरे मैम, शायद आपको मालूम नहीं बीना का अपना कोई भी नहीं है। 26 जनवरी 2001 के भूकंप में उसका सारा परिवार ख़त्म हो गया और ये बुज़ुर्ग भुज से बाहर तीर्थ यात्रा पर थे, लौटकर आये तो सब लुट चुका था। ये दोनों बच्चे, इसके भाई भी भूकंप की चपेट में काई त्रासदी का शिकार हैं। ये सब कैंप में मिले थे। एक-दूसरे के नज़दीक हुए। जान-पहचान बढ़ने पर ये बुज़ुर्ग इन तीनों को अपने पुराने घर ले आये, जो कि बच गया था। आज इतने समय से ये सब इक्ट्ठे रहते हैं, बीना व इन बच्चों में आपसी प्यार देखकर आँखें भर आती हैं। तीनों बच्चे माँ-बाप की पूरी परवाह करते हैं व माँ-बाप इनकी। कौन कह सकता है कि बीना इनकी बेटी नहीं? देखो, किस बात की कमी रखी है इन्होंने इसके लिये।"

सुनकर मेरी आँखें बहने लगी। काश कि सबकी सोच ऐसी हो।


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